Thursday, 1 October 2015

क्या डॉ आंबेडकर मात्र किताबी पहलवान थे ??

क्या डॉ आंबेडकर मात्र किताबी पहलवान थे या भारत के सामजिक ताने बाने और आर्थिक इतिहास से अपरचित, मात्र मैकाले शिक्षा पद्धति से दीक्सित "शक्ल से भारतीय और सोच और अक्ल से अंग्रेज " एक उच्च शिक्षा प्राप्त विद्वान भर............................................. ..............डॉ आंबेडकर ने, जब एनी बेसेंट 1909 के भासण जिसमे एनी बेसेंट ने ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के लाभ से वंचित तबके को "one टेंथ submerged " की दुर्दशा की तुलना भारत के ग्रामीण अर्थव्यवस्था और मैन्युफैक्चरिंग की रीढ़ रहे , भारतीय उद्योगों के नष्ट होने के कारण बेरोजगार और बेघर हुए "one sixth जेनेरिक डिप्रेस्ड क्लास " से की, जिसको उद्धृत करते हुए वे गांधी और कांग्रेस को इनकी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं / तो ये मान लेना चाहिए कि अर्थशाष्त्री होते हुए भी उनकी सोच और समझ की गाड़ी मुख्य पटरी से उततर चुकी थी , और उनको भारतीय अर्थशाश्त्र और भारतीय समाज के बुनावट के बारे में समझ न के बराबर थी / इसीलिये उन्होंने भारत के इस बेघर बेरोजगार तबके कि दुर्दशा का कारण खोजने के लिए Bigot ईसाईयों और पादरियों द्वारा अनुवादित "संस्कृत के ओरिजिनल टेक्स्ट" कि और रुख किया ,जो उनको वेदों की और खींच ले गया /


  • Saras Tripathi The problem is that even critical objective analysis is looked by 'castist' lens. If you belong to so called 'upper caste', irrespective of how objective and factual you have been in your analysis, you are a "Manuwadi". And "Manuwadis" can never be objective. You got the oxymoron?
  • Tribhuwan Singh
  • Tribhuwan Singh इससे क्या फर्क पड़ता है कि कोई क्या टैग करता है मुझको ??
    तथ्य को उजागर करना अपना काम है ।
    वो कर रहे हैं । राजनीति की हांड़ी नहीं न चढ़ाये हैं हम कि वोटों कि गिनती करें।
  • Er Narendra Nohar Dhruv
  • Er Narendra Nohar Dhruv सर आज असहमति है... आप हर वक़्त अपने चश्मे से ही डॉ आंबेडकर का विश्लेषण करते है... और आपका जो चश्मा है उस पर जातिवाद का नंबर चढ़ा ज्यादा लगता है... मैंने कुछ दिन पहले ही आपको आपके ही एक पोस्ट पर कहा था की आप इन जातिवाद के चश्मे को बदले और मानवतावाद का लेंस लगाये... आप जब तक इस चश्मे को उतार कर नहीं देखेंगे तब तक आप किसी इस चीज़ का विश्लेषण सही नहीं कर सकते... सारस त्रिपाठी जी से सहमत हूँ... कोई भी मनुवादी अंबेडकर के किये कार्यों को सही नहीं मानता क्यूंकि उन्होंने जो किया और कहाँ वो उनके खिलाफ ही रहा है... उस समय की सोच और आज की सोच में काफी अंतर है ये मैं पहले भी बोल चूका हूँ... आपकी पोस्ट ज्यादातर वादों/ism को बढ़ावा देने वाली ज्यादा लगता है... ऐसा क्यूँ ??? आप जातीवाद को ख़त्म कर समानता और सदभाव की बात क्यूँ नहीं करते ???
    सादर
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  • Er Narendra Nohar Dhruv
  • Er Narendra Nohar Dhruv तथ्य को उजागर करिए सर लेकिन अपने वाद/ism के चश्मे को उतार कर करिए.. सिक्के के दो पहलू होते है और ये बात आपको मुझे बताने की जरुरत नहीं होनी चाहिए...See Translation
  • Sandeep Tripathi
  • Sandeep Tripathi Dhruv sahab sahi kate hain ab sab varno ko samanta deni chahiye...on merits.See Translation
  • Surendra Solanki
  • Surendra Solanki मन बुद्धि और अहंकार ही को समाज परिभाषित करता है।

    अहंकार न हो तो सवर्ण और दलित में फर्क ही नही है।
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  • Surendra Solanki
  • Surendra Solanki ये सवर्ण अहंकार मेरिट मेरिट की बात हमेशा क्यों करता है।

    क्यों वह बुद्धि पर अहंकार करता जो केवल बनाने से बनती है।
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  • Er Narendra Nohar Dhruv
  • Er Narendra Nohar Dhruv यदि ये वाद/ism शुरू से ही नहीं होते तो इतना हाय तौबा नहीं होता... हमारे देश की गुलामी का कारण ही ये वाद है... हम इतने अलग अलग वादों में बटे रहे की बाहरी लोगो ने इसका फायदा उठाया और देश गुलामी में चला गया... यदि यहाँ सब एक होते समान होते सब में सदभाव होता तो किसी भी माई के लाल में इतना दम नहीं की भारत के लोगो के बाल भी बाका कर सके... सो मेरा आपसे विन्रम अनुरोध है की आप अपने ज्ञान को समानता और सदभाव के लिए उपयोग लाये जिसकी आज इस देश को सर्वाधिक जरुरत है... सादरSee Translation

  • Er Narendra Nohar Dhruv
  • Er Narendra Nohar Dhruv सुरेन्द्र सर बिलकुल ठीक कहा.. बिना अहंकार के कोई फर्क नहीं...See Translation
  • Surendra Solanki
  • Surendra Solanki सभी के लिए।

    अभी कुछ दिनों तक। सिर्फ मन बुद्धि और अहंकार की बात करूँगा।


    यही दलित और सवर्ण की समस्या है।
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  • Tribhuwan Singh
  • Tribhuwan Singh Er Narendra Nohar Dhruv जी आप क्या समझते है उससे क्या तथ्य बदल जायेगे ?
    मैं मनुवादी हूँ कि जातिवादी हूँ आप जो भी तोहमत लगाना चाहते है मुझे स्वीकार्य है ।
    लेकिन क्या आप इस तथ्य पर कुछ बोलेंगे कि एनी बेसेंट के भाषण का वो अंग जिसको डॉ आंबेडकर ने अपने लेख
    न में उद्धृत किया है , कि ब्रिटेन का "One tenth submerged class" और भारत का "One sixth generic depressed class" की सामजिक और आर्थिक दशा एक जैसी है , और ये किसी भी देश के सामाजिक पिरामिड का अभिन्न अंग है ।
  • Er Narendra Nohar Dhruv
  • Er Narendra Nohar Dhruv भारत को आज सभी ज्ञानियों की जरुरत है चाहे वो किसी जात, धर्म, समुदाय का हो क्यूंकि भारत में आज जो मानव मूल्यों की गिरावट आई है उसे आप/हम सभी को मिल के उठाना है... मेरा प्रेम जितना सवर्ण भाइयों से है उतना ही दलित भाइयों से है और मुझे पूरे मानववाद से प्रेम है और जहाँ मैं पैदा हुआ हूँ उस देश के लिए अपने भाइयों को इस तरह व्यर्थ बहस करते नहीं देख सकता... सादरSee Translation
  • Sumant Bhattacharya
  • Sumant Bhattacharya मैं इस बात से सहमत हूं कि अंबेडकर की जानकारियों के आधारों की समीक्षा होनी ही चाहिए....और उन तथ्यों को सामने लाया जाना चाहिए, जो औपनिवेशिक सत्ता मॉडल के भीतर कहीं छिपे हुए हैं....See Translation
  • Shatrunjay Singh
  • Shatrunjay Singh त्रिभुवन सर को इन मुद्दोँ का विश्लेषण की जरुरत क्योँ पड़ रही है।ये वाद है या किसी को सच का आईना दिखाने की कोशिश है।सर थोड़ा खुलाशा करिए। भ्रम पैदा हो रहा है।See Translation
  • Surendra Solanki
  • Surendra Solanki त्रिभुवन जी।

    अपनी बुद्धि से उन तथ्यो का पता लगा रहे हैं। कि डॉ आंबेडकर का मन कहाँ कहाँ भटक रहा था। जब सब कुछ पढ़ने के बाद भी सामाजिक व्यवस्था में समानता लाने के उनके सारे सोच को धक्का लग रहा था।


    जाहिर हे डॉ त्रिभुवन ने जो भी निष्कर्ष निकाला है वह सराहनीय है और में उन्हें धन्यवाद देता हूँ। कि भलाई के लिए उन्होंने काम किया।

    सवर्ण और दलित अहंकार को दरकिनार करते हुए अपनी बुद्धि से तथ्यों को खोजा।
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  • Er Narendra Nohar Dhruv
  • Er Narendra Nohar Dhruv सर कृप्या हिंदी में अनुवाद करे..See Translation
  • Tribhuwan Singh
  • Tribhuwan Singh Er Narendra Nohar Dhruv जी आप भाषा पे चले गए ।
    तथ्यों और भाव को उंदेखा करके ।
    ऐसा कैसे चलेगा भाई। इतिहास और इतिहासबोध तथ्यों पर आधारित और सरल पगडण्डी जैसा होना चाहिए , घुमावदार पहेली जैसी नहीं जिसकी हमें आदत पड़ गयी है।
  • Er Narendra Nohar Dhruv
  • Er Narendra Nohar Dhruv सुमंत दा बिलकुल लाया जाए और हम तो कहते है की उनकी सारी प्रतिबंधित किताबो को भी सार्वजनिक करनी चाहिए... क्या लिखा था उस बन्दे ने और किसके लिए लिखा था पता तो चले..See Translation
  • Er Narendra Nohar Dhruv
  • Er Narendra Nohar Dhruv सर मैं जिस भाषा में सहज महसूस करता हूँ उसमे विचार रखना और बोलना पसंद करता हूँSee Translation
  • Shatrunjay Singh
  • Shatrunjay Singh हर जागरुक आदमी मानवतावादी ही रहना चाहता है।उसका केवल एक धर्म है मानव धर्म पर भारत का सामाजिक ताना बाना इतना जटिल है कि हर कोई उलझा हुआ हैSee Translation
  • Surendra Solanki
  • Surendra Solanki डिप्रेस्ड क्लास।

    इंग्लैंड में एक तबका ऐसा था जिससे वो सारे गंदे काम (मेनिअल वर्क )कराते थे। उसे लोवेस्ट क्लास कहा जाता था।


    उसे deptessed क्लास कहा गया।

    और यहाँ के शुद्रो को उससे जोड़ा गया।
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  • Er Narendra Nohar Dhruv
  • Er Narendra Nohar Dhruv बिलकुल सर आपकी बात से 100% सहमत हूँ.. मैं भटक नहीं रहा और ना भागूँगा...See Translation
     
    • Er Narendra Nohar Dhruv और रही बात भाषा की तो आप ही अपनी पोस्ट पर भाषा की बात करते है और लोगो को हिंदी में विचार रखने को कहते है...See Translation
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki महार शब्द से बंधे लोग।

      जिस शब्द से डॉ आंबेडकर बंधे थे। उसका काम सफाई और छोटे मोटे काम करना था।


      किद्वंती अनुसार वे शिवाजी की सेना के सिपाही हुआ करते थे।

      जब पेशवा का शाशन आया तब उन उन पर सबसे ज्यादा अमानवीय व्यवहार हुआ।
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    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv शूद्रों को उससे जोड़ा गया तो क्या गलत कहा.. जब एनी बिसेन्ट भारत आई तो उन्होंने क्या देखा .??? शूद्रों को राज करते देखा या फिर कुछ और करते देखा... ???See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv सर पाखण्ड से मुझे सख्त नफ़रत है वो चाहे किसीका भी हो...See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv और पाखण्ड के मूल में जायेंगे तो इतना बहस करना ही नहीं पड़ेगा...See Translation
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki परिभाषा बन गयी।

      स्वर्ण =बुद्धि युक्त अहंकार युक्त


      दलित =बुद्धि हीन अहंकार हीन।

      यही सामाजिक परिभाषाएं हैं।
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    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv आपको मैं कहता ही रहा हूँ की अलग अलग काल खंड में व्यक्ति और विचार उस काल के अनुरूप ही रहते है... और यही चीज़ यहाँ भी लागू होती है....आज आप क्या सोचते है और कर रहे है वो अलग है.... यदि आप आंबेडकर के काल में होते तो मैं दावे के साथ कैह सकता हूँ की उस वक्त आपके विचार कुछ और होते....See Translation
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh @Satrunjay singh जी भारत और ब्रिटेन के 1750 से 1947 तक के आर्थिक इतिहास को समझे तो ये पहेली आसान हो जायेगी ।
      1750 में भारत विश्व की सकल जीडीपी का 25 प्रतिशत का हिस्सेदार ब्रिटेन और अमेरिका दोनों मिलकर मात्र 2 %।
      1900 UK +USA 40 प्रतिशत के शेयरहोल्डर और
      भारत मात्र 1.8 % जीडीपी का हिस्सेदार बचा।
      विकास की और अग्रसर देश ब्रिटेन के 10 प्रतिशत मुख्यधारा में शामिल होने से वंचित - "One tenth submerged class" ।
      और भारत की अर्थव्यवस्था चौपट करने से बेघर बेगार हुए मैन्युफैक्चरर की सेना -"One sixth Generic depressed class" ।
      लेकिन दोनों की दशा एक जैसी समाज का सबसे महत्वपूर्ण मेहनत कश् काम scavenging का काम इसी के जिम्मे दोनों देशों में ।लेकिन बदबूदार तबका।
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv सुरेन्द्र सर इसी परिभाषा को बदलने का मैं समर्थक हूँ... हमारी सामजिक संरचना इतनी बर्बाद हो गयी है इसके कारण की आप सब देख ही रहे है....See Translation
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh Er Narendra Nohar Dhruv जी अगर डॉ आंबेडकर को उसकाल में कल्पना के घोड़े को दौड़ाकर शूद्रों की दुर्दशा का कारन खोजने के लिए वेदों तक जाने की छूट आप देने को तैयार हैं ।
      लेकिन मुझे तथ्यों के आधार पर 200 साल पीछे भी नहीं जाने देना चाहते ??
      ये तो तर्कसंगत और न्यायपूर्ण नहीं है ।
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv सर क्या लगता है भारत में GDP गिरने का कारण??See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv सर आप 200 साल क्यूँ हज़ार साल पिछे जाए.. आपने मेरी बात का गलत अर्थ निकला सर... मैंने कब कहा की आप अपनी खोज बंद कर दे?? आप शुरुवात से खोज करे बल्कि मैं भी आप के साथ खोज में लगूंगा... सिर्फ 200 साल पिछे क्यों???See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv जहाँ से असमानता और ये वाद उपजा आप उस जड़ में क्यूँ नहीं जा रहे ????????See Translation
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh Er Narendra Nohar Dhruv ji भारत के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को ब्रिटिश द्वारा सायश नष्ट किया जाना ।
      ताकि हम एक्सपोर्टर से इम्पोर्टर बने और वे इम्पोर्टर से एक्सपोर्टर।
      गांधी ने इम्पोर्टेड कपड़ों की होली यूँ ही नहीं जलवाई थी।उनको भारत के बारे में अपनी हथेली की तरह समझ थी।
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh जड़ खोदे बिना आप सर तो कलम कर सकते हैं समूल नष्ट नहीं कर सकते Er Narendra Nohar Dhruv जी।
      गलत तो नहीं कह रहा मैं?
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh और वो जड़ वहीँ है 1750 se 1989 के बीच में।
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki आज फेसबुक पर मेरी परिभाषा अपनाएं।

      आप नाम के आगे के शब्द से केवल एक चीज देखते।


      शर्मा राजपूत अग्रवाल बुद्धि युक्त
      जाटव बुद्धि हीन।
      See Translation
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh हमारा उद्देश्य शायद एक हो लेकिन समझ का फर्क है।और वो प्राकृतिक है अप्राकृतिक नहीं।
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv और जहाँ तक मुझे जानकारी है दुनिया के बहुत से देश आम्बेडकर के अर्थशाश्त्र को फॉलो करते है और किसी विश्विद्यालय में उनके अर्थशाश्त्र पर किये शोध का डंका बजता है और कही पढ़ा था की RBI भी उनकी नीति पर ही काम करती है... किसी ने मुझे बताया था उनके अर्थशाष्त्र की किताबो को यहाँ प्रतिबन्ध किया हुआ है.. पर क्यूँ किया है इसका उत्तर खोज रहा हूँ???See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv सर जब मनु ने एक किताब लिखी तब से शायद ये हाय तौबा चालू हुआ थोड़ा संशोधन करे...See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv बिलकुल सर हो सकता है... लेकिन इस समस्या को जल्दी निबटाना होगा क्यूंकि भारत फिर गुलामी की ओर अग्रसर है....See Translation
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki वर्ण व्यवस्था आध्यात्मिक है।

      जाति व्यवस्था मानसिक है।


      जाति से केवल यह देखा जाता कि वह शब्द पूर्वाभास में बुद्धि युक्त हे या बुद्धि हीन।
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    • Sumant Bhattacharya
    • Sumant Bhattacharya Er Narendra Nohar Dhruvदो सौ साल इसलिए कि..इस दरम्यान भारत की सामाजिक उत्पादन प्रणाली का औपनिवेशीकरण हुआ और इसी दौरान जाति यानि कास्ट को भारत पर अंग्रेजों ने थोपा, और फिर अंग्रेज और पादरियों के उपलब्ध तथ्यों पर अंबेडकर ने दलित राजनीति की बुनियाद रखी। डाक्टर त्रिभुवन का शोध, बता रहा है कि भारतीय समाज दोषमुक्त है.....फिर चाहे आरक्षण जारी रखे या नहीं...यह सत्ता का काम है। लेकिन शेष भारत को गुनहगार ठहरा कर तो समुच्चय में विकास संभव ही नहीं है।See Translation
    • Rajesh Kumar Dubey
    • Rajesh Kumar Dubey मनू स्मृति से आज तक यह बुद्दिजीवी लोंग बहार नहीं निकाल पाए है ... ???See Translation
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh Sumant Bhattacharya दा तथ्यात्मक लेखन है आपका /
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki मनू स्मृति से आज तक यह बुद्दिजीवी लोंग बहार नहीं निकाल पाए है ... ???

      क्योकि। दलित बुद्धिहीन होते इसलिए।
      See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv दादा पुरे भारत की नहीं सिर्फ विचार की बात कर रहा हूँSee Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv दुबे साहब जब यहाँ आंबेडकर की बात होगी तो मनु भी बीच में आएगा ही।।।। पहले ऊपर मेरे कमेन्ट पढ़ ले फिर मुझसे बात करे...See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv दादा त्रिभुवन सर का शोध बता रहा है इससे आप का क्या अभिप्राय है...See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv यदि अंग्रेज भारत नहीं आते तो भारत की दशा क्या होती ???See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv सुमंत दा अंग्रेजो को किसी ने तो न्योता दिया ही होगा और यदि नहीं दिया तो यहाँ व्यापार करने को बढ़ावा कैसे मिला ????See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv दादा भारत की सामजिक ढांचा तो 1000 साल पहले ही बनाया गया... और उस संरचना में सेंध मार कर ही अंग्रेज प्रबल हुए इस बात को मानते है की नहीं ????See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv दलित वाद आंबेडकर के कारण हुआ लेकिन उसके पहले क्या सब कुछ ठीक था... ???? क्या सभी में समानता और सदभाव के भाव थे ???? क्या हम सिर्फ एक ही जाति में थे क्या ???See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv आम्बेडकर क्यूँ इतना मगज मारी किये .????See Translation
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh डॉ आंबेडकर इकॉनमी के एक स्कॉलर थे / रुपये पर उनका शोध पत्र अद्वितीय है , ऐसा सारे आर्टशाश्त्री मानते हैं /
      लेकिन सोचने वाली बात ये है कि जिन विश्वविद्यालयों में वे पढ़े, उस समयकाल में कौन सा अर्थशास्त्र पढ़ाया जाता था ? कार्लमार्क्स के 1853 के लेखों
      में semibarberic करार दिए गए भारतीयों की अर्थव्यवस्था तो शायद उन पाठ्यक्रमों में नहीं रहा होगा /
      गांधी जब भारत की राजनीती में पैर रखने की तैयारी से 1915 में भारत आये तो गोखले ने उनको कहा कि पहले भारत के गावों में परिव्राजक की तरह भ्रमण करो , फिर राजनीति में कदम रखो / गांधी ने उनकी बात मानी और तीन साल तक भारत भ्रमण करते रहे , तभी शायद वे गांधी बन पाये / डॉ आंबेडकर को ये सलाह देने वाला कोई था नहीं, इसलिए वे गावों कि तरफ कभी गए नहीं / यहीं से उनका भारत के मूल से नाता टूट गया , और उन्होंने भारत की तत्कालीन सामाजिक समस्यायों का हल bigot ईसाई विद्वानों और पादरियों द्वारा लिखी "संस्कृत के ओरिजिनल टेक्स्ट्स " में खोजने का प्रयास किया /
      और अगर आप ये मानते हैं कि ये Bigot ईसाई और पादरी भारत में फिलैंथ्रॉपी करने आये थे , तो आप मेरे सवाल को सिरे से ख़ारिज कर दीजिये /
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki डॉ अम्बेडकर एक बुद्धिजीवी थे।

      ऐसा दलित वर्ग मानता है।
      ...See More
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    • देवेन्द्र सिकरवार
    • देवेन्द्र सिकरवार जब कोई भी विमर्श यथार्थ की अनदेखी कर केवल सैद्धांतिक पक्ष तक सीमित हो जाता है तो समाज पर उसका असर भी सीमित ही रह जाता है . ह्मारे प्रति समाज के वास्तविक व्यवहार का असर हमारे विश्लेषण पर भी पडता ही पडता है क्यों कि मानव मन निरपेक्ष होकर सोच ही नहीं सकता और बाबा साहेब या डॉ. त्रिभुवन सिंह सर भी इसके अपवाद नहीं हो सकते . ( अब देखिये मेरे मन बुद्धि ने ये कमेंट भी ऊपर के विमर्श के आलोक में ही तो दिया है . wink emoticonSee Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv बिलकुल नहीं सर... सबसे पहली बात की उनको पढ़ने लिखने से जिन कारणों ने भारत में रोका उसके कारण उन्होंने भारत से बाहर जा कर उन तत्थों की खोज की... यहाँ तो उनको आसानी से कुछ मिला नहीं तो स्वाभाविक से बात है उनको बाहरी सहारा लिया... अब उन्होंने इसाई पादरियों के लिखे को फॉलो किया इससे शायद आपको अच्छा नहीं लग रहा हैना ??? बात यही है ना... और आप ने ठीक कहा उनको यहाँ की स्तिथि बताने वाला कोई मिला नहीं..... गांधी जी को किस्मत वाले निकले जो उन्हें गोखले मिले... मगर यदि गांधी जी को द.आफ्रिका में धक्का नहीं लगता तो क्या गाँधी होते...See Translation
    • देवेन्द्र सिकरवार
    • देवेन्द्र सिकरवार बाबा साहेब भी इसी द्वंद् में थे . एक ओर तो उनके प्रति समाज का अपमानजनक निर्दयतापूर्ण व्यवहार उनमें हिंदू धर्म के प्रति आक्रोश उत्पन्न करता था और दूसरी ओर कुछ ब्राह्मणों और गायकवाड जैसे संभ्रांत लोगों का उदार और मानवीय ववहार तथा हिंदुत्व में विचार की आजादी उन्हें अपनी संस्कृति से जोडे रखने को मजबूर करती थी . उनके चिंतन को क्या इसके अलोक में देखना सही नहीं होगा ?See Translation
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh जिस दिन आदमी निस्पक्ष सोचने लगता है , सर्व समाज के हित कि बात सोचता है , समाज के सारे वर्ग को सम्मान और दायित्वा युक्त मान लेता है , वो ऋषि कहलाता है / और मैं ऋषित्व के ऋ से भी अनभिज्ञ हूँ देवेन्द्र सिकरवार ji .
    • देवेन्द्र सिकरवार
    • देवेन्द्र सिकरवार नहीं सर मैंने आप पर व्यंग नहीं किया था . मैं एसा सोच भी नहीं सकता सर .See Translation
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki अस्पर्शता का मानसिक आघात निष्पक्ष सोच को कैसे बना सकता हे।

      वह तो दल हित ही सोचेगा।
      See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv सुरेन्द्र सर आप समझ रहे है मुझे ये देख के अच्छा लगा लेकिन त्रिभुवन सर अपने उस नज़रिए से बाहर नहीं आना चाहते और उसी नज़रिए से विश्लेषण करने में लगे है, खैर ये उनका पक्ष है... मैं उनके मनः स्तिथि को समझ रहा हूँ... लेकिन वो जिस दिशा में जा रहे है या यों कहे की देख रहे है उधर सिर्फ कोरी बहस ही है उससे कुछ भी हांसिल नहीं होना है और ये बात उन दलित चिन्तको के लिए भी है... मेरी चिंता मानववाद है और मैं हर तरह से उन दोनों वादों से लडूंगा/बहस करूँगा/ जो करना पड़ेगा करूँगा लेकिन इनको वो UHD लेंस लगवा के रहूँगा... सादरSee Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv सुरेन्द्र सर बिलकुल ठीक कहा... See Translation
    • देवेन्द्र सिकरवार
    • देवेन्द्र सिकरवार सैद्धांतिक तौर पर त्रिभुवन सर के शोध की उपेक्षा तो नहीं ही की जा सकती पर परेशानी यह है कि दलित चिंतकों का जोर विमर्श पर कम " प्रतिशोध " पर ज्यादा है .See Translation
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki आज भी दलित इसी उलझन में हे।

      उसकी बुद्धि होने के बाबजूद क्या सवर्ण समाज उसे स्वीकार करेगा उसके शब्द के साथ जिसे सवर्ण बुद्धि हीन अहंकार विहीन समझता है।


      आज सवर्ण समाज को दलित को बुद्धिहीन कहने में गर्व होता है। आरक्षित वर्ग को अयोग्य कहने में गर्व होता है।

      यह केवल मानसिक अहंकार है। यही सवर्ण और दलित के बीच की खाई है।

      और कोई पढ़ लिख जाए तो उसकी गलती ढूंढने में आनंद मिलता है।
      See Translation
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki देवेन्द्र सिकरवार जी।

      त्रिभुवन जी के लेख की उपेक्षा करना भी मत।


      बुद्धि के कारन हम 2000 साल के कल्पना को 150 साल के धरातल पर ले आये।

      ये इनका सबसे अच्छा योगदान हे।
      See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv देवेन्द्र भाई हम त्रिभुवन सर के शोध पर की उपेक्षा बिलकुल भी नहीं कर रहे हम तो उनके प्रशंसको में से है लेकिन सर जिस नजरिये से सब आकलन कर रहे है उस पर असहमति जता रहे है..See Translation
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh Er Narendra Nohar Dhruv ji आप की बात एकदम ठीक है, सूचनाओं के श्रोतों ने ही डॉ आंबेडकर जैसे स्कॉलर को भ्रमित किया / अब जिन विद्वानों को उन्होंने अपने पुस्तकों में बहुतायत से कोट किया है , उसमे एक जॉन मुइर भी है , जो 19 साल की उम्र में भारत आता है ,भारतीय सिविल सर्वेंट बनकर , 29 की उम्र में ( यानि अगले १० साल में संस्कृत सीखता है , सरकारी नौकरी के साथ साथ ) समस्त संस्कृत ग्रंथों को पढ़कर "मत्परीक्षा " नामक पुस्तक लिखता है , जिसमे वो ईसाइयत को हिंदूइस्म से श्रेष्ठ साबित करता है / आगे जाकर वो "ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट्स " नामक ग्रन्थ भी लिख मारता है /
      अब इसको आप पचा सकते हैं , और किसी किताब के "ओरिजिनल " लिखे होने से ही उसे ओरिजिनल मान लेते हैं तो भगवन ही मालिक है / मैं कुछ नहीं बोलूंगा /
    • देवेन्द्र सिकरवार
    • देवेन्द्र सिकरवार सर आप नाराज ना होइये . आपसे सहमति या असहमति की बात तो बाद में पर आपके ज्ञान से हम अपने आपको वंचित होने की इजाजत नहीं दे सकते .See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv हा हा हा हा हा.... सर सब बुद्धि और विवेक है... मैं कहता हूँ की जो देखा लिखा वो तो यही से ही ना... जो अपने ग्रंथो और किताबो में लिखा है उसी को उसने अपने विचारो से लिखा.. अभी अभी एक खबर आई थी की एक लेखिका ने "इन्हिलेषण आफ कास्ट" को अपने नाम से बाज़ार में लाया है... अब इसमें जो पढ़ा जाएगा वो तो उनके विचार होंगे लेकिन मूल लेख तो आंबेडकर का ही होगा ना...See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv और सर रही बात मैं किसी चीज़ को जब पचाता हूँ जब खाता हूँ... और अभी तक मैंने उस किताब को खाया नहीं है...See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv हमारी बुरी आदत है सर की जब तक किसी चीज़ को चारो तरफ से परख और ठोक बजा न ले कुछ कहते नहीं... जो गलत है वो गलत है इसे ना आप और ना हम झुठला सकते है... और जो सही है उसे हम कितना भी मिल के गलत बोल ले वो सही ही रहेगा...See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv लेकिन याद रखे की इस देश को बहुत से बुद्धिजीवी और ज्ञानियों की आवश्यकता है, और हम सभी को चाहिए की हम एक हो जोकि निहायत ही जरुरी है... ये आज के पोस्ट पर असहमति मात्र है...मगर मानवता के विकास में हम आपके साथ हर पल हर घड़ी सायें की तरह रहेंगे... अब आज्ञा दे थोड़ा काम निबटाना है... सादरSee Translation
    • Arun Kumar
    • Arun Kumar Er Narendra Nohar Dhruv G, बाबा को किसने पढ़ने से रोका? बाबा के समय मे अँगरेजों का राज था।See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv त्रिभुवन सर, सुमन्त दा, सुरेन्द्र सर और देवेन्द्र भाई आप सभी का सार्थक बहस के लिए आभार ...See Translation
    • Er Narendra Nohar Dhruv
    • Er Narendra Nohar Dhruv अरूण भाई सब जानते है छूवा-छूत टाइप का भी कुछ होता था शायद हैना... अभी जल्दी में हूँ माफ़ करना बाद में बात करूँगा...See Translation
    • Arun Kumar
    • Arun Kumar Er Narendra Nohar Dhruv G, मौलाना रशीदुद्दीन जो रामानंदजी के समकालीन थे उनकी एक किताब है तजिकिरातुल-फुकरा के अनुसार रामानंद जी के बारह प्रमुख शिष्य थे- अनंतानंद, कबीर, सुखानंद, सुरसुरानंद, पदमावती, नरहर्यानंद, पीपा, भावानंद, रविदास, धन्ना, सेन, सुरसुरी। सभी अलग अलग जाति के है।यहाँ तक की महिला भी थी। रामानंदजी का समयकाल है संवत 1400 अब प्रश्न है कि क्या उस समय समाज मे छुआ-छुत नहीं था।See Translation
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki मुझे लगता है। मेरा सोचना बिलकुल सही है।

      सवर्ण बुद्धि और अहंकार युक्त
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    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki अब

      स से सवर्ण।
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    • Shekhar Bharti
    • Shekhar Bharti solanki sir inke पेट में दर्द इसी बात का है debate to frustation m krte h
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki शेखर जी। आप मेरी पोस्ट ध्यान से अगर देखें। तो पाएंगे।

      इनमे और आपमें केवल अहंकार का अंतर है। और किसी बात का नहीं।


      जिस दिन दोनों और से अहंकार ख़त्म हो गया उस दिन सब शांत हो जायेगा।
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    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki में अहंकार पर चोट कर रहा केवल।

      वो चाहे दलित का हो या सवर्ण का।


      यही में हमेशा करता रहूंगा। मुझे सभी के चित्त में ब्रह्म पुरुष जो डालना है। आध्यात्मिक हूँ। तरीके अलग हैं।
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    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki सवर्ण और दलित में अहंकार का अंतर हे। बुद्धिहीन और बुद्धि युक्त केवल पूर्वाभास हे असलियत में दोनों बुद्धि इस्तेमाल कर रहे।

      अहंकार शब्द से चिपकने का नाम है। इस्तेमाल चित्त करे तो वही चिपकाना अहंकार नही होता।
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    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh सवर्ण यानि एक खास किस्म के चमड़ी के रंग वाला ?? ये तो बताया विद्वान संस्कृतज्ञ ईसाईयों ने ।
      लेकिन ये न बताया कि वो रंग कौन सा है काला सफ़ेद नीला पीला या सतरंगी??
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki एक बात मेरी जानकारी के लिए।

      सवर्ण शब्द क्या संस्कृत में है। और कब से इस्तेमाल करना शुरू किया।
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    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh है तो लेकिन आप अध्यापक हैं संस्कृत के तो मेरे अधिकार क्षेत्र के बाहर आता है
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki मैंने भी राजनेतिक गलियारों में सवर्ण देखा है।See Translation
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki मन बुद्धि अहंकार और चित्त।

      आज के परिपेक्ष में केवल मुझे दो ही वर्ण नजर आ रहे।


      एक वैश्य और एक क्षत्रिय।

      सभी के पास मन बुद्धि अहंकार सब है। कमी तो चित्त की।कमी तो ब्रह्म पुरुष की।
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    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh सूचनाओं के श्रोतों का मामला बड़ा विचित्र है ।गांधी और आंबेडकर के पास सूचना के सामान श्रोत होते हुए भी गांधीं ने गीता का भाष्य लिखा- गीता माता ।
      वहीँ डॉ आंबेडकर को एनी बेसेंट के " One sixth generic depressed class" के दलित होने के कारन की खोज करने के लिए के लिए झोला छाप ईसाई पादरियों की शरण लेनी पड़ी ।
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki गांधी जी तथाकथित छूट थे।
      आंबेडकर जी तथाकथित अछूत थे।


      इसलिए ये अलग हो गया।
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    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki दलित आज भी कितना भी पढ़ ले। वह सामाजिक मानस में रहता दलित ही है। क्यों।

      क्यों की वह चित्त को उस स्तर पर नही ले जा पा रहा जहाँ से ब्राह्मण का चित्त शुरू होता।
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    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki दलित चिंतक। आपको बताते कोई ब्राह्मण अहंकार हे जो हमे दबा रहा।

      ब्राह्मण शब्द के बोझ तले व्यक्तियो से मैंने खूब बात की। नार्मल अहंकार है। वही जो किसी भी व्यक्ति में जिन्दा रहने के लिए होता।


      उससे इतना डरने की कौन सी बात है।

      कहीं ये ब्राह्मण अहंकार का हौआ तो नहीँ।
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    • Adarsh Gupta
    • Adarsh Gupta lali mere lal ki, jit dekhoon mein laal ,laalee dekhan zo mein gayee : mein bhee ho gayee laal !See Translation
    • Adarsh Gupta
    • Adarsh Gupta we never get the reason why we love or like something/somebody we just love/like it any ways !
    • Adarsh Gupta
    • Adarsh Gupta shaq/waham/ahankaar kaa trishool ziske gad gayaa wo kaam se gayaa !
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki आदर्श जी।

      ये किस्सा मन के स्तिथी का हे जो कहती में जन्म से कुछ।


      बुद्धि का केवल।
 

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