Thursday, 1 October 2015

history of caste in India - भाग 2

  • Gopal Jee Shambuk shudra kaise ho gaya ?
  • Surendra Solanki
  • Surendra Solanki मुख कौन है?, हाथ कौन है?, जंघा कौन है? और पाँव कौन है? यजुर्वेद (31.10) ब्राहमण मुख है, क्षत्रिय हाथ हैं, वैश्य जंघा हैं तथा शूद्र पैर हैं | यजुर्वेद (31.11)

    ये सब कुछ ब्रह्म पुरुष के हिस्से हैं। जिसे साधना में साधा जाता है
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  • Tribhuwan Singh
  • Tribhuwan Singh कर्म के स्वाभाव से उत्पन्न प्रभाव से।
  • Tribhuwan Singh
  • Tribhuwan Singh यानि वृत्ति की प्रवृत्ति से।
    और चित्त की भी एक वृत्ति होती है।
  • Kanhaiya Lal
  • Kanhaiya Lal वेद में तो व्रह्मा को निराकार बताया गया है तो ये मुख हाथ पैर जांघ कंहा से आई ?See Translation
  • Surendra Solanki
  • Surendra Solanki ब्रह्म पुरुष का सा कार् स्वरुप आप
  • Surendra Solanki
  • Surendra Solanki चेतना के स्तर पर।

    शुद्र वह व्यक्ति जिसमे केवल मन में चेतना हो। उसमे बुद्धि अहंकार और चित्त नही हो।


    चेतना के स्तर।

    शुद्र मन
    वैश्य मन बुद्धि
    क्षत्रिय मन बुद्धि अहंकार
    ब्राह्मण मन बुद्धि अहंकार चित्त।

    ये सब ब्रह्म पुरुष के हिस्सेहें और साधना में चरण भी।
  • Surendra Solanki
  • Surendra Solanki Shambuk shudra kaise ho gaya ?

    हर एक व्यक्ति मानसिक अवस्था में शुद्र ही तो है।


    शुद्र जब मन चेतन हो।

    • Surendra Solanki अर्थ : समाज में ब्राह्मण या बुद्धिजीवी लोग समाज का मस्तिष्क, सिर या मुख बनाते हैं जो सोचने का और बोलने का काम करे | बाहुओं के तुल्य रक्षा करने वाले क्षत्रिय हैं, वैश्य या उत्पादक और व्यापारीगण जंघा के सामान हैं जो समाज में सहयोग और पोषण प्रदान करते हैं, जिस तरह पैर शरीर के आधार हैं जिन पर शरीर टिक सके और दौड़ सके उसी तरह शूद्र या श्रमिक बल समाज को आधार देकर गति प्रदान करते हैं |

      हर एक व्यक्ति में ये सभी गुण फिर क्यों होते।

      आज के समय सभी शुद्र वैश्य क्षत्रिय और ब्राह्मण हैं।

      मन बुद्धि अहंकार और चित्त सभी में।
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    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki साधना में सब कुछ मन यानी शुद्र करता है।

      मन को चक्रों में उलझ कर ज्ञान प्राप्त किया जाता है।


      ठीक उसी तरह जेसे समाज में राजनीती दलितों को चक्कर में डाल देती।
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    • Kanhaiya Lal
    • Kanhaiya Lal वेद में जो भी कंट्रोवर्सिअल बातें मिलती है वो सिर्फ अथर्व वेद में मिलती है । कई विद्वान अथर्व वेद को वेद मानते भी नही । सबसे प्रमाणिक वेद ऋग्वेद है । वेद की भाषा इतनी क्लिष्ट है की उसके अर्थ को समझने में लोग अक्सर गलती कर बैठते है । गीता में दो जगह सूद्र का वर्णन हुआ है जिसका रेफरेंस मै ऊपर दे दिया हूँ । गीता भी कर्म के अनुशार 4 वर्ण की बात करती है । जिसमे कुछ भी गलत नही है । ये चार वर्ण श्वाशत सत्य है । यंहा जाति जैसी कोई बात नही है । हाँ बात जब आती है मनुस्मृति की तो उसमे कर्मकांड इतने ज्यादा बता दिए गए है की वो सामान्य जीवन के लिए अवांक्षनीय है । मुझे लगता अथर्व वेद और मनुस्मृति के कर्म कांड ही जातियों में असंतोष का एक बहुत बड़ा कारण बने होंगे । जो कालान्तर में बुद्ध जी के वैचारिक रूप से प्रकट हुए थे । कुल मिलकर मेरा ये कहना है किसी भी प्रमाणिक मूल ग्रन्थ में व्यक्तियों को जन्म के आधार पर जात में नही बाटां गया है । पर मैं ये मानता हूँ इसका स्वरुप बिगड़ा जंहा जन्म को वरीयता दी गयी...यही बाद में जातिवाद बनके उभरा । Prashant KumarSee Translation
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh जब तक मूलग्रंथों को न पढ़कर विद्वान ईसाई यूरोपियों से हम संस्कृत पढ़ते रहेंगे तब तक धुंध छाया रहेगा।
    • Arun Kumar
    • Arun Kumar Kanhaiya Lal G, आप से एक निवेदन है आप धर्म जात जाति इन सब पूर्वाग्रह से बाहर निकल कर केवल दर्शन शास्त्र समझ कर पढ़े। वेद उपनिषद रामायण महाभारत इत्यादि सभी ग्रंथों का अलग अलग समय काल है।यही सनातन परंपरा है। धर्म और रिलीजन इन सब का परिभाषा अलग है।See Translation
    • Kanhaiya Lal
    • Kanhaiya Lal ग्रंथो में बात को अक्सर प्रतीकात्मक रूप में कहा गया है । ब्ऱह्मण की बात सरीर के सबसे ऊपरी भाग मुख मस्तिष्क से करने मतलब ये नही की ब्ऱह्मण सबसे ऊपर हो गया । इसका अभिप्राय ये है । ब्ऱह्मण वो है जिसने ज्ञान अर्जन करके मस्तिष्क विकसित कर लिया है और मुख से ज्ञान का प्रसार करता है । कहने का मतलब ब्ऱह्मण मनुष्य शरीर के ऊपर वाले भाग जैसा होता है । यंहा शरीर के ऊपर वाले भाग को लोगों को ब्ऱह्मण के गुण समझाने के लिए प्रतीकात्मक सहारा लिया है । कृपया ऐसे ही अर्थ क्षत्रिय, वैश्य और सूद्र के लें ।See Translation
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki कन्हाई जी।

      चेतना के स्तर पढ़ें। कहीं आपको गलत लगता है
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    • Kanhaiya Lal
    • Kanhaiya Lal वेद में ही कंही आया है । हर मनुष्य जन्म लेते समय सूद्र होता है । अपने कर्म के अनुशार वो वैश्य, क्षत्रिय और ब्ऱह्मण बनता है । इसमें कुछ भी गलत नही है । व्यसाय का कर्म करोगे व्यापारी हुए यानि वैश्य । सामाजिक रक्षा का कर्म किये यानि क्षत्रिय । ज्ञान प्रसार का कर्म किये यानि ब्ऱह्मण । यंहा जन्म के आधार पर कोई पंडित ठाकुर चमार पासी हुआ क्या ??See Translation
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शुद्र सारे विषेसन हैं। साधना और चेतना के स्तर हैं।See Translation
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh Surendra Solanki now you start a coaching of "chetana" . chetan man chetan aatma chetan dhee chetan bramh aadi
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki तथाकथित शुद्र शब्द से चिपके लोगो की समस्या ब्राह्मण की चेतन अवस्था नही है। सभी लोग बहुत सालों से किसी न किसी तरह गुरुओ से जुड़े हुए हैं।

      उनकी समस्या ब्राह्मण शब्द से चिपके लोग जो अपनी शुद्र स्तिथी से बाहर आना नही चाहते ।


      ये समस्या है।
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    • Kanhaiya Lal
    • Kanhaiya Lal जी मैं कोई पूर्वाग्रह से ग्रसित नही हूँ । वही बात कहूँगा जो सत्य है । मानना न मानना आपके ऊपर है । एक बात जो भी ब्ऱह्मण है उनको अपनी बात सरल और सीधे सब्दो करना चाहिए । इतना घुमाफिरा के कहने की कोई जरूरत नही । कुछ भी न बताइये ...सिर्फ गीता के उनकी श्लोक का अर्थ सरल सब्दो में बताइये । निष्कर्ष वही निकलेगा जो गीता में कहा गया है । पहले स्पष्ट निष्कर्ष समाज के सामने रखिये ।फिर आज के परिपेक्ष्य में समस्याओं को देखिये । निष्कर्ष के विपरीत आज की जो भी समस्याएं हो उन्हें लिस्टेड कीजिये । तभी कोई सही समाधान निकलने के रस्ते मिलेगें । बिना ऐसा किये ...सिर्फ आक्षेप लगाते रहिये । ये सालोंसाल चलता रहेगा बिना किसी आउटपुट के । Prashant KumarSee Translation
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki कन्हैया लाल जी।

      आप या कोई और अपने को शुद्र क्यों समझता।
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    • Kanhaiya Lal
    • Kanhaiya Lal त्रिभुवन सर की इतनी बड़ी सूद्र पर रिसर्च का सार यही है । जन्मजात हर कोई सूद्र होता ।
      एक बात और कितने बड़े ब्ऱह्मण क्यों न बन जाओ हर व्यक्ति को हर रोज़ सूद्र वाला काम करना पड़ता है । कहने का मतलब दिन भर में भले ही 2 मिनट (कम से कम) के लिए ही सही ...हर कोई सूद्र होता है । जिसने भी वेद गीता को ठीक से समझा है वो मेरी बात को गलत साबित नही कर सकता । ये मेरा चैलेंज है ।
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    • Arun Kumar
    • Arun Kumar किसी एक श्लोक से गीता को परिभाषित नहीं किया जा सकता।गीता के पूरे दर्शन को समझा जाये तो उन श्लोको को भी समझा जा सकता है। आप समय निकाल कर विनोबा भावेजी का लिखा गीता अनुवाद पढे।See Translation
    • Kanhaiya Lal
    • Kanhaiya Lal सही प्रश्न । अगर कोई सूद्र जाति में पैदा हुआ व्यक्ति ज्ञानार्जन के बाद भी सूद्र जैसा समाज में तिरस्कृत कर दिया जाये तो वह अपने को क्या समझे ?? आप ही बताइये !See Translation
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki साहब चेतना के स्तर देखें।

      तिरिस्कार करने वाले शुद्र अवस्था में ही हैं
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    • Kanhaiya Lal
    • Kanhaiya Lal जी हम गीता को परिभासित नही कर रहे । वैसे भी वर्ण की बात कुछ ही जगह आई है तो उसी सन्दर्भ में बात करेगें न की पूरी गीता लेकर बैठ जायेगे ।See Translation
    • Kanhaiya Lal
    • Kanhaiya Lal तो हो गया न । जो इस ज्ञान को न माने वो सूद्र । कहानी ख़त्म । अब अपनी इसी बात पर स्थिर रहिएगा प्लीज । क्योंकि मै अपने रिसर्च का कीमती समय इस वार्तालाप में लगा रहा हूँ । निरर्थक बात करने से क्या फायदा ।See Translation
    • Arun Kumar
    • Arun Kumar कन्हैयाजी, आपसे विमर्श कर अच्छा लगा। धन्यवाद। अब वैश्य बनने का समय हो गया है।See Translation
    • Kanhaiya Lal
    • Kanhaiya Lal हमारा उद्देश्य सार्थक कामो का होना चाहिए । अगर त्रिभुवन सर की इतनी बड़ी रिसर्च किसी सूद्र के घर जन्म लेने वाले ज्ञानार्जन के बाद भी ब्ऱह्मण केटेगरी का बोध न करा दे तो ये मेहनत व्यर्थ है। Tribhuwan Singh sir क्या आप सहमत है मेरी बात से ?? Prashant KumarSee Translation
    • Kanhaiya Lal
    • Kanhaiya Lal हा हा हा grin emoticonSee Translation
    • Kanhaiya Lal
    • Kanhaiya Lal और मेरा सूद्र बनने का समय grin emoticonSee Translation
    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki कन्हैया लाल जी।

      आप दो मिनट की बात कर रहे।
      ...See More
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    • Surendra Solanki
    • Surendra Solanki असल बात यह है कि जो लोग जन्म से ब्राह्मण शब्द से चिपके हुए लोग हैं। उन्हें यही नही पता मानसिक अवस्था में ब्राह्मण शब्द से चिपकना ही शुद्र अवस्था है।See Translation
    • Kanhaiya Lal
    • Kanhaiya Lal हमेशा सब्द पर मुझे आपत्ति है Surendra Solanki जी । हमेशा एक ऐसा सब्द है जो परमज्ञानी ही उपयोग करे तभी ठीक लगता है । हमेशा सब्द हमारी सीखने की, ज्ञानर्जन के रास्तो को बंद करता है । मुझे लगता है इससे परहेज करना चाहिए हम अपूर्ण ज्ञानियों को । बाकी ठीक है ।

      • Surendra Solanki शायद आपको शब्द के पूर्वाभास पर आपत्ति है।

        शुद्र शब्द का सामाजिक मतलब निम्नता सेवक बनाया गया।


        लेकिन आध्यात्मिक अर्थ

        साधना की प्रथम अवस्था। मनसिक अवस्था है।

        क्या आपत्ति है। सामाजिक स्तर पर जब तक सभी आध्यात्मिक या चेतना के स्तर को समझने वाले नही हो जाते तब तक ये निम्नता को सम्बोधित होता रहेगा और जो सम्बोधन कर रहहोगा उसे नही पता की वही निम्न अवस्था में है।
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      • Kanhaiya Lal
      • Kanhaiya Lal अब आपकी बात अपेक्षाकृत ज्यादा ग्राह्य है । यही तो समस्या देखी है मैंने अक्सर ज्ञानीजनों में । समाज में ज्यादातर लोग सामान्य बुद्धि वाले पैदा होते है । ये प्रकृति का नियम है । बुद्धजीवियों को चाहिए की वो अपनी बात में सरलता रखें । आज की जाति व्यवस्था के...See MoreSee Translation
      • Tribhuwan Singh
      • Tribhuwan Singh सत्य वचन Kanhaiya Lal ji

        • Surendra Solanki अब मेरी भी यही समस्या थी। जन्म से आपने को शुद्र और अस्पर्श मान रहे थे।

          साधना की अवस्था और चेतना की अवस्था जब खुद की तब समझ में आया ये तो मानसिक स्तर है।


          और फिर ब्राह्मणों से बात की। वे भी सिर्फ मानसिक स्तर पर छोटी से बुद्धि इस्तेमाल करने वाले लगे।

          तो फिर ब्रह्म को साधेगा कौन??
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        • Kanhaiya Lal
        • Kanhaiya Lal सही बात । पर हर व्यक्ति आपके जैसा साधना और चेतना की अवस्था नही कर सकता । सबकी अपनी अपनी रूचि अपना स्वभाव होता है । अगर हमने आपने सत्य को जितना भी जाना है उसको सामान्यजन तक सरल तरीके से पहुचाये तो समाज में व्याप्त ये पूर्वाग्रह धीरे धीरे कम होता जायेगा । ध्यान रहे चाहे अच्छाई हो या बुराई 100% कभी नही रही है । थोड़े बहुत सूद्र पूर्वाग्रह से ग्रसित लोग हर काल में रहेगे । थोड़े बहुत पूर्वाग्रह से ग्रसित ब्ऱह्मण, क्षत्रिय, वैश्य भी हर काल में रहेगे । अगर ऐसे लोगों की संख्या हम लोग कम कर पाएं तो निसंदेह अच्छे समाज के निर्माण में ये उल्लेखनीय योगदान होगा ।See Translation
        • Tribhuwan Singh
        • Tribhuwan Singh Kanhaiya Lal ji संस्कृत में ज्ञान और विज्ञानं की अलग परिभाषा है /
          "मोक्षे धीः ज्ञानं
          अन्य विज्ञानं शिल्पशास्त्रयोः"

          लेकिन जब विज्ञानी लोग ज्ञान को परिभाषित करेंगे तो क्या होगा ?
          अर्थ कि अनर्थ ??
        • Arun Kumar
        • Arun Kumar Surendra Solanki, जब हम किसी को तथाकथित जाति सूचक शब्दों से सम्बोधित करेंगे वह प्रतिक्रिया करेगा।जैसे आपने लिखा-ब्राह्मणों से बात की-इस शब्द ध्वनि से ही प्रतिक्रिया जन्म लेता है। सामान्यतः हम सोचते है कि ब्राह्मण मे अहंकार होता है। आप एक प्रयोग कर देखें किसी ब्राह्मण को बोल कर देखें- क्या ब्राह्मण-उसे उस शब्द ध्वनि से सम्मान वोध नहीं होगा। वह प्रतिक्रियात्मक उत्तर देगा।अहंकार संस्कारी दोष है। इस विषय पर हमने आप से विमर्श किया था।See Translation
        • Kanhaiya Lal
        • Kanhaiya Lal बेहतर होगा जो जिस फील्ड का मास्टर है वही उसकी बात को रखे । पर किसी ज्ञानी को विज्ञानी और किसी विज्ञानी को ज्ञानी बनने में कोई बैरियर नही है । जैसे की आप, जंहा तक मैं जानता हूँ, मूल रूप से विज्ञानी है । पर यंहा ज्ञान की बात कर रहे । ठीक उसी तरह मै भी विज्ञानं क्षेत्र में ही कार्यरत हूँ । पर वेद शास्त्र को मौका मिलने पर पढ़ता हूँ । दूसरों की सुनता हूँ । फिर मेरे समझ में जो आता है उसे कहता हूँ ।See Translation
        • Tribhuwan Singh
        • Tribhuwan Singh बैरियर कत्तई नहीं है , लेकिन उसके लिए स्वाध्याय और शाधना आवस्यक है / विश्वामित्र विज्ञानी से ज्ञानी बने थे कि नहीं ?
        • Surendra Solanki
        • Surendra Solanki अरुण जी।

          में हमेशा शब्द से चिपके लोग वाक्य का प्रयोग करता हूँ


          व्यक्ति शब्द से चिपकता है। इसी चिपकने को एक तरह का मद कहेंगे
          /

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