भारतवर्ष
में Caste सिस्टम का कोई ऐतिहासिक इतिहास और लेखन 1857 के पहले नहीं
मिलता , हाँ वर्ण व्यवस्था अवश्य थी / अंग्रेजों के शाशन काल में Caste
सिस्टम एक आयातित सोच और फलसफा है / आज जो लोग भी आधुनिक लेखक है उनको
Caste सिस्टम और वर्ण व्यवस्था में कोई अंतर हैं शायद उससे अवगत नहीं है /
भारतवर्ष कि प्राचीनतम और आज तक चलने वाली मूल भाषा संस्कृत है/ संस्कृत ग्रंथों में जाति शब्द का कोई उल्लेख नहीं है , लेकिन अमरकोश के अनुसार जाति शब्द का अर्थ कुछ वन औसधि और सामान्य जन्म भर है / हाँ जात का वर्णन अवश्य है , और १६ संस्कारों में जातकर्म भी एक कर्म कांड का हिस्सा है / जात शब्द का अर्थ उत्पाती पैदाइश कुल परिवार, क्षेत्रीय सम्बद्धता , और गोत्र आदि होता है , साथ ही साथ ये व्यवसाय या पेशे का भी द्योतक होता है / जात एक परिवर्तन शील व्यवस्था थी /कौटिल्य के अनुसार एक ही मान के चार पुत्रों में ब्राम्हण क्षत्रिय वैस्या या शूद्र किसी भी वर्ण में व्यक्ति शामिल हो सकता था , और जीवन यापन के लिए उसी वर्ण के anuroop व्यवसाय चुन सकता था /
लेकिन जब १९०१ कि जनगणना में रिसले ने सोशल hiearchy और अन्थ्रोप्लोग्य के अनुसार २००० से ज्यादा ज्यातियों और ४० से ज्यादा नश्लों को चिन्हित और सूचीबद्ध किया तो आप व्यवास चाहे जो चुन लें लेकिन जाति / caste आपका पीछा नहीं छोड़ेगा / ज्ञातव्य हो कि १८०७ में फ्रांसिस बुचनन ने caste या ट्रेड के नाम पर मात्र १८२ castes कि लिस्ट बनाई थी /
'वंडर ठाट वास इंडिया ' के लेखक A L Basham के अनुसार -" Caste शब्द का उल्लेख होते ही हिन्दू समाज कि व्यवस्था अपने आप ही मस्तिस्क में तिरोहित होने लगती है /बीसवीं शताब्दी के समाजशास्त्रयों ने स्पस्ट रूप से लिखा है कि Caste सिस्टम यूरोपीय समाज का आवश्यक और कानूनी रूप से महत्वपूर्ण अंग था / लेकिन कालांतर ने लेखकों ने इस तथ्य को चालकीपूर्वक छिपा दिया इस तरह Caste सिस्टम मात्र भारतीय हिन्दू समाज का चरित्र बन गया / (1)
A L Basham के अनुसार सोलहवीं सदी में जब पुर्तगाली भारत में आये तो उन्होंने देखा कि भारतवासी कई समूहों में बनते हुए हैं जिनको उन्होंने Castas के नाम से सम्बोधित किया जिसका एकमात्र मतलब था ट्राइब कुल परिवार / लेकिन ये शब्द ऐसा हिट हुवा कि जैसे हिन्दू समाज के साथ चिपक गया / caste शब्द का प्रयोग वे वारं और कासते दोनों ही के लिए सामान भाव से करते थे / प्राचीन भारत में वर्ण का स्पस्ट उल्लेख मिलता है लेकिन caste का नहीं / यदि caste कि परिभाषा एक ऐसे मानव समूह का वर्णन करना है जो रहन सहन खान पान शादी व्याह तथा व्यवसाय कि दृस्टि से समान है तो इसका वर्णन प्राचीन भारतवर्ष में नहीं मिलता है / (२)
अब एक प्रश्न है कि यदि caste System भारत कि एक्सक्लूसिव व्यवस्था है तो पुर्तगाली और बाद में अन्य यूरोपियों को इस शब्द और यसस्टम का ज्ञान कैसे हुवा था /हिन्दुओं और हिन्दू धर्म को ईसाइयत से नीचे साबित करके शाषित वर्ग का मनोबल गिराने का यूरोपीय और ईसाई लेखकों का ये अन्यायपूर्ण और बर्बर दृष्टिकोण था /
तथ्यात्मक तौर पर caste System यूरोपीय और रोमन सभ्यता का एक आवश्यक अंग था ,लेकिन उसको भारतीय समाज पर आरोपित करने का जो खड़यन्त्र रचा गया , आज वीभत्स रूप में आपके सामने खड़ा है / कुछ यूरोपीय लेखको को ही उद्धृत करना चाहूँगा इस लेख के प्रमाण में :
1907 में John Oman Campbell - ने caste System के नाम पर हिन्दुओं को नीचे दिखने कि आलोचना की / ये गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में सोशल साइंस के प्रोफेसर थे / उन्होंने अपनी पुस्तक -" Bramhan Theist and Muslims of India " में लिखा -" जिस caste System को यूरोपियन आश्चर्य और गर्व के साथ आलोचना करते घूम रहे हैं कि यह अत्यंत बकवास और अस्वस्थ सामजिक परंपरा है ,जिसका विश्व में कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलता , वे भूल जाते हैं कि जिस पक्षपात पूर्ण caste System कि आलोचना वो कर रहे हैं ,वह भारत के बाहर भी पायी जाती है , और वो अति सभ्य समझे जाने वाले पश्चिमी देशों में institutinalised है / हमें अपने मस्तिस्क को साफ़ रखना पड़ेगा कि ये एक undeniable तथ्य है कि यूरोप में भी कुछ hereditary caste distinctions हैं , जो पूर्व में कानूनी रूप से मेन्टेन कि जाती थी , और वे वहां आज भी विद्यमान हैं / हिन्दू caste System कि विशेषता इसका वंशानुगत होना है / इस सन्दर्भ में हमें अपनी याददाश्त को जगाना काफी रोचक होगा कि एक जमाना ऐसा भी था कि यूरोप में वंश दर वंश लोगों को अपने पैतृक पेशे को अपनाने को बाध्य कर दिया जाता था और उनको अपना पेश बदलने का अवसर ही नहीं दिया जाता था /
इंग्लॅण्ड के पुराने कानून के अनुसार लोगों को कोयले कि खदानों में या Dry salting के पेशे में पीढ़ी दर पीढ़ी काम करना पड़ता था / इस कानून को George ििि ने अठारवीं शताब्दी में ख़त्म किया यानि जो अंग्रेज हमारे साथ काम कर रहे है उनके पितरों कि आँखों के सामने कि बात है / उससे भी ज्यादा वंशानुगत पेश करने कि बाध्यता रूस में थी जहाँ पिछली शताब्दी तक गुलाम खेती किया करते थे / यूरोप में वंशानुगत गुलामी का बहित लम्बा एयर घृणित इतिहास रहा है / इसका और गहरा अध्ययन करने पर पता चलता है कि एरोप में "Rigid और Tyranical caste System " था जिसको चर्च और कानून दोनों से सुरक्षा प्राप्त थी /(३)
Edward Alsworth Ross ........ने यूरोप में प्रचलित रिजिड कासते सिस्टम को काफी विस्तार से वर्णित किया है जो कि उन्नीसवी शताब्दी के शुरुवात तक जारी थी /वे बताते हैं कि यूरोप में caste System रोमन साम्राज्य का एक हिस्सा था ,लेकिन यूरोप में उसका विस्तार रोमन सभ्यता के कारण नहीं बल्कि सामजिक ताकतों के आपसी टकराव के कारण हुवा था / (४)
प्रूसिया में व्यक्ति की ही नहीं जमीन पर भी जाति का अधिकार था / ऊँची जाति के लोगों कि जमीन नीची जाति के लोग नहीं खरीद सकते थे / लेकिन इस व्यवस्था को 1807 में Emancipation of Edict के द्वारा ख़त्म किया गया /(५)
ओमान ने इंग्राम को क्वोट करते हुए लिखा कि -" रोमन साम्राज्य में वंशानुगत पेशा अपनाने की बाध्यता पूर्व भारत में प्रचलित व्यवस्था से भिन्न नहीं थी / शासक वर्ग के लोग शासन के अनिवार्य अंग थे , और उनको दूसरे समूह (Collegia ) की लड़कियों से शादी की इजाजत नहीं थी / उसी तरह मुनिसिपल्टी और सैनिकों को भी वंशानुगत पेश अपनाने की बाध्यता थी /(६)
Reference :
(1) AL Basham -Wonder that was India P.148
(2)AL Basham -Wonder that was India P.149
(3) John Campbell Oman : "Caste in India " in his book : Bramhan Theist and Muslims in India 1907 P.63-64
(4) Ross 1922 P.322
(5)Ross 1922 P.182
(6) Ingram P.75
भारतवर्ष कि प्राचीनतम और आज तक चलने वाली मूल भाषा संस्कृत है/ संस्कृत ग्रंथों में जाति शब्द का कोई उल्लेख नहीं है , लेकिन अमरकोश के अनुसार जाति शब्द का अर्थ कुछ वन औसधि और सामान्य जन्म भर है / हाँ जात का वर्णन अवश्य है , और १६ संस्कारों में जातकर्म भी एक कर्म कांड का हिस्सा है / जात शब्द का अर्थ उत्पाती पैदाइश कुल परिवार, क्षेत्रीय सम्बद्धता , और गोत्र आदि होता है , साथ ही साथ ये व्यवसाय या पेशे का भी द्योतक होता है / जात एक परिवर्तन शील व्यवस्था थी /कौटिल्य के अनुसार एक ही मान के चार पुत्रों में ब्राम्हण क्षत्रिय वैस्या या शूद्र किसी भी वर्ण में व्यक्ति शामिल हो सकता था , और जीवन यापन के लिए उसी वर्ण के anuroop व्यवसाय चुन सकता था /
लेकिन जब १९०१ कि जनगणना में रिसले ने सोशल hiearchy और अन्थ्रोप्लोग्य के अनुसार २००० से ज्यादा ज्यातियों और ४० से ज्यादा नश्लों को चिन्हित और सूचीबद्ध किया तो आप व्यवास चाहे जो चुन लें लेकिन जाति / caste आपका पीछा नहीं छोड़ेगा / ज्ञातव्य हो कि १८०७ में फ्रांसिस बुचनन ने caste या ट्रेड के नाम पर मात्र १८२ castes कि लिस्ट बनाई थी /
'वंडर ठाट वास इंडिया ' के लेखक A L Basham के अनुसार -" Caste शब्द का उल्लेख होते ही हिन्दू समाज कि व्यवस्था अपने आप ही मस्तिस्क में तिरोहित होने लगती है /बीसवीं शताब्दी के समाजशास्त्रयों ने स्पस्ट रूप से लिखा है कि Caste सिस्टम यूरोपीय समाज का आवश्यक और कानूनी रूप से महत्वपूर्ण अंग था / लेकिन कालांतर ने लेखकों ने इस तथ्य को चालकीपूर्वक छिपा दिया इस तरह Caste सिस्टम मात्र भारतीय हिन्दू समाज का चरित्र बन गया / (1)
A L Basham के अनुसार सोलहवीं सदी में जब पुर्तगाली भारत में आये तो उन्होंने देखा कि भारतवासी कई समूहों में बनते हुए हैं जिनको उन्होंने Castas के नाम से सम्बोधित किया जिसका एकमात्र मतलब था ट्राइब कुल परिवार / लेकिन ये शब्द ऐसा हिट हुवा कि जैसे हिन्दू समाज के साथ चिपक गया / caste शब्द का प्रयोग वे वारं और कासते दोनों ही के लिए सामान भाव से करते थे / प्राचीन भारत में वर्ण का स्पस्ट उल्लेख मिलता है लेकिन caste का नहीं / यदि caste कि परिभाषा एक ऐसे मानव समूह का वर्णन करना है जो रहन सहन खान पान शादी व्याह तथा व्यवसाय कि दृस्टि से समान है तो इसका वर्णन प्राचीन भारतवर्ष में नहीं मिलता है / (२)
अब एक प्रश्न है कि यदि caste System भारत कि एक्सक्लूसिव व्यवस्था है तो पुर्तगाली और बाद में अन्य यूरोपियों को इस शब्द और यसस्टम का ज्ञान कैसे हुवा था /हिन्दुओं और हिन्दू धर्म को ईसाइयत से नीचे साबित करके शाषित वर्ग का मनोबल गिराने का यूरोपीय और ईसाई लेखकों का ये अन्यायपूर्ण और बर्बर दृष्टिकोण था /
तथ्यात्मक तौर पर caste System यूरोपीय और रोमन सभ्यता का एक आवश्यक अंग था ,लेकिन उसको भारतीय समाज पर आरोपित करने का जो खड़यन्त्र रचा गया , आज वीभत्स रूप में आपके सामने खड़ा है / कुछ यूरोपीय लेखको को ही उद्धृत करना चाहूँगा इस लेख के प्रमाण में :
1907 में John Oman Campbell - ने caste System के नाम पर हिन्दुओं को नीचे दिखने कि आलोचना की / ये गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में सोशल साइंस के प्रोफेसर थे / उन्होंने अपनी पुस्तक -" Bramhan Theist and Muslims of India " में लिखा -" जिस caste System को यूरोपियन आश्चर्य और गर्व के साथ आलोचना करते घूम रहे हैं कि यह अत्यंत बकवास और अस्वस्थ सामजिक परंपरा है ,जिसका विश्व में कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलता , वे भूल जाते हैं कि जिस पक्षपात पूर्ण caste System कि आलोचना वो कर रहे हैं ,वह भारत के बाहर भी पायी जाती है , और वो अति सभ्य समझे जाने वाले पश्चिमी देशों में institutinalised है / हमें अपने मस्तिस्क को साफ़ रखना पड़ेगा कि ये एक undeniable तथ्य है कि यूरोप में भी कुछ hereditary caste distinctions हैं , जो पूर्व में कानूनी रूप से मेन्टेन कि जाती थी , और वे वहां आज भी विद्यमान हैं / हिन्दू caste System कि विशेषता इसका वंशानुगत होना है / इस सन्दर्भ में हमें अपनी याददाश्त को जगाना काफी रोचक होगा कि एक जमाना ऐसा भी था कि यूरोप में वंश दर वंश लोगों को अपने पैतृक पेशे को अपनाने को बाध्य कर दिया जाता था और उनको अपना पेश बदलने का अवसर ही नहीं दिया जाता था /
इंग्लॅण्ड के पुराने कानून के अनुसार लोगों को कोयले कि खदानों में या Dry salting के पेशे में पीढ़ी दर पीढ़ी काम करना पड़ता था / इस कानून को George ििि ने अठारवीं शताब्दी में ख़त्म किया यानि जो अंग्रेज हमारे साथ काम कर रहे है उनके पितरों कि आँखों के सामने कि बात है / उससे भी ज्यादा वंशानुगत पेश करने कि बाध्यता रूस में थी जहाँ पिछली शताब्दी तक गुलाम खेती किया करते थे / यूरोप में वंशानुगत गुलामी का बहित लम्बा एयर घृणित इतिहास रहा है / इसका और गहरा अध्ययन करने पर पता चलता है कि एरोप में "Rigid और Tyranical caste System " था जिसको चर्च और कानून दोनों से सुरक्षा प्राप्त थी /(३)
Edward Alsworth Ross ........ने यूरोप में प्रचलित रिजिड कासते सिस्टम को काफी विस्तार से वर्णित किया है जो कि उन्नीसवी शताब्दी के शुरुवात तक जारी थी /वे बताते हैं कि यूरोप में caste System रोमन साम्राज्य का एक हिस्सा था ,लेकिन यूरोप में उसका विस्तार रोमन सभ्यता के कारण नहीं बल्कि सामजिक ताकतों के आपसी टकराव के कारण हुवा था / (४)
प्रूसिया में व्यक्ति की ही नहीं जमीन पर भी जाति का अधिकार था / ऊँची जाति के लोगों कि जमीन नीची जाति के लोग नहीं खरीद सकते थे / लेकिन इस व्यवस्था को 1807 में Emancipation of Edict के द्वारा ख़त्म किया गया /(५)
ओमान ने इंग्राम को क्वोट करते हुए लिखा कि -" रोमन साम्राज्य में वंशानुगत पेशा अपनाने की बाध्यता पूर्व भारत में प्रचलित व्यवस्था से भिन्न नहीं थी / शासक वर्ग के लोग शासन के अनिवार्य अंग थे , और उनको दूसरे समूह (Collegia ) की लड़कियों से शादी की इजाजत नहीं थी / उसी तरह मुनिसिपल्टी और सैनिकों को भी वंशानुगत पेश अपनाने की बाध्यता थी /(६)
Reference :
(1) AL Basham -Wonder that was India P.148
(2)AL Basham -Wonder that was India P.149
(3) John Campbell Oman : "Caste in India " in his book : Bramhan Theist and Muslims in India 1907 P.63-64
(4) Ross 1922 P.322
(5)Ross 1922 P.182
(6) Ingram P.75
- संजय कोटियाल Thanks for sharing
- Tribhuwan Singh thanks
- Tribhuwan Singh thanks Sir Vivek Joshi
- Tribhuwan Singh Nilu Kumari ji ये उनकी कल्पना कि उड़ान है , और ईसाई विद्वानो के विचारों कि कॉपी पेस्ट है / ये लोग नकलची बन्दर से ज्यादा कुछ नहीं है /
- Tribhuwan Singh Slvery hasbeen culture of Islam and Christianity not Hinduism
- Tribhuwan Singh sure Nilu Kumari ji
- Tribhuwan Singh Nilu Kumari जी W H Moreland ने "अकबर की मृत्यु के बाद के भारत "में लिखा है कि गोआ में एक घोड़े की कीमत 500 परदाओं और गुलाम लड़की की कीमत 20 से 30 परदाओं था ।आज आप इराक में भी यही नहीं देख रही है।वहाँ इराक में यज़ीदी लड़कियों को 10 डॉलर में बेंच रहे हैं।और ये कह रहे है कि ये इस्लाम के खिलाफ है।
किसी संस्कृत ग्रन्थ में गुलामी का वर्णन है ? - Devesh Maurya भारतवर्ष में Caste सिस्टम का कोई ऐतिहासिक इतिहास और लेखन 1857 के पहले नहीं मिलता , हाँ वर्ण व्यवस्था अवश्य थी ..................what was Gupta dynasty,was it not caste.See Translation
- Indu Shekhar Singh जिस संस्कृति मे अतिथि देवो भवः की बात होती हो और भगवान के ऊपर सबकुछ लुटा देने की बात होती हो अतिथि के द्वारा गुलाम हो जाना उस संस्कृति के लोगों की कल्पना के बाहर की बात हैSee Translation
- Tribhuwan Singh Devesh Maurya सर आपको प्रमाण देना चाहिए डाक्यूमेंट्री अगर दे सकें तो।
- Devesh Maurya what were Maurya dynasty,Gupta Dynasty..
- Tribhuwan Singh आप भी अपनी राय व्यक्त करे डॉ देवेश।
मना किया है किसी ने ?? - सरिता शर्मा यह राजसत्ताओं के इतिहास की पुस्तकों को किसने भारत में प्रचारिक प्रकाशित किया है इससे हमें उत्तर मिलता है। इसी प्रकार भारतीय ग्रंथों के अनुवाद भी ब्रिटिश काल में करवाए गए तथा अपने ढंग से प्रचारित प्रसारित किए गए। धर्मपाल जी (राजीव दीक्षित के गुरु) के जनसत्ता के आरंभिक काल में अनेक लेख आते थे। उनकी लिखी अनेक पुस्तकें अभी भी हैं जो इस विषय पर प्रकाश डाल सकती हैं।See Translation
- Tribhuwan Singh धरमपाल गाँधीवादी जिन्होंने ब्यूटीफुल ट्री के साथ 2 और बुक्स लिखी हैं । आप उनकी बात कर रही है सरिता शर्मा जी ??
- Surendra Solanki ये तो बहुत सही जानकारी है। मॉस उनेम्प्लीमेंट के कारण साधना की बजाय लोग साधनो पर दौड़े। जो छूट गए उन्हें शुद्र मान कर उनका तिरिस्कार करना शुरू किया। क्योकि समाज मानसिक होता है। इसलिए जाति व्यवस्था बनाये रखने में सभी वर्णो से चिपके लोंगो का बहुत बड़ा योगदान था।
उस समय समाज इतना रिजिड हो गया था कि पति खत्म हुआ नही कि पत्नी को सती बनाने में सारे पुरुष एक साथ काम करने लगे। डॉ अम्बेडकर ने इसके बारे में बहुत लिखा है।
क्या सभी वर्ण आध्यात्मिक कभी रहे होंगे। उत्तर नहीँ।
क्योकि वर्ण जाति एक मानसिक स्थिति हमे बताने से मिलती।
आध्यामिक चेतना के स्तर खुद खोजने पड़ते आत्म मंथन द्वारा।See Translation - Tribhuwan Singh मैंने पढ़ी हैं उनकी कुछ बुक्स।ब्यूटीफुल ट्री में उन्होंने डोक्युमेंयरि प्रमान के साथ दिया है की 1822-30 में भारतीय शिक्षा पद्धति में स्कूलों में शुद्र छात्रो की संख्या ब्राम्हणो से चार गुना थी।
- Devesh Maurya 1822-30 में भारतीय शिक्षा पद्धति में स्कूलों में शुद्र छात्रो की संख्या ब्राम्हणो से चार गुना थी ...............this is false .........education was zero percent at that time among Sudras......I will post the evidence.See Translation
- Tribhuwan Singh आपके कहने से झूठ हो जाएगा ।
ये डॉक्यूमेंट ब्रिटेन के इंडियन ऑफिस लंदन में हैं ।
आपके बैच के लोग लन्दन में है ।उनसे बोलिये चेक कर लें।...See More - Kishorkant Nagalkar · 9 mutual friends
Tribhuwan Singhji bilkul sahi kah rahe hain. 1822-30 me aaj ke jaisi school/colleges nahi hote the, balki kisi vidvan guru ke ghar jaakar padhai ki jaati thi; usi tarah apne ya kisi peshe ka hunar bhi sikha jata tha. USTAD, GURU, UPADHYAY, PATHAK vagairah shabd usiki den hain. aur us Ustad ya Guru ko tankhvah nahi balki Dakshinaen di jati thi apna gujar-basar karne ke liye. Shiksha ek vyavsay nahi balki samajik jimmedari mani jati thi. isika natija tha ki 1950-60 ke dashak tak koi bhi shakhs apne bachchon ko master yane teacher banane ki nahi sochta tha.See Translation - सरिता शर्मा इन विषयों पर राजीव मल्होत्रा जी ने कहा कि शिक्षा पद्धति दक्षिण भारत से यूरोप पहुंची है लेकिन उन्होंने आज किसी भी भारतीय पद्धति का नाम नहीं लिया है। इस प्रकार कृषि व सिंचाई के विषय में भी हुआ है।See Translation
- Sumant Bhattacharya Devesh Maurya गजब की स्थापना दी आपने...वैसे समझना चाहूंगा कि आपकी इस स्थापना का आधार क्या है..? शिक्षितों के बीच. यदि तथ्यों के साथ विमर्श हो तो शेष समाज भी लाभान्वित होता है...वरना अफवाह फैलाने वालों के इस दौरे दौरा में हम और आप भी अपना नाम लिखवा लेते हैं...क्या फर्क पड़ेगा दूसरों को।See Translation
- Tribhuwan Singh सरिता शर्मा ji आप एकदम ठीक कह रहीं हैं / यूरोप में लोगों को शिक्षित करने के लिए संडे स्कूल की शुरुवात चर्चों ने शुरू किया उन्नीसवीं शताब्दी में , जिसमे प्रत्येक रविवार को ४ घंटे पढ़ाया जाता था ABCD और ज्यादा से ज्यादा बाइबिल , बस / शिक्षा और विश्विद्याल...See More
- Dhruv Singh साहित्य मे जातियों का उल्लेख होता रहा है।आचार्य क्षेमेन्द्र ने संस्कृत मे तथा जायसी ने पद्मावत मे बहुत सारी जातियों का उल्लेख किया है ।See Translation
- Tribhuwan Singh लिखिए उनको Dhruv Singh जी ।
उद्धृत कीजिये जायसी के पद्मावत को। - Tribhuwan Singh आचार्य क्षेमेन्द्र को भी लिखिए।
फिर बोल रहा हूँ जात थी जाति यानी caste नहीं । - Tribhuwan Singh दोनों का फर्क राम केवट संवाद में लिख चूका हूँ।
- Tribhuwan Singh Surendra Solanki जी दोनों लोग 1857 के न जाने कितनी शताब्दियों पूर्व के हैं।बहुत प्रतिष्ठित विद्वान हैं दोनों।
- Surendra Solanki इसका मतलब ये हुआ।
आप बस जाति और जात के बीच में इ की मात्रा के लिए संघर्ष कर रहे।
ध्रुव जी। दिखा दीजिये इन्हें। इ मात्रा में बहुत दम है। जात को जाति ये इ की मात्रा का कमाल है।See Translation - नरेन्द्र मिश्रा ध्रुव जी .. आचार्य क्षेमेन्द्र का 'सुवृत्ततिलक' छंदशास्त्र पर लिखा गया ग्रंथ है। इस ग्रंथ में आचार्य ने छंदविशेष में कविविशेष के अधिकार की चर्चा की है, जैसे अनुष्टुप छंद में अभिनन्द का,' उपजाति' में पाणिनि का, वंशस्थ में भारवि का, मन्दाक्रान्ता में कालिदास, वसन्ततिलका में रत्नाकर, शिखरिणी में भवभूति, शार्दूलविक्रीडित में राजशेखर का। यहां 'उपजाति' मे पाणिन के अधिकार की बात को आप जातियों का वर्णन तो नहीं समझ बैठे ?See Translation
- Dhruv Singh मिश्र जी मेरा मतलब आचार्य की कलाविलास,समयमातृका,देशोपदेश और नर्ममाला से है ।See Translation
- Tribhuwan Singh मैं अज्ञानी हूँ।
- सरिता शर्मा जात जिस रूप में थी समस्या नहीं थी, आज भी समस्या नहीं है यदि सही समझ आ जाए लेकिन सत्ता के लिए विगत 200-250 वर्षों से इसे बहुत बड़ी समस्या बताया जा रहा है तथा भेद मिटाने के नाम पर राष्ट्र को लूटा गया है। पारंपरिक उद्योग व्यापार व्यवसाय कृषि पशुपालन गोपालन वस्त्र निर्माण भवन निर्माण तकनीक शिल्प काष्ठ लौहकर्म पंचधातु इत्यादि के विनाश तथा वन व खनिज संपदा पर आधारित लूट निर्यात योजना के साथ हुआ है। इस प्रकार धनी भारत में अंग्रेजों की कंपनी व उनके शासन में कृत्रिम ढंग से समाज व सत्ता में भेद पैदा किए गए हैं। इसे समझने तथा इतिहास से सीख लेने की जरूरत है जो तथ्यों से समझी जाए तो ये समस्या या कहें मानसिकता सबको शीघ्र ही ठीक से समझ आ जाएगी और हल भी हो जाएगी।See Translation
- Kanhaiya Lal अगर ये जात ...जाति से अलग भी है तो आपके इतने बड़े रिसर्च से समाज को क्या दिशा मिलेगी ?? कोई तो उदेश्य होगा जिसे आप लोगों को जाग्रत करके पूरा करना चाहते होंगे । Prashant Kumar aapko tag kr rha comment edit karke...See Translation
- Tribhuwan Singh कन्हैया लाल जी जात और जाति / Caste का फर्क आप मेरे इस पोस्ट से समझने की कोशिश करें / न समझ आये तो कॉल करें /
- Tribhuwan Singh जात कि जाति ???
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माँगी नावं न केवट आना ,कहत तुम्हार मर्म मैं जाना /
...............................................................................................................
निषाद कहत सुनइ रघुराई ,मैं न लेहूँ प्रभु तेरी उतराई
हमरे कुल की रीति दयानिधि,संत मिले त करब सेवकाई \
रीति छोड़ उनरीति न करिहौं ,मैं न लेहूँ प्रभु तेरी उतराई/
नदी नावं के हमहि खेवैया, औ भवसागर के श्री रघुराई /
तुलसी दास यही वर मांगू , उहवाँ न लागै प्रभु मेरी उतराई /
--जात पांत न्यारी, हमारी न तिहारी नाथ ,
कहबे को केवट , हरि निश्चय उपचारिये
तू तो उतारो भवसागर परमात्मा
औ मैं तो उतारूँ , घाट सुर सरि किनारे नाथ /
नाइ से न नाइ लेत , धोबी न धुलाई लेत
त तेरे से उतराई लेत, कुटुंब से निकारिहयों /
जैसे प्रभु दीनबंधु ,तुमको मैं उतारयो नाथ /
तेरे घाट जैहों नाट मोको भी उतारियों
उहवाँ न लागै प्रभु मेरी उतराई /
मैं न लेहूँ प्रभु तेरी उतराई/.......चुन्नू लाल मिश्रा केवट राम संवाद /
................................................................................................................................................................................................................................
जात कि जाति ???
...एक जात शब्द को तुलसी दास ने बताया था ,,जिसमें केवट ने कहा कि --रामचन्द्र जी आप और मैं एक ही जात के हैं ,,मैं नदी कि नावं खेता , और आप भवसागर की नाव खेते हो , हमारी जात एक ही है ,जैसे नाउ नाउ से , और धोबी धोबी से पारिश्रमिक नहीं लेता , तो वैसे एक केवट दूसरे केवट से कैसे पारिश्रमिक ले सकता है / और लिया तो मुझे कुटुंब से बाहर कर दिया जाएगा /यहाँ तक तो ठीक था /
लेकिन जब हमने जॉन मुइर ,मैक्समूलर ,और M A शेरिंग पादरी , जैसे संस्कृतविज्ञों इंडोलॉजिस्ट से हम संस्कृत ग्रंथो को संस्कृत - अंग्रेजी - अंग्रेजी , के क्रम में सीख कर, 1946 " शूद्र कौन थे " , जैसे ग्रन्थ की रचना करते हैं , और उसकी उत्पत्ति वेदों में खोजने निकल जाते हैं , तो हमारी मंशा पर भले ही सवाल न खड़े होते हों , लेकिन मेरे तथ्यपरकता पर तो संदेह की सुई घूम ही जाएगी /
.......... आज न सही, कल सही .................................................
उसी तरह पुर्तगालियों द्वारा ,, १६०० में जात के लिए के लिए Caste को ,,1901 की जनगणनां Caste के आधार पर पहली बार करता है , और २००० से ज्यादा जातियां , "नेसल बेस इंडेक्स " और सोशल hiearchy , के आधार पर ./ डॉ आंबेडकर खुद इस आधार को निराधार बताते हुए खंडन करते हैं , तो शायद एक ही तथ्य स्पस्ट होता है , की
वे तात्कालिक समय के एंथ्रोपोलॉजी जैसे विषयों में तो एक्सपर्ट थे ,लेकिन जब उन्होंने इतिहास की तरफ नजर उठाई तो , शायद कहीं फर्जी संस्कृत विदों के जाल में उलझ कर रह गये /
और जब हमारे देश के विद्वानों ने , जो कॉपी एंड पेस्ट के , आधार पर न जाने कितनी पीएचडी ,लेते और देते रहते हैं , उन्होंने caste का अनुवाद जाति में करते हैं , तो आधुनिक भारत की तस्वीर सामने आती है /
A L Basham जैसे लोग शायद इसी को जाति की तरलता , और rigidity ऑफ़ caste सिस्टम के नाम से बुलाये //
लेकिन ये तो किसका काम है , आपको बता ही दिया ,लेकिन OCD के मरीज तथाकथित दलित चिंतक @.... इसको भी ब्राम्हण वाद के जिम्मे , ठोंक देते हैं /
डॉ आंबेडकर को ये छूट दी जा सकती है , की उनके पास सूचना के श्रोत सीमित थे , इसलिए जिस भी निष्कर्ष पर वे पहुंचे , अगर वे होते , तो शायद उसको रेक्टिफी करते /
लेकिन ये OCD के मरीज ,,,,,इनको क्या कहा जाय ?? - Tribhuwan Singh second one : आंबेडकर जी के पूर्व के क्रिश्चियन मिशनरियों के लेखक और इतिहासकारों ने ऋग्वेद के पुरुष शूक्त को आधार बनाकर समाज में राजनैतिक और धर्म परिवर्तन के लिहाज से प्रमाणित करने कि कोशिश की कि वैदिक काल से ये समाज का वर्गीकरण कर्म आधारित न होकर जन्म आधारित रहा है / उसी विचार को बाद में मार्क्सिस्टों ने और आंबेडकर वादियों ने आगे बढ़ाया / १९०१ की के पूर्व जाति आधारित जनगणना भी नहीं होती थी (पहली जनगणना १८७१ में हुयी थी ) बल्कि वर्ण और धर्म के आधार पर होती थी/ १९०१ में जनगणना कमिशनर रिसले नामक व्यक्ति ने ढेर सारे त्रुटिपूर्ण तथ्यों और एंथ्रोपोलॉजी को आधार बनाकर १५०० से अधिक जातियों और ४३ नश्लों में भारत के हिन्दू समाज की जनगणना की / वही जांगना आजतक जातिगत विभाजन का मौलिक आधारहै /
पुनश्च : गीता के -"जन्मना जायते शूद्रः कर्मण्य द्विजः भवति " को इतिहासकार प्रमाण नहीं मानते क्योंकि उनके अनुसार महाभारत एक मिथ है /
लेकिन अभी मैं कौटिल्य अर्थशाश्त्रम् पढ़ रहा था तो एक रोचक श्लोक सामने आया / " दायविभागे अंशविभागः " नामक अध्ह्याय में पहला श्लोक है -"एक्स्त्रीपुत्राणाम् ज्येष्ठांशः ब्राम्हणानामज़ा:, क्षत्रियनामाश्वः वैश्यानामगावह , शुद्रणामवयः "
अनुवाद : यदि एक स्त्री के कई पुत्र हों तो उनमे से सबसे बड़े पुत्र को वर्णक्रम में इस प्रकार हिस्सा मिलना चाहिए : ब्राम्हणपुत्र को बकरिया ,क्षत्रियपुत्र को घोड़े वैश्यपुत्र को गायें और शूद्र पुत्र को भेंड़ें /
दो चीजें स्पस्ट होती हैं की वैदिक काल से जन्म के अनुसार वर्ण व्यस्था नहीं थी क्योंकि कौटिल्य न तो मिथ हैं और न प्रागैतिहासिक / ज्येष्ठपुत्र को कर्म के अनुसार ही हिस्सा मिलता था/ और एक ही मान के पुत्र कर्मानुसार किसी भी वर्ण में जा सकते थे / - Rabindra Chakraborty · 10 mutual friends
आज जिस अंग्रेजी को हम देव भाषा मानकर उसे अंगीकार कर कृतकृत्य हो जाते हैं वह स्वयं तीनेक सौ साल पहले एक बोली मात्र थी। इंग्लैंड की राजभाषा, कोर्ट की भाषा और कुलीनों की भाषा फ्रेंच थी। पुनर्जागरण और औद्योगिक क्रांति के बाद दूरदराज के देशों से लगातार संपर्क और वहाँ अपने भाषा की स्थापना करना , दूसरे देशों से अच्छी चीजों को लेकर नये पिलो पैक में पैक कर उन्हीं को बेच देने मे इन्हें महारत हासिल थी। भारत के इतिहास में इन्होंने ब्लैकहोल बना दिया और वहाँ अपना बनाया गया कृत्रिम इतिहास फिट कर दिया । कुछ विद्वान भी पैदा हुये इस दौरान, पहले से कुंठित जो बाद में इनसे इतने प्रभावित हुये कि इनके माउथ पीस बनकर रह गये । भारत को जात और जाति के बीच उलझाने वाले ये स्वयं संसार की सबसे कृतघ्न और धोखेबाज जाति के हैं।See Translation - Kanhaiya Lal आपकी रिसर्च से जो बातें मेरी समझ में आ रही वो ये है की जाति या जात जो भी कहो ... जन्म अनुशार न होकर ..कर्म अनुशार होती है ?? क्या मै सही समझा ?See Translation
- Devesh Maurya Dr Tribhuwan you are again wrong......all the three Hindu religious text I.e.vedas,manusmriti and geeta says that division is devine and since birth.
- Kanhaiya Lal @devesh maurya ji can you quote in the favor of ur argument ? means where it is written in veda geeta...manusmriti ??
- Tribhuwan Singh Devesh Maurya boss you must reply to Kanhaiya Lal ji first . then I will comment on ur comment .
- Tribhuwan Singh Devesh Maurya boss you just told few hours back that you will come with documented evidence against my factual statements . But you returned back with your prejudiced half baked comments . Not fair sir ,
- Tribhuwan Singh milai phone
- Tribhuwan Singh Jagdish Tripathi ji aapka phon milai ??
- Kanhaiya Lal I found an interesting explanation...यदि ब्राह्मण का पुत्र विद्या प्राप्ति में असफल रह जाए तो शूद्र बन जाता है | इसी तरह शूद्र या दस्यु का पुत्र भी विद्या प्राप्ति के उपरांत ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर्ण को प्राप्त कर सकता है |यह सम्पूर्ण व्यवस्था विशुद्ध रूप से गुणवत्ता पर आधारित है | Prashant KumarSee Translation
- Kanhaiya Lal मुख कौन है?, हाथ कौन है?, जंघा कौन है? और पाँव कौन है? यजुर्वेद (31.10) ब्राहमण मुख है, क्षत्रिय हाथ हैं, वैश्य जंघा हैं तथा शूद्र पैर हैं | यजुर्वेद (31.11) Prashant KumarSee Translation
- Kanhaiya Lal अर्थ : समाज में ब्राह्मण या बुद्धिजीवी लोग समाज का मस्तिष्क, सिर या मुख बनाते हैं जो सोचने का और बोलने का काम करे | बाहुओं के तुल्य रक्षा करने वाले क्षत्रिय हैं, वैश्य या उत्पादक और व्यापारीगण जंघा के सामान हैं जो समाज में सहयोग और पोषण प्रदान करते हैं, जिस तरह पैर शरीर के आधार हैं जिन पर शरीर टिक सके और दौड़ सके उसी तरह शूद्र या श्रमिक बल समाज को आधार देकर गति प्रदान करते हैं | Prashant KumarSee Translation
सरिता शर्मा https://www.youtube.com/watch?v=t7ylMaXOpwo
Tribhuwan Singh Devesh Maurya सर मुझे अच्छा लगेगा। लेकिन डॉ आंबेडकर को मत कोट कीजियेगा। उन्होंने मात्र कॉपी पेस्ट किया है।
Tribhuwan Singh जाति नहीं थी जात थी।
Gopal Jee Shambuk shudra kaise ho gaya ?















