Tuesday, 29 September 2015

अंबेडकर साहित्य का पोस्ट्मॉर्टेम : भाग - 11

आज मैंने Tavernier नाम के एक फ़्रांसिसी की 17वीई शताब्दी के यात्रा वृत्तांत से कुछ पृष्ठों को उद्धृत किया है । Tavernier इतिहासकारों का एक महत्वपूर्रन और विश्वस्त सूत्र रहा है भारत के इतिहास लेखन में। लेकिन न जाने कैसे उसी सूत्र के इन मत्वपूर्ण पन्नों को जाने अनजाने इन इतिहासकारो ने अपठनीय समझकर छोड़ दिया ।आप इस लेख को पढ़ेंगे तो पाएंगे कि इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को किस तरह उपहासजनक तरीके से लिखा है उसकी मिशाल आपको कहीं अन्यत्र नहीं मिलेगी ।
इतिहास और उपन्यास दो अलग विधाए हैं । भारतीय इतिहासकारो ने भारत के इतिहास को उपन्यास विधि से प्रस्तुत किया है ।
ये मात्र 338 वर्ष पूर्व पहले ट्वेर्निएर ने भारत के हिन्दू समाज का वर्णन किया है।अचम्भे की बात ये है कि उसने लिखा कि शुद्र क्षत्रियों की तरह ही योद्धा हुवा करते थे ।
डॉ आंबेडकर ने भी यही सिद्ध करने की कोशिश की थी अपने थीसिस - "शुद्र कौन थे" में ।
लेकिन उनके तर्कों में दम तो है लेकिन तथ्य नहीं है ।आप तेवेर्निएर के इस लेख को पढ़िए ,आप को प्रमाणिक साक्ष्य दिख जाएगा कि डॉ आंबेडकर का लेखन औपन्यासिक विधा में पस्तुत किया गया बेहद तार्किक परंतु तथ्यहीन इतिहास भर है ।
Jean-Baptiste Tavernier (1605 – 1689) was a 17th-century French gem merchant and traveler.[1] Tavernier, a private individual and merchant traveling at his own expense, covered by his own account, 60,000 leagues, 120,000 miles making six voyages to Persia and India between the years 1630-1668. In 1675, Tavernier, at the behest of his patron, Louis XIV, published Les Six Voyages de Jean-Baptiste Tavernier (Six Voyages, 1676).[2]
Of the Religion of gentilles and Idolators of India --- ..Jean-Baptiste Tavernier (1605 – 1689)
भारत में मूर्तिपूजकों की संख्या इतनी ज्यादा है की एक मोहम्डन की तुलना में ५-६ genitlie होंगे / ये अत्यंत आश्चर्य जनक है की संख्या में इतना ज्यादा होने के बावजूद ये मोहम्डन प्रिंसेस के गुलाम बने हुए है / लेकिन आपका आस्चर्य समाप्त हो जाता है जब आप पाते हैं की इन मूर्तिपूजकों के अंदर कोई एकता नहीं है , अन्धविश्वास (जो शास्त्र बाइबिल में न फिट बैठे वो superistition ) ने इनके अंदर ईतनी वैचारिक और रीति रिवाज की भिन्नता पैदा कर दी है कि इनमे एका संभव ही नहीं है / एक caste के लोग दूसरी caste के घर खाना नहीं खा सकता है और न ही पानी पी सकता है सिर्फ अपने से उच्च सामजिक वर्ग को छोड़कर / अतः सारे लोग ब्राम्हण के घर खाना खा सकते हैं या पानी पी सकता है , और उनके घर समस्त संसार के लिए खुले हुए हैं / इन मूर्तिपूजकों में caste शब्द का प्रयोग उसी तरह से है जैसे पहले यहूदियों में एक ट्राइब होती थी / यद्यपि सामान्यतया ये विस्वास किया जाता है कि यह ७२ caste हैं परन्तु मैंने ज्ञानी पंडितों से पता किया तो पता चला कि ये मुख्यतः ४ caste ही हैं , और उन्ही चारों caste से सभी कि उत्पत्ति हुई है /
इसमें प्रथम caste को ब्राम्हण के नाम से जाना जाता है जो उन प्राचीन ब्राम्हणो और दार्शनिकों के वंशज हैं जो खगोल शास्त्र पढ़ा करते थे /ये आज भी उन्ही प्राचीन पुस्तकों के अध्यन मनन में संलिप्त रहते है /ये इस विद्या में इतने निपुण हैं कि सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण कि सटीक भविष्यवाणी में एक मिनट कि चूक नहीं करते /इनकी इस विद्या को सुरक्षित रखने के लिए बनारस नाम का एक कसबे में विश्वविद्यालय हैं जहाँ य मुख्यतः खगोलशास्त्र का अध्ययन करते हैं, और जहाँ और विद्वान लोग भी है जो अन्य शास्त्रों को पढ़ते हैं / ये caste सबसे योग्य (नोबेल) इसलिए मानी जाती है क्योंकि इन्हीं विद्वानों के बीच से पुजारी और शास्त्रो को पढने वाले शास्त्री चुने जाते है /
दूसरी caste राजपूत या khetris (क्षत्रिय) के नाम से जानी जाती है अर्थात योद्धा और सैनिक / ये अकेले ऐसे मूर्तिपूजक हैं जो बहादुर हैं और शस्त्रविद्या में निपुण हैं /ज्यादातर राजा जिनसे मैंने बात की वे इसी caste के हैं / यहाँ छोटी छोटी रियासतों वाले राजा हैं जो आपसी मतभेद कि वजह से मुग़लों कि छत्रछाया में रहने को मजबूर हैं / लेकिन जो सेवा या मुग़लों को देते हैं उसके बदले में इनको भरपूर सम्मान और सैलरी दिया जाता है / ये राजा और उनके संरक्षण में रहने वाले राजपूत ही मुग़ल शक्ति के आहदर स्तम्भ हैं / राजा जयसिंघ और जसवंत सिंह ने ही औरंगजेब को गद्दी पर बैठाया था /लेकिन यहाँ ये उल्लेख करना भी उचित होगा कि दूसरी caste के समस्त लोग इस शास्त्र व्यसाय में सन्नद्ध नहीं हैं /वो राजपूत अलग हैं जो घुड़सवार सैनिक के रूप में युद्ध में भाग लेते हैं / लेकिन जहाँ तक khetris (क्षत्रियो) की बात है वे अपने बहादुर पूवजों से निम्न हो चुके हैं और हथियार त्यागकर व्यापार (Merchandise) के छेत्र में उत्तर चुके हैं /
तीसरी caste है बनियों का जो ट्रेड या व्यापर सँभालते हैं ,इन्हीं में से कुछ शर्राफ (Shroff ) जो मनी एक्सचैंजिंग या बैंकर का काम करते है /और कुछ लोग ब्रोकर हैं जिनके एजेंसीज के जरिये व्यापारी (मर्चेंट्स ) खरीद फरोख्त करते है / इस caste के लोग इतने व्यवहारिक ( Subtle ) और व्यसाय प्रवीण हैं कि ये धूर्त यहूदियों को भी मात दे सकते हैं / ये अपने बच्चो को बालपन से ही आलस्य से दूर रहने कि शिक्षा देते हैं और हमारे बच्चों कि तरह आवारागर्दी से रोकते हैं और उनको अंकगणित कि मुहँजबानी शिक्षा इस तरह से देते हैं कि वे कठिन से कठिन सवाल का जबाब चुटकियों में दे देते हैं /इनके बच्चे हमेशा पिता के साथ रहते हैं और ये अपने बच्चो को व्यापार के साथ उसके गुड और दोष समझते जाते हैं और काम करते जाते हैं / ये जिस संख्या (figures ) का इस्तेमाल करते है उसी का प्रयोग पूरे देश में होता है , चाहे भाषा के बोलने वाला हो / यदि कोई व्यक्ति इनसे नाराज होता है तो ये बिना जबाव दिए धैर्य के साथ सुनते हैं और चुपचाप वहां से खिसक लेते हैं / और चार पांच दिन बाद जब उस व्यक्ति का गुस्सा शांत हो जाता है तब उससे मिलते हैं / ये हर उस चीज को अभक्ष्य मानते हैं जिसमे प्राण हों / किसी प्राणी कि हत्या करने के बजाय ये सवयं जान देना पसंद करते हैं /यहाँ तक कि ये कीड़े मकोड़ों की भी हत्या पसंद नहीं करते और ये अपने धर्म के पक्के है /यहाँ ये भी बता दूँ कि ये युद्ध में भाग नहीं लेते , किसी पर हाथ नहीं उठाते / ये किसी राजपूत के घर न कहते है न पानी पीते हैं क्योंकि वे जानवरों का बध करते हैं खाने के लिए, गाय को छोड़कर क्योंकि गाय अबध्य है और कोई उसको खान नहीं सकता /
चौथी caste को Charados या Soudra कहते हैं, ये राजपूतों कि तरह ही युद्ध में भाग लेते हैं लेकिन दोनों में मात्र इतना फर्क है कि राजपूत घुड़सवार योद्धा होते हैं और ये पदाति योद्धा / दोनों ही युद्ध में जान देने में अपना गौरव समझते हैं / एक योद्धा चाहे वो घुड़सवार हो या फिर पदाति , यदि युद्ध के दौरान मैदान छोड़कर भाग जाता है तो वो हमेश के लिए अपना सम्मान खो देता है और ये पूरे परिवार के लिए लज्जा का विषय है / इसी सन्दर्भ में एक कहानी सुनना चाहूँगा जो मुझे इस देश में सुनायी गयी / एक योद्धा जो अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता था और बदले में पत्नी अपने पति को उतना ही प्यार करती थी \ ये योद्धा एक यद्ध के दौरान मृत्यु के भयवश नहीं बल्कि पत्नी के प्रेमवश और उसके विधवा होने के ख्याल से युद्ध भूमि त्याग कर भाग खड़ा होता है /जब ये सूचना उसकी पत्नी के पास पहुंची और उसने अपने पति को घर कि तरफ आते देखा तो उसने पति के मुह पर ही दरवाजा बंद कर लिया / उसने अपने पति से कहा कि वो उस इंसान को पहचानती भी नहीं जिसको अपने सम्मान से ज्यादा अपनी पत्नी प्यारी हो और वो उसका मुहं भी नहीं देखना चाहती जिसने परिवार कि प्रतिष्ठा पर कला धब्बा लगे हो और ये बात मैं अपने बच्चो को जरूर बताऊँगी कि वो ाोाने पिता से ज्यादा बहादुर बनें / वो अपने फैसले पर अडिग रही / अंततः उस योद्धा को अपना सम्मान और पत्नी के प्यार को वापस लाने के लिए युद्ध के मैदान में वापस जाना पड़ा जहाँ उसने अभूतपूर्व शौर्य का परिचय दिया / तब कहीं जाकर उसके घर के दरवाजे उसके लिए खुले और उसकी पत्नी ने उसका प्यार के साथ स्वागत किया /
अब जो बाकी बचे लोग हैं जो न चार caste में समाहित नहीं होते उनको PAUZECOUR के नाम से जाना जाता है ये सब मैकेनिकल आर्ट (अर्टिसन यानि शिल्प और अन्य उद्योग ) का कार्य करते हैं / इनमे आपस में कोई भेद नहीं है सिवा इस बात के कि वे अलग अलग व्यवसाय करते हैं जो इनको अपने पिता से स्वाभाविक रूप से मिलता है / और एक अन्य बात ये है कि उदाहरण के तौर पर यदि मान लीजिये कोई दरजी कितना भी धनि मई क्यों न हो उसको अपने बेटे बेटियों कि शादी उसी के व्यवसाय वाले के परिवार में करना होता है /इसी तर यदि उस दरजी कि मृत्यु होगी तो श्मशान घाट पार जाने वाले लोग भी उसी पेशे के होंगे /
इसके अलावा एक और विशेष caste होती हगै जिसको "हलालखोर" के नाम से जाना जाता है / जो घरों कि सफाई का काम करते हैं और इनको हर घर से महीने में कुछ दिया जाता है , घर कि साइज के अनुसार / भारत में समृद्ध वर्ग में चाहे वो मोहम्डन हो या मूर्तिपूजक , और चाहे उसके पास पचासों नौकर हों इनमे से कोई भी नौकर झाड़ू लगाने से परहेज करता है कि उसको कंटैमिनेशन न हो जाय / अगर आपको किसी कि बेइज्जती करनी हो तो उसको हलालखोर बोल देना ही पर्याप्त है / यहाँ ये भी बताना जरूरी है कि जिस नौकर को जिस कार्य हेतु रखा गया है वो बस वही काम करेगा / अगर मालिक ने किसी नौकर को किसी अन्य नौकर का काम करने का आदेश दिया तो वो उसको अनसुना कर देगा / लेकिन गुलामों को सब काम करने पड़ते हैं / ये हलालखोर caste के लोग घरों का कूड़ा उठाते है और इनको जो भी खाने को दिया जाता है उसको खा लेते हैं / मात्र इसी caste के लोग गधों (asses ) का इस्तेमाल करते हैं जिसकी मादा से ये घरों का कूड़ा खेतों तक पहुचाते है / इनके अलावा गधों को कोई छूता भी नहीं / जबकि पर्शिया में गधो का इस्तेमाल बोझ ढोने में और सवारी ढोने में दोनों तरह ही प्रयोग किया जाता है /एक अन्य बात ये भी है कि मात्र हलालखोर ही सुवरों पालने और खाने वाले लोग है " TRAVELS IN INDIA by JEAN BAPTISTI TAVERNIER के फ्रेंच से अनुवादित 1676 एडिशन के पेज 181 - 186 .से उद्धृत है ये अनुवाद



  • Arun Kumar तथ्यात्मक लेख के लिये धन्यवाद।See Translation
  • Tribhuwan Singh
  • Tribhuwan Singh आभार ।
    लेकिन आंबेडकर वादी चिंतको के लिए अपाच्य है ।
  • माधबेंद्र कुमार
  • माधबेंद्र कुमार
  • माधबेंद्र कुमार
  • माधबेंद्र कुमार अपाच्य क्यों है?See Translation
     
    • Indra Deo Singh यह एक कड़वी सच्चाई है।अस्ताचल की ओर जाते हुए सूर्य का वास्तविक चित्रण। इस विवरण में वह सब कुछ है जिसके संकेत से तप्त सूर्य का पता लगाया जा सकता है।
      एक विज्ञान के छात्र ने इतिहास को दर्पण दिखया है।
      सादर

      डॉ इन्द्र देव सिंह
      See Translation
    • Indu Shekhar Singh
    • Indu Shekhar Singh 1605 से 1689 की सामाजिक संरचना की व्याख्या है और सामाजिक सामंजस्य का बेहतरीन प्रस्तुति है।कोई आपसी नफरत नही है योग्यता के अनुसार सभी का कार्य बटा हुआ है और सबसे बड़ी बात कि एक भ्रमणकारी ब्रिटिश ने इसका उल्लेख किया है बहुत अच्छी जानकारी है 17वी शताब्दी मे भी समाज के हर वर्ग के लोग खुश थे संपन्न थे इस भ्रमणकारी के लिखे को पढ़ कर साफ हो जाता है कि अंग्रेजो के आने तक समाज मे सब कुछ ठीक ठाक था।आपने बहुत महत्वपूर्ण जानकारी दी है।धन्यवादSee Translation
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh माधबेंद्र कुमार जी अपाच्य क्यों है ?
      दिन भर की प्रतिक्रिया से पता चल जाएगा।
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh Arun Kumar जी मेरे इस तथ्यात्मक लेखन से जब तक सब सहमत न हों तो ये ऊर्जा व्यर्थ करने वाली बौद्धिक गोश्ठी भर ही है ।
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh Indra Deo Singh सर मुझे कभी कभी लगता है कि यदि मैंने विज्ञानं के बजाय ज्ञान यानि आर्ट पढ़ा होता तो शायद ज्यादा योगदान दे पाता।
      लेकिन फिर लगता है कि शायद कहीं खोजी बुद्धि और विवेक से वंचित रह जाता।
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh Indu Shekhar Singh जी ये फ्रेंच व्यापारी था।और इसका लेखन राजनैतिक और religios स्वार्थ से प्रभावित नहीं था इसलिए ज्यादा तथ्यात्मक और ईमानदार लेखन आप इसको मान सकते हैं ।
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh चौथी caste को Charados या Soudra कहते हैं, ये राजपूतों कि तरह ही युद्ध में भाग लेते हैं लेकिन दोनों में मात्र इतना फर्क है कि राजपूत घुड़सवार योद्धा होते हैं और ये पड़ती योद्धा / दोनों ही युद्ध में जान देने में अपना गौरव समझते हैं / एक योद्धा चाहे वो घुड़सवार हो या फिर पदाति , यदि युद्ध के दौरान मैदान छोड़कर भाग जाता है तो वो हमेश के लिए अपना सम्मान खो देता है और ये पूरे परिवार के लिए लज्जा का विषय है /
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh ये क्या लिखा टॉवेर्नियर ने ?? क्यों लिखा ?? शायद मनुवादी नहीं था क्या ?? Chandra Bhan Prasad Vivek Kumar Devesh Maurya
    • Rinku Chatterjee
    • Rinku Chatterjee कितना कुछ जानने को मिल रहा है। आभारी हूँ मान्यवरSee Translation
    • Tribhuwan Singh
    • Tribhuwan Singh Rinku Chatterjee जी आभार कि आप जैसी गंभीर पाठक फेसबुक चौराहे पे उपलब्ध हैं ।
      स्वागत
       
      • Surendra Solanki चौथी caste को Charados या Soudra कहते हैं, ये राजपूतों कि तरह ही युद्ध में भाग लेते हैं लेकिन दोनों में मात्र इतना फर्क है कि राजपूत घुड़सवार योद्धा होते हैं और ये पड़ती योद्धा / दोनों ही युद्ध में जान देने में अपना गौरव समझते हैं / एक योद्धा चाहे वो घुड़सवार हो या फिर पदाति , यदि युद्ध के दौरान मैदान छोड़कर भाग जाता है तो वो हमेश के लिए अपना सम्मान खो देता है और ये पूरे परिवार के लिए लज्जा का विषय है /

        मेरे समाज का नाम जांगड़ा समाज है। किद्वंती के अनुसार महाराणा प्रताप की सेना के सिपाही। जब युद्ध हार गए तो जंग हारा से जांगड़ा बना। और युद्ध के बाद मालवा में होशंगाबाद के आसपास बस गए।
        See Translation
      • Tribhuwan Singh
      • Tribhuwan Singh Surendra Solanki जी जरा विस्तार दें।
      • Surendra Solanki
      • Surendra Solanki और जानकारी ले कर बताऊंगाSee Translation
      • विवेक कुमार सिंह अनुज
      • Tribhuwan Singh
      • प्रसन्न प्रभाकर
      • प्रसन्न प्रभाकर इस पोस्ट के लिए धन्यवाद सरSee Translation
      • Tribhuwan Singh
      • Tribhuwan Singh Gopal Jee यहाँ आएं ।
        देखे कि डॉ अम्बेडकर का शुद्रबोध किस तरह ईसाई अंग्रेज संस्कृतविदों के उदर से निकला है।
        उनका आकलन कितना सही था जो वेद की यात्रा तो कर लेते हैं लेकिन 300 साल की भारत की इतिहास यात्रा उनके लिए कितनी दुष्कर थी।
      • Tribhuwan Singh
      • Tribhuwan Singh Prasanna Prabhakar जी आभार आपका।
      • Tribhuwan Singh
      • Tribhuwan Singh Sanjay Kotiyal जी ये Pauzecour फ्रेंच शब्द है। इसका अर्थ खोजें।
      • Upadhyaya Pratibha
      • Upadhyaya Pratibha The remainder of the people, who do not belong to either of these four castes, are called "Pauzecour".
      • संजय कोटियाल
      • संजय कोटियाल Ved Prakash जी कुछ नया पढने को मिल सकता है इस प्रोफाइल पर । देखिएगा ।See Translation
      • Tribhuwan Singh
      • Tribhuwan Singh "Pauzecour " शब्द की भी एक ऐतिहासिक यात्रा है। श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी के शिव शंकर सिंह यानि तिरपाल सिंह की तरह।
         
         
        • Indra Deo Singh I was seeking appropriate words for ""dalit thinkers"
          Dalit thinkers say to people of theirs on community that ""you have been insects of guttar from ancient time to till now. ?...your, s generation s exploited , killed and raped by people of forwar
          d class, ,,,,,,,,, you are chamar, bhangi, dusadh, ,, and so on, ,,,,,,
          This word s of devinity have been by said by dalit thinks to suffered society, ,,,,,,,,, who are still, ,,, waiting for justice and rights ,,,..,,
        • Tribhuwan Singh
        • Tribhuwan Singh Pratibha Upadhyaya जी आपने तो ओरिजिनल टेक्स्ट लिख दिया। बधाई हो
        • Upadhyaya Pratibha
        • Upadhyaya Pratibha यही परिभाषा दी गई है Google पर . आपको क्या चाहिए था?See Translation
        • संजय कोटियाल
        • संजय कोटियाल मेरी नजर हलालखोर पर टिकी है । संस्कृत का शब्द है क्या ?See Translation
        • Mani Bhushan
        • Mani Bhushan तीन सौ साल पुराना इतिहास वो भी इतना तथ्यपरक पोस्ट करने के लिए धन्यवाद | लेकिन कष्ट इस बात का है की आज के आधे अधूरे अम्बेडकरवादी इतिहासकार समझकर भी गलत भाव बना रहे है,कुछ तो ऐसे टुच्चे टाइप है की वो पुरे समाज को दिग्भ्रमित कर रहे है | इनविषयों पर खुली बहस होनी चाहिए तब ही समाज में एकता रह पायेगी |See Translation
        • Upadhyaya Pratibha
        • Upadhyaya Pratibha "हलालखोर" संस्कृत का शब्द तो नहीं है .
        • संजय कोटियाल
        • संजय कोटियाल तो मने हलालखोर शब्द कहाँ से आया ?
           
          • Indra Deo Singh I was seeking appropriate words for ""dalit thinkers"
            Dalit thinkers say to people of theirs on community that ""you have been insects of guttar from ancient time to till now. ?...your, s generation s exploited , killed and raped by people of forwar
            d class, ,,,,,,,,, you are chamar, bhangi, dusadh, ,, and so on, ,,,,,,
            This word s of devinity have been by said by dalit thinks to suffered society, ,,,,,,,,, who are still, ,,, waiting for justice and rights ,,,..,,
          • Tribhuwan Singh
          • Tribhuwan Singh Pratibha Upadhyaya जी आपने तो ओरिजिनल टेक्स्ट लिख दिया। बधाई हो
          • Upadhyaya Pratibha
          • Upadhyaya Pratibha यही परिभाषा दी गई है Google पर . आपको क्या चाहिए था?See Translation
          • संजय कोटियाल
          • संजय कोटियाल मेरी नजर हलालखोर पर टिकी है । संस्कृत का शब्द है क्या ?See Translation
          • Mani Bhushan
          • Mani Bhushan तीन सौ साल पुराना इतिहास वो भी इतना तथ्यपरक पोस्ट करने के लिए धन्यवाद | लेकिन कष्ट इस बात का है की आज के आधे अधूरे अम्बेडकरवादी इतिहासकार समझकर भी गलत भाव बना रहे है,कुछ तो ऐसे टुच्चे टाइप है की वो पुरे समाज को दिग्भ्रमित कर रहे है | इनविषयों पर खुली बहस होनी चाहिए तब ही समाज में एकता रह पायेगी |See Translation
          • Upadhyaya Pratibha
          • Upadhyaya Pratibha "हलालखोर" संस्कृत का शब्द तो नहीं है .See Translation
          • संजय कोटियाल
          • संजय कोटियाल तो मने हलालखोर शब्द कहाँ से आया ? 
             
             
            • Upadhyaya Pratibha बाहर से . जहाँ से साध्वी का प्रिय शब्द आया .See Translation
            • संजय कोटियाल
            • संजय कोटियाल साध्वी शब्द और हलालखोर में तो जमीन आसमान का अन्तर होगा शायदSee Translation
            • Tribhuwan Singh
            • Tribhuwan Singh जी पर्शियन शब्द है "हलालखोर" ।
              आईने अकबरी में इनका जिक्र है महलों की सफाई का काम सौंपा जाता है।एक अन्य यूरोपियन के travelogue में जिक्र है क़ि ये पर्शियन भाषा बोलने वाले लोग है ।
              यानि ये तुर्क और मुग़लो के साथ भारत में आये थे।

              फेसबुक पे सर्च करे हलालखोर टाइटल के लोग ईरान और इराक में आज भी हैं।
            • Upadhyaya Pratibha
            • Upadhyaya Pratibha हाँ. लेकिन “खोर“ प्रत्ययान्त शब्द उसी भाषा में होते हैं , संस्कृत में नहीं देखे .See Translation
            • Tribhuwan Singh
            • Tribhuwan Singh Pratibha Upadhyaya जी आपने साध्वी को हलालखोर के साथ जोड़कर गुड़गोबर कर दिया।
            • संजय कोटियाल
            • Upadhyaya Pratibha
            • Upadhyaya Pratibha अब साध्वी का शब्द तो हम लिख नहीं सकते .

              ;
              See Translation
            • Tribhuwan Singh
            • Tribhuwan Singh Sanjay Kotiyal जी आप Pauzecour का मतलब पता लगाएं।
            • संजय कोटियाल
            • संजय कोटियाल मेरे को जर्मन आता है । फ्रेंच नहीं । फिर भी देखूंगा Tribhuwan Singh जीSee Translation
            • Tribhuwan Singh
            • Tribhuwan Singh हा हा हा प्रतिभा जी
            • Tribhuwan Singh
            • Tribhuwan Singh अरे भाई म्हणत करे Sanjay Kotiyal जी।
              आपके पड़ोस का मामला है।
            • Indu Shekhar Singh
            • Indu Shekhar Singh माफ कीजिएगा त्रिभुवन सिंह जी मुझे लगा वह ब्रिटिश भ्रमणकारी है और देरी से जवाब के लिए भी क्षमा सुबह पटना से निकला अभी दरभंगा पहुँचा हूँ ये आम्बेडकरवादी आपकी बात क्यों नही समझ रहे ये मैं अच्छी तरह समझ रहा हूँSee Translation
            • Tribhuwan Singh
            • Tribhuwan Singh कोई बात नही Indu Shekhar Singh जी।
              अम्बेडकरवादी सब समझ रहें है।
              जान के अनजान बन रहे हैं।
               
               
              • Tribhuwan Singh /लेकिन यहाँ ये उल्लेख करना भी उचित होगा कि दूसरी caste के समस्त लोग इस शास्त्र व्यसाय में सन्नद्ध नहीं हैं /वो राजपूत अलग हैं जो घुड़सवार सैनिक
                के रूप में युद्ध में भाग लेते हैं / लेकिन जहाँ तक khetris (क्षत्रियो) की
                बात है वे अपने बहादुर पूवजों से निम्न हो चुके हैं और हथियार त्यागकर

                व्यापार (Merchandise) के छेत्र में उत्तर चुके हैं /
              • Tribhuwan Singh
              • Tribhuwan Singh तीसरी caste है बनियों का जो ट्रेड या व्यापर सँभालते हैं ,इन्हीं में से कुछ शर्राफ (Shroff ) जो मनी एक्सचैंजिंग या बैंकर का काम करते है /और कुछ
                लोग ब्रोकर हैं जिनके एजेंसीज के जरिये व्यापारी (मर्चेंट्स ) खरीद फरोख्त
                करते है / इस caste के लोग इतने व्यवहारिक ( Subtle ) और व्यसाय प्रवीण हैं
                ...See More
              • Tribhuwan Singh
              • Tribhuwan Singh ये अपने बच्चो को बालपन से ही आलस्य से दूर रहने कि शिक्षा देते हैं और हमारे बच्चों कि तरह आवारागर्दी से रोकते हैं और उनको अंकगणित कि मुहँजबानी
                शिक्षा इस तरह से देते हैं कि वे कठिन से कठिन सवाल का जबाब चुटकियों में
                दे देते हैं /इनके बच्चे हमेशा पिता क
                े साथ रहते हैं और ये अपने बच्चो को
                व्यापार के साथ उसके गुड और दोष समझते जाते हैं और काम करते जाते हैं / ये
                जिस संख्या (figures ) का इस्तेमाल करते है उसी का प्रयोग पूरे देश में
                होता है , चाहे भाषा के बोलने वाला हो /
              • Tribhuwan Singh
              • Tribhuwan Singh ये हर उस चीज को अभक्ष्य मानते हैं जिसमे प्राण हों / किसी प्राणी कि हत्या करने के बजाय ये सवयं जान देना पसंद करते हैं /यहाँ तक कि ये कीड़े मकोड़ों
                की भी हत्या पसंद नहीं करते और ये अपने धर्म के पक्के है /यहाँ ये भी बता
                दूँ कि ये युद्ध में भाग नहीं लेते
                , किसी पर हाथ नहीं उठाते / ये किसी
                राजपूत के घर न कहते है न पानी पीते हैं क्योंकि वे जानवरों का बध करते हैं
                खाने के लिए, गाय को छोड़कर क्योंकि गाय अबध्य है और कोई उसको खान नहीं
                सकता /
                 
                 
                • Tribhuwan Singh चौथी caste को Charados या Soudra कहते हैं, ये राजपूतों कि तरह ही युद्ध में भाग लेते हैं लेकिन दोनों में मात्र इतना फर्क है कि राजपूत घुड़सवार
                  योद्धा होते हैं और ये पदाति योद्धा / दोनों ही युद्ध में जान देने में
                  अपना गौरव समझते हैं / एक योद्धा चाहे वो घुड़सवार हो या फिर पदाति , यदि

                  युद्ध के दौरान मैदान छोड़कर भाग जाता है तो वो हमेश के लिए अपना सम्मान खो
                  देता है और ये पूरे परिवार के लिए लज्जा का विषय है /
                • Tribhuwan Singh
                • Tribhuwan Singh इसी सन्दर्भ में एक कहानी सुनना चाहूँगा जो मुझे इस देश में सुनायी गयी / एक योद्धा जो अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता था और बदले में पत्नी अपने पति
                  को उतना ही प्यार करती थी \ ये योद्धा एक यद्ध के दौरान मृत्यु के भयवश
                  नहीं बल्कि पत्नी के प्रेमवश और उसके
                  ...See More
                • Tribhuwan Singh
                • Tribhuwan Singh अब जो बाकी बचे लोग हैं जो न चार caste में समाहित नहीं होते उनको PAUZECOUR के नाम से जाना जाता है ये सब मैकेनिकल आर्ट (अर्टिसन यानि शिल्प
                  और अन्य उद्योग ) का कार्य करते हैं / इनमे आपस में कोई भेद नहीं है सिवा
                  इस बात के कि वे अलग अलग व्यवसाय करते हैं
                  जो इनको अपने पिता से स्वाभाविक
                  रूप से मिलता है / और एक अन्य बात ये है कि उदाहरण के तौर पर यदि मान
                  लीजिये कोई दरजी कितना भी धनि मई क्यों न हो उसको अपने बेटे बेटियों कि
                  शादी उसी के व्यवसाय वाले के परिवार में करना होता है /इसी तर यदि उस दरजी
                  कि मृत्यु होगी तो श्मशान घाट पार जाने वाले लोग भी उसी पेशे के होंगे /
                • Indu Shekhar Singh
                • Indu Shekhar Singh अनजान बनने मे ही उनका फायदा है लेकिन कब तक ?See Translation
                • Tribhuwan Singh
                • Tribhuwan Singh बकरे की अम्मा खैर मनाये तब तक
                • Indu Shekhar Singh
                • Indra Deo Singh
                • Indra Deo Singh This is very systematic growth and improve ment of their business skills and management, ,,, by generation to generation, ,,,,,.

                  This is very theoretical and practical knowledge of bussing and social relation right from their child hood, ,,,,, they
                  were marring in the same same group of people of business community, ,,,,,

                  This type of business management education was better than top class business school of world of modern day, ,,,,,,,,

                  Such type of business management enterpenurship was rare that s why
                  We were drawing more than 50% in international business share, ,,,,,,,,,,
                • Devesh Maurya
                • Devesh Maurya आप की पोस्ट के उत्तर मे बहुत सारे कॉमेंट्स जातिवादी मानसिकता से लिखे प्रतीत होते है ..........शहरों-कस्बों और महानगरों में रहनेवाले 12-15% लोगो का एक वर्ग , गांव-देहात में रहनेवाले लोगों से भी ज्यादा भेदभावी है और पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है। यह वर्ग पै...See MoreSee Translation
                • Indra Deo Singh
                • Indra Deo Singh आप फिर से बहुत ध्यान से ऊपर से सारे कमेंट study करे।
                  मानसिकता कोई रसगुल्ला नहीं है जो खाया और ....
                  हम लोग भी पता लगा रहे कि असली खलनायक कौन?

                  सवर्ण,,,, शाषन सत्ता या स्वम् दलित चिन्तक,,,,,,
                  See Translation
                • Indra Deo Singh
                • Indra Deo Singh शष
                  आज अवधी •••••••••


                  जाड़ा बहुत सतावत बा

                  सरसर हवा बाण की नाईं
                  थर थर काँपैं बाबू माई
                  तपनी तापैं लोग लुगाई
                  कोहिरा छंटत नहीं बा भाई
                  चहियै सबै जियावत बा
                  जाड़ा बहुत सतावत बा

                  गरमी असौं बराइस खीस
                  जाड़ा भय बा ओसे बीस
                  जौ ना रोकिहैं अब जगदीस
                  मरि जइहैं बुढ़ये दस बीस
                  जियरा बहुत जरावत बा
                  जाड़ा बहुत सतावत बा

                  माछी मच्छर भएन अलोप
                  पहिने बाटै सब कनटोप
                  बरफ किहे बा अइसन कोप
                  गाँव भयल सरवा यूरोप
                  केहु ना देखै आवत बा
                  जाड़ा बहुत सतावत बा
                  See Translation
                • Indra Deo Singh
                • Indra Deo Singh A poetry in avadhi language
                  Enjoy it
                  From net, ,,,
                • Subhash Jhajhria
                • Subhash Jhajhria अच्‍छी जानकारी मिल रही है। सरजी आभारी हूँSee Translation
                • Saumya Srivastava
                • Saumya Srivastava ऐसी अप्रत्यक्ष जानकारियों को प्रत्यक्ष रूप देने के लिए "अभिनन्दन"और "धन्यवाद " See Translation
                • Tribhuwan Singh
                • Tribhuwan Singh Saumya Srivastava जी स्वागत है।
                • Tribhuwan Singh
                • Tribhuwan Singh
                • Tribhuwan Singh अब डॉ आंबेडकर के " शुद्र कौन थे" नामक थीसिस का क्या होगा ।
                  ये तो झूठ का पुलिंदा प्रतीत होता है।
                • Tribhuwan Singh
                • Tribhuwan Singh इसके अनुसार तो शुद्र योद्धा भी थे।तो फिर डॉ आंबेडकर का menial जॉब वाली थ्योरी तो गढ़ी हुई है।
                • माधबेंद्र कुमार
                • माधबेंद्र कुमार Tribhuwan Singh जी, मैंने पहले ही अपाच्य शब्द पर सवाल उठाया था। आपका कहना था पुरे दिन देख लीजिये। अब कोई खायेगा तब तो अपाच्य होगा। दरअसल, यह कुछ लोगों के लिए अग्राह्य है। वे उछलते कूदते आते हैं और सूंघते ही भाग जाते हैं smile emoticonSee Translation
                • Tribhuwan Singh
                • Tribhuwan Singh माधबेंद्र कुमार जी अग्राह्य होने का कारण है ।
                  आप जिस झूठ को इतने अरसे से बंदरिया के बच्चे की तरह कलेजे से चपकाये हुए घूम रहे है उसी बच्चे के मृत होने के बाद भी क्या करती है बंदरिया ?फेंकती नहीं न ।उस मानसिकता को समझिये।
                  दिमाग मान रहा है लेकिन दिल है कि मानता नहीं।
                • माधबेंद्र कुमार
                • माधबेंद्र कुमार बंदरिया वाला उदहारण सटीक बैठता है।See Translation
                • Tribhuwan Singh
                • Indra Deo Singh
                • Indra Deo Singh त्रिभुवन जी
                  मेरे बचपन में एक बहुत बड़ा फोड़ा हो गया।
                  ऑपरेशन के बाद हर तीसरे दिन पट्टी बदलनी पड़ती थी

                  और उसमे बहुत दर्द होती थी
                  मैं डॉक्टर को बहन माँ की बहुत सी गालियो से नवाजता था...
                  और वह डॉक्टर सिर्फ... सिर्फ. हँसता. रहता था....
                  मैं ठीक होने के बाद उस से मिलने गया......
                  मै दुनिया का सबसे शर्मिंदा ब्यक्ति था..।।
                  dot ने कहा..... अभी की आपकी तकलीफ ...से..बाद में सुरक्षित और खुश रहेगे.....
                  उस समय मैं उनको गालियां दे रहा था
                  आज लागत है doctor कितने सही थे....।।
                   
                  • Tribhuwan Singh Indra Deo Singh सर सही कह रहे है ।
                    इस लेखन को भी इस मवाद से बजबजाते फाड़े की शल्यक्रिया ही समझे।
                    कम से कम एक रहस्यमयी आवरण से पर्दा उठना तो शुरू हुवा।

                    अगली पीढ़ी शा यद् नफरत की उस आग दे न जले जिसको न जाने कौन सा इतिहास पढाया जा रहा है।
                  • Tribhuwan Singh
                  • Tribhuwan Singh Sumant Bhattacharya सर की हाजिरी नही लगी।
                  • Tribhuwan Singh
                  • Tribhuwan Singh Arun Tripathi bhi नजर नहीं आये।
                    शायद highcourt खुल गया।
                  • Arun Kumar
                  • Tribhuwan Singh
                  • Tribhuwan Singh आज Sumant Bhattacharya sir की दूकान ठीक चल रही है इस्लिए लिफ्ट नही देंगे Arun Kumar sir.
                  • Sumant Bhattacharya
                  • Sumant Bhattacharya Tribhuwan Singh फेसबुक मेरे लिए दुकान नहीं है मित्र...वैसे आज ही अलविदा करने की सोच रहा था...फिलहाल उसी मानस में हूं..किसी भी वक्त आप सबसे इजाजत ले सकता हूंSee Translation
                  • Arun Kumar
                  • Arun Kumar मित्र को जब जरुरत होगा तो लिफ्ट क्या सीढ़ी लेकर आ जाएंगे सुंमत दा। भरोसा है। क्युं सुंमत दा हम बोल दिये तो बोल दिये@ SholeySee Translation
                  • Tribhuwan Singh
                  • Tribhuwan Singh हा हा हा दूकान को आप गलत अर्थो में ले गए।
                    आपके सार्थक कमेंट नहिं आये इस लेख पर ।
                    इसलिए मैंने आग्रह किया।
                  • Tribhuwan Singh
                  • Tribhuwan Singh Sanjay Jothe जी क्या मत है आपका?
                    तवेर्निएर झूठ लिख रहा है क़ि डॉ आंबेडकर ईसाई संस्कृतज्ञों के जाल में फंस गए। क्या का क्या लिख मारा।
                    अर्थ का अनर्थ कर डाला।
                  • Tribhuwan Singh
                  • Tribhuwan Singh पी आर मीणा जी आप क्या अर्थ निकालेंगे तवेर्निरर के इस लेख का ?
                    पुरुषशुक्त की तो धज्जी उड़ गयी।
                  • Tribhuwan Singh
                  • Tribhuwan Singh Devesh Maurya बॉस इस कथानक ने तो अम्बेडकर को जीरो नम्बर देकर फ़ैल कर दिया।
                    आप क्या कह्ते हैं ~~?
                  • Tribhuwan Singh
                  • Tribhuwan Singh @Chandra Bhan Prasad जी आइये।
                    जरा समझा जाय।
                  • Tribhuwan Singh
                  • Tribhuwan Singh Sanjay Kotiyal ji PAUZECOUR का अर्थ पता नहीं किया आपने /
                  • Sanjay Jothe
                  • Sanjay Jothe Tribhuwan Singh सर ... बहुत धन्यवाद आपका ... इतनीअच्छी रिसर्च हमारे सामने लाने के लिए ... इन सबसे अगर यार सिद्ध होताहै (जैसाकि शायद आप करना चाहते है) कि सब जातियां सम्मानित थीं और उनके अपने कार्य फिक्स थे तब तो हम सबको मेहनत करके पुराना स्वर्णयुग वाप...See MoreSee Translation
                  • Sanjay Jothe
                  • Sanjay Jothe Tribhuwan Singh सर ... यहाँ देखिये ... प्रणाम...See Translation
                  • Arun Khandelwal
                  • Arun Khandelwal Tribhuwan Singh महाप्रभु आज तक आप मेरी नजरों से कैसे ओझल रहे
                    आज सुदेश आर्य की पोस्ट पर आपका कमेन्ट (जो मेरे ही सम्बन्ध में था ) यदि ना पढता तो शायद मुलाकात ना होती
                    कमेन्ट पढ़करलगाकीआप काफी सुलझे हुए व्यक्ति हैं

                    आपकी वाल पर आकर वैसा ही पाया
                    इस महत्वपूर्ण और सारगर्भित जानकारी के लिए सुक्रिया
                    See Translation
                  • Arun Khandelwal
                  • Tribhuwan Singh
                  • Tribhuwan Singh Abhar @Arun Khandelwal ji
                  • Tribhuwan Singh
                  • Tribhuwan Singh चौथी caste को Charados या Soudra कहते हैं, ये राजपूतों कि तरह ही युद्ध में भाग लेते हैं लेकिन दोनों में मात्र इतना फर्क है कि राजपूत घुड़सवार
                    योद्धा होते हैं और ये पदाति योद्धा / दोनों ही युद्ध में जान देने में
                    अपना गौरव समझते हैं / एक योद्धा चाहे वो
                    घुड़सवार हो या फिर पदाति , यदि
                    युद्ध के दौरान मैदान छोड़कर भाग जाता है तो वो हमेश के लिए अपना सम्मान खो
                    देता है और ये पूरे परिवार के लिए लज्जा का विषय है / इसी सन्दर्भ में एक
                    कहानी सुनना चाहूँगा जो मुझे इस देश में सुनायी गयी
                  • Tribhuwan Singh
               
              • Tribhuwan Singh अगर टैवर्नियर जैसे लोग जिनको इतिहास में कई जगह क्वोट किया गया है , उनके मुख्या बिन्दुओं को अनदेखा किया गया जो डायरेक्ट एविडेंस हैं भारतीय इतिहास के बारे में ,तो क्या इसको शाजिश का हिस्सा नहीं समझा जाना चाहिए ?? चाणक्य के शुश्रूषा वार्ता कारकुशीलम् शूद्रस्य कर्मः से डॉ अम्बेडकर की मेनिअल जॉब वाले शूद्र की यात्रा मात्र ३०० साल की हैं ?? तो डॉ आंबेडकर शूद्रों की खोज में यदि वेदों की सैर करते हैं तो झोला छाप संस्कृत विदों के लेखन के आधार पर ही न /
              • Praphull Jha
              • Praphull Jha Very usefull for student
              • Tribhuwan Singh

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