कौटिल्य
का नाम ,एक महान राजनीतिज्ञ के नाम पर दर्ज हैं ,,भारतीय इतिहास के पन्नों
में / और उनकी दण्डनीति ,, आज शासन नीति के नाम से जाना जाता है / वे
राज्य के नियमों का कड़ाई से पालन करवाते थे / चन्द्र गुप्त के समय भारत एक
संपन्न राष्ट्र था ,,लेकिन खुद कुटिया में रहते थे ,,एक दरिद्र ब्राम्हण
की तरह // यानी अपरिग्रह ही उनकी जीवन शैली थी / शायद तभी से " दरिद्र
ब्राम्हण " जैसे शब्दों की नीवं पड़ी होगी / इसी को ब्रम्हानिस्म कहते हैं /
अगर गीता में उद्धृत -"जन्मना जायते शूद्रः ,,संस्कारात द्विजः भवति " ,,के महाभारत काल से कौटिल्य के समय काल तक ,,कौटिल्य की दण्डनीति का एक भाग रहा -- कि जन्म से कार्य निर्धारित नहीं होता ,,बल्कि स्वभाव से होता है जैसा कि इस श्लोक में वर्णित है -- कौटिल्य अर्थशाश्त्रम् / " दायविभागे अंशविभागः " नामक अध्ह्याय में पहला श्लोक है -"एक्स्त्रीपुत्राणाम् ज्येष्ठांशः ब्राम्हणानामज़ा:, क्षत्रियनामाश्वः वैश्यानामगावह , शुद्रणामवयः "
अनुवाद : यदि एक स्त्री के कई पुत्र हों तो उनमे से सबसे बड़े पुत्र को वर्णक्रम में इस प्रकार हिस्सा मिलना चाहिए : ब्राम्हणपुत्र को बकरिया ,क्षत्रियपुत्र को घोड़े वैश्यपुत्र को गायें और शूद्र पुत्र को भेंड़ें /
अगर इसको तर्क की कसौटी पर कसें और सावधानी पूर्वक विचार करे ...तो शायद ये परंपरा इस्लामिक आक्रमण ,,और उसके भारत में आधार जमाने और उनके साम्राज्य स्थापित होने तक , जन्मना जायते शूद्र संस्कारत द्विजः भवति ,,का सिद्धांत और परंपरा का पालन हिन्दू समाज का अनिवार्य अंग होना चाहिए/
और इसी तर्क की कसौटी पर--------------------------------------------------------------------------------------------------------------- {कौटिल्य के दूसरी दण्डनीति ---" जो स्वामी अपने पुरुष मातहतों से मुर्दा , मलमूत्र या जूठन उठवावे , और महिला मातहतों को अनुचित दंड दे ,उसके सतीत्व को नष्ट करे ,नग्न अवस्था में उनके पास जाय, या नंगा कराकर अपने पास बुलाये तो उसके धन जब्त कर लिया जाय / यदि यही व्यवहार दाई (धात्री) परिचारिका , अर्धसीतिका ,,और उपचारिका से करवाया जाय तो उन्हें दासकार्य से मुक्त कराया जाय / यदि उच्चकुलुत्पन्न दास से उक्त कार्य करवाया जाय तो वह दासकर्म को छोड़कर जा सकता है / "--तीसरा अधिकरण --दासकर्मकरकल्पम् }----- को कसा जाय तो कदाचित आप पाएंगे -- की मल प्रच्छालन ,,भंगी ,मेहतर हेला लालबेगी ,,और अछूत जैसी परंपरा का भी आगमन ------इस्लामिक शासन का ,भारत के समाज को उपहार स्वरुप भेंट होनी चाहिए /
अगर गीता में उद्धृत -"जन्मना जायते शूद्रः ,,संस्कारात द्विजः भवति " ,,के महाभारत काल से कौटिल्य के समय काल तक ,,कौटिल्य की दण्डनीति का एक भाग रहा -- कि जन्म से कार्य निर्धारित नहीं होता ,,बल्कि स्वभाव से होता है जैसा कि इस श्लोक में वर्णित है -- कौटिल्य अर्थशाश्त्रम् / " दायविभागे अंशविभागः " नामक अध्ह्याय में पहला श्लोक है -"एक्स्त्रीपुत्राणाम् ज्येष्ठांशः ब्राम्हणानामज़ा:, क्षत्रियनामाश्वः वैश्यानामगावह , शुद्रणामवयः "
अनुवाद : यदि एक स्त्री के कई पुत्र हों तो उनमे से सबसे बड़े पुत्र को वर्णक्रम में इस प्रकार हिस्सा मिलना चाहिए : ब्राम्हणपुत्र को बकरिया ,क्षत्रियपुत्र को घोड़े वैश्यपुत्र को गायें और शूद्र पुत्र को भेंड़ें /
अगर इसको तर्क की कसौटी पर कसें और सावधानी पूर्वक विचार करे ...तो शायद ये परंपरा इस्लामिक आक्रमण ,,और उसके भारत में आधार जमाने और उनके साम्राज्य स्थापित होने तक , जन्मना जायते शूद्र संस्कारत द्विजः भवति ,,का सिद्धांत और परंपरा का पालन हिन्दू समाज का अनिवार्य अंग होना चाहिए/
और इसी तर्क की कसौटी पर--------------------------------------------------------------------------------------------------------------- {कौटिल्य के दूसरी दण्डनीति ---" जो स्वामी अपने पुरुष मातहतों से मुर्दा , मलमूत्र या जूठन उठवावे , और महिला मातहतों को अनुचित दंड दे ,उसके सतीत्व को नष्ट करे ,नग्न अवस्था में उनके पास जाय, या नंगा कराकर अपने पास बुलाये तो उसके धन जब्त कर लिया जाय / यदि यही व्यवहार दाई (धात्री) परिचारिका , अर्धसीतिका ,,और उपचारिका से करवाया जाय तो उन्हें दासकार्य से मुक्त कराया जाय / यदि उच्चकुलुत्पन्न दास से उक्त कार्य करवाया जाय तो वह दासकर्म को छोड़कर जा सकता है / "--तीसरा अधिकरण --दासकर्मकरकल्पम् }----- को कसा जाय तो कदाचित आप पाएंगे -- की मल प्रच्छालन ,,भंगी ,मेहतर हेला लालबेगी ,,और अछूत जैसी परंपरा का भी आगमन ------इस्लामिक शासन का ,भारत के समाज को उपहार स्वरुप भेंट होनी चाहिए /
- Tribhuwan Singh इसलिए अछूत और शूद्रों की दुर्दशा के कारन को यदि डॉ आंबेडकर ने, भारत के आर्थिक और सांस्कृतिक विरासत में खोजने की कोशिश की होती तो ज्यादा समसामयिक होता / और शायद सही नतीजे पर पहुँच सकते थे / और देश के अंदर सुलगती घृणा का दानव न पैदा होता ,,जिसके आग में लोग सत्ता की रोटी सेंक रहे हैं /
भाषा की अज्ञानता ने उनको कहाँ ले जाकर खड़ा किया /
आज जब हम नित नए तथ्यों से वाकिफ हो रहे हैं कि भारत की जीडीपी ,समस्त विश्व की जीडीपी का 25 प्रतिशत के आसपास पिछले २००० साल ( और शायद उससे ज्यादा भी ,क्योंकि अँगुस मैडिसन ने 0 AD से 2000 AD तक की ही खोज की है ) से 1750 तक लगातार बनी हुई थी / ये अकेले इकोनॉमिस्ट नहीं है ,जिन्होंने ये खोज की है ,एक बेल्जियन इकोनॉमिस्ट पॉल बरोिच भी 1980 के आस पास इसी नतीजे पर पहुंचे थे , जिसका वर्णन पॉल कैनेडी ने अपनी पुस्तक "राइज एंड फॉल ऑफ़ ग्रेट पावर्स ,, ,जैक गोल्ड्स्टोन "व्हाई यूरोप -राइज ऑफ़ थे वेस्ट इन वर्ल्ड हिस्ट्री 1500-1850 ,में यही बात कहते हैं / वही 1750 में अमेरिका और ब्रिटेन दोनों मिलकर मात्र २ प्रतिशत जीडीपी उत्पादित करते थे /
ब्रिटिश की शोषणकारी नीतियों के चलते 1900 आते आते ,, भारत का ट्रेडिशनल घरेलू उद्योग धराशायी हो जाता है / १९०० में जब भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी ) ,मात्र २ प्रतिशत बचती है / 800 प्रतिशत लोग ,जो की कौटिल्य के शूद्र की परिभाषा के अनुसार --शुश्रूषा ,वार्ता ( खेती ,,व्यापर ,,खनिज उद्योग ) और करकुशीलव ( टेचनोक्रट्स ,interpreuner इंजीनियर ) ,,,,बेरोजगार और बेघर हो जाते हैं ,,,,,,तो उनकी दरिद्रता को अगर इकोनॉमिस्ट डॉ आंबेडकर ने ,,भारत के आर्थिक इतिहास से जोड़ा होता ,,,और संस्कृत का ज्ञान होता तो कौटिल्य का अर्थशाश्त्र (,,एक अर्थशास्त्री की पहली पसंद होती है) पढ़ा होता ,,तो शायद उस नतीजे पर न पहुंचते जहाँ वे पहुंचे /
उसी जगह गांधीं ने बीमारी की जड़ को पकड़ा ,,घर घर खादी के कपड़ों की चरखी चलवाने का आह्वान किया ,,और गाडी को पटरी पर वापस लाने की कोशिश की ,,लेकिन गांधी शायद बहुत देर से भारत में पैदा हुए ,,,इसलिए गाडी पटरी पर वापस लाने में इतना समय लग गया / ६५ साल का भारत का इतिहास गवाह है कि आज ब्रिटेन और अमेरिका भारत के कदमों में झुकाने को बेताब है ,,,तो 1900 -1946 की विशाल जनसमूह की दरिद्रता का कारन खोजने के लिए , डॉ आंबेडकर की प्रागैतिहासिक शास्त्रों की यात्रा कोई सार्थक यात्रा प्रतीत नहीं होती / - Tribhuwan Singh डॉ आंबेडकर ने ,,अपनी पुस्तक शूद्र कौन है ?? सारे ब्रम्हानिक ग्रंथों का अध्ययन करने के बाद कुछ निष्कर्ष निकाले थे ,,अपनी नयी थीसिस को सिद्ध करने के पूर्व ,उनमें से कुछेक महत्वपूर्ण विन्दुओं पर विमर्श ..
(१)शूद्रों को समाज में सबसे निचला दर्जा ,,और अपवित्र ;
---इसको तो अम्बेडकर जी ने खुद ही खंडन किया है ,,,,जब वो शूद्र रतनी का जिक्र करते हैं ,,राजा के सार्वभौमिकता के सन्दर्भ में ...युधिस्ठिर को भीष्म के द्वारा राजनीती की शिक्षा दिए जाने के संदर्भ में /
---दूसरे इसका उल्लेख कौटिल्य के अर्थ शाश्त्र में भी नहीं है / कौटिल्य ने तो शूद्रो की सेना को , तो ब्राम्हणों की सेना से ज्यादा तेजोमय बताया है /
---डॉ बुचनन जब 1807 में तुलवा प्रदेश के निवासियों का वर्णन करते हैं ,,तो बंटर्स के बारे में ,वे कहते हैं ..बंटर्स पवित्र शूद्र के वंशज है (
इसका मतलब ,
,शूद्र समाज के निचले पायदान पर ....और अपवित्र ...कम से कम 1807 ,,तक तो नहीं हुवा था ,,और शूद्र होना भी उतना ही सम्मानित था ,,जितना बाकी वर्णों का /
(मेरी पहुँच वेदों तक और सतपत ब्राम्हण या अन्य ग्रंथों तक नहीं है ) - Tribhuwan Singh (२) शूद्रों को ज्ञान तो कत्तई नहीं प्राप्त करना चाहिए ,,और उनको शिक्षा देना पाप ही नहीं अपराध भी है ....डॉ आंबेडकर /
कौटिल्य ने शूद्रों के धर्म को परिभाषित करते हुए दण्डनीति (शासन नीति) में प्रतिपादित किया कि - "शूद्रस्य द्विजातशुश्रूषा वार्ता कारकुशीलवकर्म " -- यानि द्विज की शुश्रूषा ,वार्ता और कार्यकुशील /
कृषि ,पशुपालन और व्यापार ये वार्ताविद्या के अंग है / यह विद्या ,धन धान्य पशु ,हिरण्य ,हिरण्य ताम्र आदि खनिज पदार्थ के बारे में ज्ञान प्राप्त करना ।
कार्यकुशील यानि शिल्पशास्त्र गायन वादन आदि के बारे में ज्ञान प्राप्त करना ।
एक गाँधीवादी धरमपाल अपनी पुस्तक -The Beautiful Tree में लिखते हैं कि 1830 में अंग्रेजों द्वारा कराये गए सर्वे में प्राप्त डाटा के अनुसार ---------स्कूल जाने वाले शूद्र छात्रों की संख्या ,ब्राम्हणों छात्रों से चार गुना-------- थी ।
अब मैकाले का प्रवेश भारतीय शिक्क्षा जगत में 1835 में होती है । इससे दो निष्कर्ष निकलते है -
(१) कौटिल्य के बाद और मैकाले के आने के पूर्व शूद्रो को शिक्षा प्राप्त करने और ज्ञान प्राप्त करने का पूरा अधिकार था ।
(२) वापस पलट के देखिये भारत के आर्थिक इतिहास पर । 1750 में भारत विश्व जीडीपी का 25% शेयर होल्डर और 1900 में मात्र 2% का शेयर होल्डर ।
800 % लोग जो घरेलू उत्पाद की रीढ़ थे बेरोजगार बेघर और दरिद्र ।
अब ये अपने सर के लिए छाया और पेट के लिए रोटी की जद्दोजहद करेगा , कि बच्चो की शिक्षा के लिए ??
---दलित शोषित शिक्षा से वंचित । लेकिन क्या ब्रम्हानिस्म की वजह से ???? - Tribhuwan Singh Arun Kumar Tribhuwan G आप अपने तार्किक तथ्यों से सिद्ध कर रहें हैं कि अंबेडकरजी को संस्कृत भाषा का ज्ञान नहीं था और उन्होंने original text को नहीं पढ़ा।उनके विचारों का आधार translated text by Christian scholars था। अतः उन्होंने तथ्यों के मूल भावों को नहीं समझा।मुझे संदेह है क्योंकि आपने आर्थिक व्यवस्था पर जिन तथ्यों को हवाला दिया है उन तथ्यों को समझने मे उन्हें भाषा बाधा नहीं था। और आप जानते ही है कि बाबा साहेब अर्थ शास्त्री थे।
- Tribhuwan Singh श्रद्धेय @Arun Kumar .जी आपका प्रश्न और जिज्ञासा एकदम सही है / मैं कोई एक्सपर्ट नहीं हूँ ,,संस्कृत का ,,इसलिए डॉ आंबेडकर ने जिन धर्म ग्रंथों को यूरोपियन संस्कृतज्ञों द्वारा अनुवादित ,,,अनुवादों के अनुवादों को कॉपी एंड पेस्ट ( कॉपी एंड पेस्ट इसलिए कह रहा हूँ क्योकि , उन्होंने अपनी पुस्तक ,,में कई जगहों पर वर्णों को caste के नाम से ही सम्बोधित किया है , और ये कहना कि डॉ आंबेडकर इतने अल्पज्ञ थे ,,कि वर्ण और caste का फर्क नहीं समझते थे ,, उनका अपमान होगा ) किया है ,,उन ग्रंथो तक तो मेरी पहुँच नहीं है ,,इसलिए उनके कॉपी और पेस्ट किये गए quotations को ,,, उचित या अनुचित करार देना ,,मेरे बस की बात नहीं है / लेकिन जिन संस्कृतज्ञों को उन्होंने अपने लेखन का आधार बनाया है ,उन तक तो हम पहुँच ही सकते हैं / इसलिए ये साबित करना सरल हो जाएगा ,कि ये संस्कृतज्ञ पूर्वाग्रह से से ग्रस्त तो नहीं थे ,,या इनके उद्देश्य अकादमिक न होकर, अपने ईसाई धर्म को हिन्दू धर्म की तुलना में ज्यादा महान साबित करना था या ईसाइयत को फैलाना था ? / और फिर ये समझना भी आसान हो जाता है ,,कि इन संस्कृतज्ञ ईसाई विद्वानों ने संस्कृत ग्रंथों को तोड़ मरोड़ कर तो नहीं पेश किया , या उनको संस्कृत केर समझ ही नहीं थी /
फिलहाल आपके प्रश्न को संज्ञान में लेने के पूर्व डॉ आंबेडकर के हिन्दू धर्मो के ग्रंथों से निकाले गए दो और निष्कर्षों की चर्चा करता हूँ / - Tribhuwan Singh (३) ..शूद्रं को संपत्ति का अधिकार नहीं है --डॉ आंबेडकर /
-- इस प्रश्न का उत्तर मेरे पहले लिखे गए कमेंट्स में है - ( १) कम से कम कौटिल्य के अर्थशास्त्र में तो ये वर्णित नहीं है ,,,दूसरा आंबेडकर जी कि पुस्तक में भी लिखा है कि शूद्र सार्वभौमिक राजाओं के रतनी हुवा करते थे / और उन्होंने ये भी लिखा है कि भीष्म ने युधिस्ठिर को राजनीत का पाठ पढ़ते हुए ये कहा कि मंत्रिमंडल में , कम से कम ३ शूद्र मंत्री होने चाहिए / (२) डॉ बुचनन ने 1807 में प्रकशित अपनी पुस्तक में लिखा है कि -" यद्यपि तलुवा के ब्राम्हण ये कहते है कि यहाँ कि धरती के सच्चे मालिक वही हैं क्योंकि परशुराम ने ये धरती उनके लिए खोजी थी ,,लेकिन यहाँ पर ज्यादातर जमीनों के मालिक शूद्र है / और ब्राम्हणों का ये क्लेम ,,न तो वर्तमान कि सच्चाई है ,,और न भविष्य में कोई संभावना दिखती है /
(४) शूद्रों को उपनयन यानि जनेऊ संस्कार का अधिकार नहीं है , डॉ आंबेडकर /
-- इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए ,,अओको किसी ग्रन्थ या बुचनन जैसे विद्वानों को उद्धृत करने कि जरूरत नहीं है / हालांकि अब तो तथकथित द्विजों ने भी जनेऊ पहनना बंद कर दिया है ,,लेकिन अपने गावं में मैंने खुद ,,तथाकथित menial शूद्र बुजुर्गों को जनेऊ धारण करते हुए देखा है / आप भी देखे होंगे / और नहीं देखे होंगे तो ,,मई जब अपने गावं जाऊँगा अगले सप्ताह तो कइयों के फोटो खींच कर यही पर पोस्ट कर दूंगा / ( काश डॉ आंबेडकर ने गांधी कि तरह ,,२- ३ साल गावों कि ओर रुख किया होता , राजनीति में पैर रखने के पूर्व ,,तो वे इस भ्रमजाल के शिकार न बनते ) - Shatrunjay Singh अब भी लोग आपके इस गहन शोध से उपजे अकाट्य तर्क को अपने सतही ज्ञान के कुतर्क से खारिज करने की कोशिश करेँगे।See Translation
- Tribhuwan Singh उन्हें उनका काम करने दीजिये , हमें हमारा /...जीत सत्य की होती है / सत्य अगर उनके साथ होगा तो वो जीतेंगे और अगर सत्य हमारे साथ है तो हम जीतेंगे / ये कलयुगी महासमर है Shatrunjay Singh ji
- Tribhuwan Singh अब आगे के कमेंट्स अरुण कुमार जी द्वारा उठाये गए ,,सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पर ,,कि डॉ आंबेडकर का संस्कृत की अज्ञानता ने, किस तरह एक मनीषी को विदेशी संस्कृतज्ञों के द्वारा फैलाये मायाजाल में फंसने को मजबूर किया ??
- Tribhuwan Singh आज इतना ही / आगे इस रहस्य से पर्दा उठाने के लिए कल तक का इन्तजार करें /
- Indu Shekhar Singh त्रिभुवन सिंह जी,इससे तो कोई इंकार नही करेगा कि किसी जमाने मे यह भूभाग जिसे आज हिन्दुस्तान के नाम से जाना जाता है काफी सूखी संपन्न और व्यवस्थित समाज से परिपूर्ण था और नालंदा विश्वविद्यालय और विक्रमशीला विश्वविद्यालय भी इसकी गवाही देते हैं कि शिक्षा के क्षेत्र मे भी यह भाग काफी विकसित था।यह संपन्नता ही क्रूर,लुटेरो आक्रमणकारियो के आकर्षण कारण बना।लुटेरो के कई बार लूटने के बसता रहा और खुशहाल होता रहा क्योंकि यहाँ के लोग कार्य कुशल थे प्रतिभावान थे अपनी प्रतिभा से फिर संपन्नता को हासिल कर लेते थे।अब कुछ मुस्लिम शासकों की नजर इस क्षेत्र पर पड़ी कि इतने लुटे जाने के बाद भी ये संपन्न ही रहते है इस क्षेत्र पर अधिकार किया जाए और येन केन प्रकारेण वे अपना कब्जा इस क्षेत्र पर स्थापित किए।यहाँ तक एक बात सही रहा कि इन शासकों ने अपने सत्ता का केन्द्र इसी भूभाग को रखा जिस कारण इन मुस्लिम शासकों ने यहाँ की संस्कृति,व्यवसाय को उतनी क्षति नही पहुँचाई लेकिन चाण्क्य और चन्द्रगुप्त जिनकी ताकत नालंदा विश्वयविद्यालय थी उस पर करारा प्रहार हुआ लेकिन चन्द्रगुप्त ने फिर पूर्णउद्धार कियाSee Translation
- Tribhuwan Singh Indu Shekhar Singh आपका आकलन तथ्यात्मक है।
- Tribhuwan Singh लेकिन मैंने पढ़ा है कि चाणक्य और चन्द्रगुप्त ने शूद्र राजा घनानंद को पदच्युत किया था।
- Tribhuwan Singh इसको कैसे एक्सप्लेन करेंगे बेडकरवादी ??
- Indu Shekhar Singh लेकिन यह शिक्षा के केन्द्र ने मुस्लिम शासकों को भयभीत कर दिया था और वे समझ चुके थे कि अगर इसे तहस नहस न किया गया तो अपना शासन बरकरार रखना मुश्किल है इस तरह शिक्षा चौपट हुई फिर अंग्रेज जो उस जमाने मे दूर दूर तक व्यापार करते थे उनकी नजर भारत पर पड़ी और वे जो एक अलग संस्कृति के साथ विकसित हो रहे थे वे इस भूभाग से काफी प्रभावित हुए और धीरे धीरे कर अपना आधिपत्य स्थापित किए और हर तरह से इस संस्कृति को तहस नहस करने का प्रयास किया क्योंकि उन्हें अपनी संस्कृति को पूरे विश्व मे स्थापित करना था अब हमारी संस्कृति को कैसे तबाह किया गया इसकी प्रस्तुति सिलसिलेवार ढंग से आपने किया है और इसे ही लोगों को बताने का प्रयास हम कर रहे हैं सारे तथ्य उपलब्ध भी है इसे कोई गलत साबित करे हम तो साजिश का पर्दाफाश कर रहे हैं और इसमे सफल भी होंगे।धन्यवादSee Translation
- Shatrunjay Singh एक ब्राह्मण ने एक शूद्र को मोहरा बनाकर षडयंत्र करके दूसरे शूद्र को सत्ता से पदच्यूत किया।शायद ऐसे ब्याख्यायित करेँगेSee Translation
- Tribhuwan Singh लेकिन शुद्र तो वेदकाल से ही पैरो से जन्मा दलित था। तो राजा कैसे बन गया Shatrunjay Singh जी ?
- Shatrunjay Singh शिक्षा के केन्द्र को किसी प्राचीन भारतीय राजा ने चौपट नहीँ किया बल्कि प्रश्रय दिया।नालंदा विक्रमशिला आदि को तो मुस्लिम आक्रमणकारियोँ ने नष्ट कियाSee Translation
- Shatrunjay Singh सर इसी अन्तर्विरोध और गलतबयानी का आप खुलासा कर रहे है पर कुछ अहमकोँ को कौन समझाएSee Translation
- Arun Kumar सही ब्याख्या दिया है Shatrunjay G ने, इसे भी ब्राह्मणवाद परिभाषित कर देंगे।चन्द्रगुप्त को भूलकर कौटिल्य का षडयंत्र याद करेंगे हमारे तथाकथित दलित चिंतक।See Translation
- Indra Deo Singh मौर्य काल में भारत का विश्व व्यापार में हिस्सा क़रीब 52%था । kautilya ने ऐसे रत्नों की खानों का विवरण दिया है जिसका पता लगाना बाकी है ।
आज सारे मार्ग - रेल , air , स्थल , " राजनितिक केन्द्रों की ओर जाते थे । उस समय के सारे मार्ग व्यापारिक केन्द्र की ...See MoreSee Translation - Tribhuwan Singh आईये यहाँ आइए Sumant Bhattacharya ji सारे मितरो के साथ ।
- Tribhuwan Singh Indra Deo Singh सर एकदम तथ्यात्मक आकलन।
- Tribhuwan Singh लेकिन जब इतिहास के इन पन्नों को नोचकर आधुनिक इटोहास्कार सीधे मिथकीय ग्रंथों को आधा अधूरा संदर्भित करके उस timeline में मैपिंग करते रहे इतने वर्षों तक।
तो उसको कैसे मिटायेंगे ?~ - Arun Tripathi और हमारे अर्थशाष्त्री मित्र ने बताया था कभी की हमें जो सोने की चिड़िया कहा जाता था वो इस कारण नहीं की है की हम सोने का उत्पादन करते थे वरन इस कारण था की निर्यात के एवज में तब सोना ही विनिमय माध्यम था।।।भारत की स्थिति का वर्णन ह्वेनसांग करता है की यहाँ चीटिया भी अपने बिलो में सोने का संचय करती थी।।।ये सब व्यापार और ज्ञान के बाल बूते था।।।See Translation
- Tribhuwan Singh Arun Tripathi जी कारकुशीलम वाला विज्ञानं ।
ज्ञान अलग विधा है जो विज्ञानं को जन्म देता है। - Sumant Bhattacharya आपने लिखा कि शूद्र पुत्र को भेंडे। गौर कीजिएगा,,ऊन का बहुविध उपयोग है..और शूद्र को कौटिल्य कार्यकुशीलम कहता है। साथ ही भेड़ के दूध में फैट भी बहुत होता है जो शारीरिक सौष्ठव के लिए ज्यादा जरूरी है।See Translation
- Tribhuwan Singh कभी कभी अपने ही कमेंट को लाइक करने की इच्छा होती है। जैसे अभी वाला वेद्व वाक्य टाइप से। हा हा हा हा
- Tribhuwan Singh उसी भेड़ से शाल का वैज्ञानिक विधि से उत्पादन भी होता है दादा।
- Tribhuwan Singh Indu Shekhar Singh जी इस्लामिक लुटेरे ईसाई से ज्यादा bigot थे। लेकिन इस पे चर्चा आगे करेंगे।
- Sumant Bhattacharya आपने ही कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दिखाया था कि कौटिल्य कहता है- ज्ञान वो है जिससे इंसान खुद को जाने..और इसके अलावा जो कुछ भी है वह विज्ञान है। क्या मैं दुरुस्त हूं सखाSee Translation
- Tribhuwan Singh जी एकदम ठठेर ।
उस व्यसाय से कम से कम नहीं तो 50 जातियों /castes का निर्माण ईसाई विद्वानों ने किया। - Indu Shekhar Singh और इन ईसाइयो ने जन्म को जाति के आधार पर कर दिया क्योंकि जन्म लेने वाले ज्यादातर अपने पुश्तैनी व्यवसाय से ही जुड़ते थेSee Translation
- Indra Deo Singh वाह सुमंत जी ।
आपने क्या quote किया , त्रिभुवन sir की बातो को ।
लेकिन हम उसको घुमा कर कहेगे
" स्वयं को जानने की विद्या का नाम " विज्ञान " है " बाकी जो भी है
विज्ञान है । " "See Translation - Tribhuwan Singh Indra Deo Singh और Sumant Bhattacharya सर असल ओरिजिनल टेक्स्ट अमरकोश से।
" मोक्षे धीह् ज्ञानं
अन्य विज्ञानं शिल्पशस्त्रयो। - Tribhuwan Singh शिल्पशास्त्रयो correction plz.
- Indra Deo Singh आप के अनुसार
एक ही व्यवसाय करने वालों का एक समूह था जो अपनी विशिस विद्या में पारंगत थे , उनको विशिस्त व्यवसायके नाम से जाना गया ।
इसके अनुसार व्यवसाइयों का एक समूह रहा होगा जो सदियों से चलता आ रहा होगा , सुविधा हेतु उसको एक नाम दे दिया गया होगा ।See Translation - Indra Deo Singh कहा जाता है कि हिंदुस्तान में लाखों जातियों का विवरण है
इसका तात्पर्य यह हुआ कि " हिंदुस्तान में लाखों किस्म के व्यापार थे । "See Translation - Indra Deo Singh हेम चंद्र की एक पुस्तक है
उसका नाम हमको अभी याद नहीँ आ रहा
उसमें विचित्रता पूर्ण व्यापार करने वालों का विवरण है ।
कुछ तो हमेशा के लिये विलुप्त हो गयी - इनकी जाति ।See Translation - सुदेश आर्या कोई भी लेखन या साहित्य उस समय की परिस्थितियों से प्रभावित होता है ...!! चाणक्य के जीवन चरित्र से लेकर उनके कौटिल्य अर्थशास्त्र पर नजर डालेंगे तो किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं ठहराया जा सकता !! उनको समझने के लिये गहन दृष्टि व अध्ययन की आवश्यकता है !!See Translation
- Indra Deo Singh सुदेश जी
ऐसे बहूत कम ग्रंथ हैं
जिसमें अतीत का संकलन , वर्तमान का प्रभाव तथा भविष्य की
एक दृष्टि समाहित होती है ।See Translation - Tribhuwan Singh Sudesh Arya Journalist जी आधुनिक भारत के समाज को समझने और परिभासित करने के लिए विद्वान ईसाई और डॉ आंबेडकर और वामपंथी वे मिथक घोषित प्रागैतिहासिक वेदों की गणेश परिक्रमा तो कर आये लेकिन भारत के गौरव रहे ऐतिहासिक कौटिल्य और उनके अर्थशाष्ट्रम तक पहुच न बना पाये ।
ये सायास शाजिश जैसा नही लगता आपको ?~ - Indra Deo Singh इतिहासकारों के अनुसार महाभारत का संकलन अनेक काल खण्डों में किया गया ।
अंतिम संकलन 1st centuary के आस पास किया गया । महाभारत तो जीवन का एक खजाना है । लेकिन महाभारत का भीष्म खण्ड - जिसमें भीष्म द्वारा पांडवों का " राजनीत का मूल दर्शन " समझाया गया है । यह दुनिया में शायद प्राचीन विवरण हो जहाँ समष्टि रूप से राजनीति के सारे अंगो पर प्रकाश डाला गया है । यह पश्चिम के देशों हेतु एक आईना है । भारत के लिये आदर्श । इस पर विद्वत जन का ध्यान कम जाता है ।See Translation - Surendra Solanki सभी जातिया जो की अनु सुचना बद्ध की गयीं। केवल कर्म के कारण।
चमार लुहार बुनकर ।...See MoreSee Translation - Surendra Solanki कहा जाता है कि हिंदुस्तान में लाखों जातियों का विवरण है
इसका तात्पर्य यह हुआ कि " हिंदुस्तान में लाखों किस्म के व्यापार थे । "
ये तथ्य है।See Translation - Surendra Solanki शुद्र असल शब्द बुद्धिहीन।
आज अनुसूचित जाती का हर एक व्यक्ति को अगोग्य बोला जाता।
ये बहुत बड़ी साजिश है मनवादिओ की मानसिकता।See Translation - Gopal Jee इसका मतलब ,
,शूद्र समाज के निचले पायदान पर ....और अपवित्र ...कम से कम 1807 ,,तक तो नहीं हुवा था ,,और शूद्र होना भी उतना ही सम्मानित था ,,जितना बाकी वर्णों का /
(मेरी पहुँच वेदों तक और सतपत ब्राम्हण या अन्य ग्रंथों तक नहीं है )
जे वर्णाधम तेली कुम्हारा, स्वपच किरात कौल कलवारा।
उपरोक्त बात रामचरितमानस में तुलसीदास के द्वारा मुसलमानो ने कहलवाया।See Translation - Tribhuwan Singh ये न समझेंगे इंदु सिंह / ज़ात और जाति का फर्क इन्हे समझाया था पीछे एक पोस्ट में / ऐसा नहीं है की इनकी बुद्धि मोटी है , बल्कि इनकी बुद्धि शातिर है /@Indu Shekhar Singh
- Indu Shekhar Singh न समझेंगे तो अब गिर कर कहाँ जाऐगे।अब उठ ले नही तो अब धरती ही बची हैSee Translation
- सुदेश आर्या मुझे तो हमेशा से ही ऐसे समस्त हिंदुओं को कोसने के लिए आईएसआईएस तालिबान से पैसा मिलता रहा है !!
ऐसे लोग पांव नहीं, जहन से अपाहिज हैं
उधर चलेंगे जहां रहनुमां चलाता है !!
क्यों न इस देश का नाम भारत देश से बदलकर. "आहत देश" रख दिया जाए !!!See Translation - Gopal Jee Indu Shekhar Singh जी तो ऊपर की जिविका से जीने वाले अधम हैं या इनकी जीविका अधम है। कृपया स्पष्ट करें।See Translation
- Gopal Jee आप ही रख दीजिये आपलोग तो साधना किये हुए ब्राह्मण मेरे जैसे शुद्र को समझ में नहीं आ रहा है।See Translation
- Indu Shekhar Singh गोपाल जी,आज के समय मे कोई शुद्र नही रहा सभी ब्राम्हणत्व की ओर अग्रसर हैं शुद्र से ऊपर और ब्राम्हण से नीचेSee Translation
- सुदेश आर्या पता नहीं मेरा बोलना उचित होगा या नहीं , लोकिन त्रिभुवन भाई की वॉल पर हूं तो बोलना शायद अनुचित न होगा !!
जाति व धर्म को लेकर बोलना है तो हम उन संघियों से कम नहीं हैं जो नफरत पालकर बैठे रहते हैं ...!! यही नफरत तो हमें आपस में लड़वा रही है !!! कब हम समझेंगे कि शूद्रता जाति धर्म में नहीं वरन विचारों में कैद है !!See Translation - Gopal Jee मेरा comment त्रिभुवन जी के पोस्ट पर आधारित है, कृपया उसी सन्दर्भ में अपनी बात रखें।See Translation
- Indu Shekhar Singh गोपाल जी,ब्राम्हणत्व तक पहुंचने का रास्ता अवरुद्ध है आज की शिक्षा पद्धति के कारण अगर हम मिल कर अपनी शिक्षा व्यवस्था मे सुधार कर पाये तो फिर वही मानवता और प्रेम के करीब होंगेSee Translation
- Gopal Jee तो फिर से चले गुरुकुल की ओर।
जिसमे कुछ गिने चुने वर्ण ही शिक्षा के हक़दार थे।See Translation - Indu Shekhar Singh जी नही हमें गुरुकुल की बातें अपने बच्चों को पढ़ा कर और कहाँ से जाना कि गुरुकुल मे गिने चुने वर्ण को ही शिक्षा दी जाती थीSee Translation
- Indu Shekhar Singh आप इस चिकित्सा व्यवस्था से खुश है चिकित्सक से खुश हैं कुछ कमी नही दिखती अपने समाज मेSee Translation
- Tribhuwan Singh Sudesh Arya Journalist जी एकदम सही नाम लिखा आपने -आहत देश।
यानि जख्मी भारत।
लेकिन जख्म किसने दिए Gopal Jee जैसे विद्वजन एक चौपाई और एक श्लोक में अपने आप को गिरफ्तार करके सीखना चाहे तो इनका मुकाम क्या होगा बहिनी ?? - सुदेश आर्या मैं कभी भी उन लोगों के विषय में कोई टिप्पणी नहीं करती , जिनके अपने ही चेहरे की कोई पहचान नहीं है !! व्यक्ति की सबसे पहली पहचान उसका चेहरा होता है ! जो अपने से ही अपनी पहचान छिपाये फिरते हैं वे समाज के प्रति क्या न्याय कर पाएंगे !! नहीं मालूम लोगों को अपने चेहरों से क्यों परहेज है , क्यों अपनी पिक नहीं लगाते??See Translation
- Indu Shekhar Singh क्या आपको नही लगता कि हमें कुछ छुपा कर पढ़ाया गया आदि मानव कैसे सभ्य हुए यह पढ़ाया ही नही गया आदि मानव जंगली से सीधे सभ्यता के बारे मे पढ़ाया जाता हैSee Translation
- Indu Shekhar Singh ये जो बीच का समय है वही समय हमारे गौरव का है जिसे गायब कर दिया गयाSee Translation
- Indu Shekhar Singh आग पहिया सोना चाँदी पीतल ताम्बा लोहा का आविष्कार किसने और कैसे कियाSee Translation
- Kaushal Dave जनेऊ यानि यज्ञोपवीत तो हर वर्ण के लिए थी | मै आज भी संध्योपासन विधि करता हु उस में कई जगह उल्लेख है जैसे की " ... आचमन के लिए जल - ब्राह्मण उतना ले जितना ह्रदय तक पहुंच जाए क्षत्रिय और वैश्य गले तक गीला रखने के लिए और शूद्र मात्र जिह्वा गीले करने के लिए जल ले सकते हैं ..."
ये तो एक कर्माकांड में निहित विधि है |See Translation
Shatrunjay Singh बिल्कुल सर
Tribhuwan Singh Gopal Jee जी वो समयकाल कौन था जब शिक्षा मात्र कुछ वर्णों के लिए ही सीमित थी ??
100 साल पहले
200 साल पहले
500 या हजार साल पहले ??
इस पर प्रकाश डालें जरा।
100 साल पहले
200 साल पहले
500 या हजार साल पहले ??
इस पर प्रकाश डालें जरा।











No comments:
Post a Comment