बाजपाई या मालवीय को दिया गया भारत रत्न हो या डॉ आंबेडकर को १९३२ में दिया गया कम्युनल अवार्ड हो /
कितनी राजनीति और कितना सम्मान समावेशित होता है इन पुरस्कारों में
??.............................................................................................बाजपाई और मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न का सम्मान दिए जाने का कुछ लोगों ने स्वागत किया , कुछ लोगों ने विरोध / राजनैतिक पार्टियों के गिरोहबंद बयान को उनकी राजनैतिक यात्रा और उनके अस्तित्व की रक्षा के लिए "डूबते को तिनके का सहारा" की तरह लिया जा सकता है / उनकी धूर्ततापूर्ण बयानबाजी से लोग वर्षों से परिचित है , इसलिए लोग उसको एक गंभीरता से नहीं लेते / लेकिन कुछ JNU जैसे भारत के शीर्ष संस्थानों में प्रोफेसर के पद पर विराजमान दलित चिंतक@विवेक कुमार जैसे विद्वान , जब इन पुरस्कारों पे जाति और वर्ण के नाम पर प्रश्न चिन्ह उठाते है , तो वे अपनी विरासत भूल जाते हैं / और वे ये भी भूल जाते हैं कि किस तरह डॉ आंबेडकर को १९३२ में British Prime Minister Ramsay Macdonald ने "कम्युनल अवार्ड " से सम्मानित कर , उनको "बांटो और राज्य करो " की पालिसी के तहत अपने राजनैतिक दंड फंद का एक मोहरा भर बनाया था / और डॉ अंबेडकर उस राजनैतिक खड़यन्त्र में फंस भी गए , जाने जानबूझकर चाहे अनजाने / अगर गांधी अंग्रेजों की रग रग से न वाकिफ होते , और अंग्रेजों की चालबाजी के शिकार डॉ आंबेडकर की चली होती तो आज कैसा भारत होता ??
क्या डॉ आंबेडकर , जिन्ना से पहले ही, जिन्ना की राह पर नहीं चले गए होते ??
@vivek kumar Sanjay Jothe @chandra Bhan Prasad
कितनी राजनीति और कितना सम्मान समावेशित होता है इन पुरस्कारों में
??.............................................................................................बाजपाई और मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न का सम्मान दिए जाने का कुछ लोगों ने स्वागत किया , कुछ लोगों ने विरोध / राजनैतिक पार्टियों के गिरोहबंद बयान को उनकी राजनैतिक यात्रा और उनके अस्तित्व की रक्षा के लिए "डूबते को तिनके का सहारा" की तरह लिया जा सकता है / उनकी धूर्ततापूर्ण बयानबाजी से लोग वर्षों से परिचित है , इसलिए लोग उसको एक गंभीरता से नहीं लेते / लेकिन कुछ JNU जैसे भारत के शीर्ष संस्थानों में प्रोफेसर के पद पर विराजमान दलित चिंतक@विवेक कुमार जैसे विद्वान , जब इन पुरस्कारों पे जाति और वर्ण के नाम पर प्रश्न चिन्ह उठाते है , तो वे अपनी विरासत भूल जाते हैं / और वे ये भी भूल जाते हैं कि किस तरह डॉ आंबेडकर को १९३२ में British Prime Minister Ramsay Macdonald ने "कम्युनल अवार्ड " से सम्मानित कर , उनको "बांटो और राज्य करो " की पालिसी के तहत अपने राजनैतिक दंड फंद का एक मोहरा भर बनाया था / और डॉ अंबेडकर उस राजनैतिक खड़यन्त्र में फंस भी गए , जाने जानबूझकर चाहे अनजाने / अगर गांधी अंग्रेजों की रग रग से न वाकिफ होते , और अंग्रेजों की चालबाजी के शिकार डॉ आंबेडकर की चली होती तो आज कैसा भारत होता ??
क्या डॉ आंबेडकर , जिन्ना से पहले ही, जिन्ना की राह पर नहीं चले गए होते ??
@vivek kumar Sanjay Jothe @chandra Bhan Prasad
- सुदेश आर्या यह सब दूषित राजनीति के तहत हो रहा है और होता ही रहेगा !
सत्य हमेशा ही हाशिये पर रखा जाता रहा है !!See Translation - Amit Jaiswal घिन आती है ऐसी गिरी हुई मानसिकता के इन्सानों से जो हर चीज को जातिवाद के तराजु पे तौलते हैंSee Translation
- Tribhuwan Singh Sudesh Arya Journalist एकदम सत्यवचन / लेकिन क्या राजनीति पिछले दरवाजे से इन क्षिक्षा संस्थानों में इन प्रोफेसरों के दिमाग में घुस गयी है ? ये प्रोफेसर सरकार से वेतन बच्चों को शिक्षित करने के लिए ले रहे है कि प्रदूषित करने के लिए ?
- Tribhuwan Singh Amit Jaiswal ji घिन आये चाहे न आये ये तो सच्चाई है
- Tribhuwan Singh हा हा हा तुम गरियाव औ हम गुर्राए भी न
- Surendra Solanki डॉ आंबेडकर को फॉलो करने वाले।
वर्ण (आतंरिक)और जाति (बाहिरी टैग)
उदहारण के तौर पर ब्राह्मण को एक ही मान कर कार्य कर रहे।
इसलिए उनके लिए ब्राह्मण केवल एक व्यक्ति हे जिसका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ। जिससे डॉ आंबेडकर ने पूजा कराने से मना किया।
ब्राह्मण यानी शर्मा मिश्रा उपनाम वाला व्यक्ति या पुजारी।
इन्हें उसके अवगुण से मतलब होता है। जिसे वे दोष रोपण कर सकें। सद गुण होते क्या हें इसकी परवाह खुद के लिए नही की तो दुसरे के लिए क्या करेंगे।See Translation - Manoj Abhigyan आंबेडकर को कम्युनल अवार्ड दिया गया, ये एक नई जानकारी देने के लिए आपका आभार त्रिभुवन सिंह जी !!!See Translation
- Tribhuwan Singh He was awarded seperate communal electorate , which was highly opposed by freedom fighters.
दलित उसके बाद जन्मे 1935 में प्रभु । - Tribhuwan Singh लिंक देने की जरूरत नहीं है ।
गूगल गुरु से आशीर्वाद ले।
पढ़े लिखे दीखते हैं।
जहीन लगते हैं। - नरेन्द्र मिश्रा विवेक कुमार जैसे लोग नई जनरेशन को कुछ अच्छा तो दे नही सकते..इसलिए जातिगत बीज बो रहे हैSee Translation
- Kaushal Dave प्रो Vivek kumar जैसे लोग भारत रत्न की 3 recommendations में भी 2 के लिए आरक्षण की मांग कर रहे है। चुल्लू भर पानी में ....See Translation
- Indu Shekhar Singh बहुत बढ़िया टिप्पणी।प्रो विवेक कुमार भूल रहे हैं कि जो नफरत की खेती वे कर रहे हैं उसकी पैदावार उनके ही घर जाने वाली है यही प्रत्यक्ष भी है न देखें तो कोई क्या कर सकता हैSee Translation
- Manoj Abhigyan मैं जो दीखता हूँ वह हूँ नहीं त्रिभुवन सिंह जी. गूगलाध्ययन में भी कोई ऐसा पुरस्कार नहीं है जो आंबेडकर को दिया गया हो. आपको मैं गूगल से ज्यादा ज़हीन मानता हूँ इसीलिए आपका आभार व्यक्त किया इस परम ज्ञान के लिए !!!!See Translation
- Tribhuwan Singh जी धन्यवाद।
मेरी कोशिश होती है कि व्यक्ति को वही दिखना चाहिए जो वो हो।
वरना रावण भी साधू वेश में अबला का अपहरण कर लेता है। - Manoj Abhigyan जी, आपकी बात सत्य लगती है लेकिन क्या किया जाय...जो होता है अकसर दीखता नहीं और जो दीखता है अकसर होता नहीं. जैसे आप मुझे ज़हीन दीखते हैं.See Translation
- Tribhuwan Singh Kaushal Dave जी @Vivek Kumar जैसे लोग आरक्षण को चाम्प के बैठ गए है।
तीन पीढ़ियों से ।
अपने वर्ग के नीचे के पायदान पर बैठे लोग इनके लिए वोट से ज्यादा मायने नही रखते। - Tribhuwan Singh Indu Shekhar Singh जी ये शिक्षक नहो रक्तबीज है।
फसल बोते है ये नफरत की।
खा भी रहे हैं गरिया भी रहे हैं ।
बाबा की किरपा से। - Devesh Maurya // किस तरह डॉ आंबेडकर को १९३२ में ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर रॅम्से मक्डोनाल्ड ने "कम्युनल अवार्ड " से सम्मानित कर , उनको "बांटो और राज्य करो " की पालिसी के तहत अपने राजनैतिक दंड फंद का एक मोहरा भर बनाया था / और डॉ अंबेडकर उस राजनैतिक खड़यन्त्र में फंस भी गए//................आंबेडकर ने माहाराष्ट्र के नासिक जिले के येवला नामक स्थान पर १३ अक्टूंबर, १९३५ मे कहा था कि “हमने हिंदू धर्म से समानता का दर्जा प्राप्त करने के लिए हर प्रकार के प्रयास किए, सत्याग्रह किए परन्तु सब बेकार। हिंदू धर्म के समानता के लिए कोई स्थान नहीं है । हिंदू धर्म का त्याग करने से ही हमारी स्थिति मे कोई सुधार हो सकेगां। धर्मान्तरण के सिवाय हमारे पास कोई दूसरा मार्ग नहीं है । हमारे साथ यह व्यवहार ईसलिए हो रहा है क्योकि हम दुर्भाग्य से अपने आप को हिंदू कहेते हैं । यदि हम किसी अन्य धर्म का अवलम्बन कर रहे होते तो हमारे साथ ऐसा व्यवहार करने का कोई सहास नहीं करता। स्वयं के लिए कोई ऐसा धर्म चुन लो जो तुम्हे समानता का दर्जा व समता का व्यवहार दे। अब हम अपनी भूल का सुधार कर लेंगे। मै दुर्भाग्य से हिंदू धर्म मे अछूत का कलंक लेकर पैदा हुआ था जो कि मेरा दोश नहीं था किन्तु मै हिंदू धर्म मे रह कर मरुगां नहीं, यह मेरे वश मे है।..........See Translation
- Devesh Maurya .आम्बेडकर की इस घोषणा से ईसाई मिशनरियां और इस्लामी संस्थाएँ बहुत प्रसन्न हुईं ।.....उनके लिये तो यह शिकार फांसने जैसी स्थिति थी । .............................हैदराबाद के निजाम ने तो बाबा साहेब को अकूत धन का लालच भी दिया । लेकिन आम्बेडकर नहीं डगमगाये । उनके एक अन्नय शिष्य शंकरानन्द शास्त्री ने लिखा कि उनका मानना था कि मतांतरण से राष्ट्रान्तरण होता है । बाबा साहेब का मत था कि इस्लाम और ईसायत विदेशी मजहब हैं । इन के अपनाने से व्यक्ति अपने देश की परम्परा से टूटता है । कुछ लोग आम्बेडकर पर आरोप लगाते हैं कि वे अंग्रेजों के समर्थक थे । यदि ऐसा होता तो बे अंग्रेजों को खुश करने के लिये ईसाई बनने में देर न लगाते .See Translation
- Devesh Maurya जब ईसाई मिशनरियां दलित समाज को मतान्तरित कर रही थी ।......... तब आम्बेडकर ने नागपुर में दीक्षा ग्रहण की ।....... उन्होने कट्टर ब्राह्मणो को आत्मचिन्तन व सकारात्मक कदम उठाने के लिए २१ वर्ष तक ईन्तजार किया, था उन्होंने रहस्योदघाटन किया कि ...........मैंने अरसा पहले महात्मा गान्धी को बचन दिया था कि मैं जिस मत में भी जाउंगा , तो यह ध्यान रखूंगा कि उससे भारतीयता को कम से कम नुक़सान हो । आज मैंने वह बचन पूरा कर दिया है । बुद्ध भारत की सनातन परम्परा का ही हिस्सा हैं । इस लिये मेरी इस दीक्षा से कोई हानि नहीं होगी .See Translation
- Surendra Solanki विवेक कुमार जैसे लोग नई जनरेशन को कुछ अच्छा तो दे नही सकते..इसलिए जातिगत बीज बो रहे है
ये जरूरी है। अगर ये जातिगत बीज नही बोयेंगे तो इनकी कोन सुनेगा।
सब के सब पढ़े लिखे लोग हैं। कोई शुद्र नही है। बस दूसरो को शुद्र बनने में इनका सबसे बड़ा हाथ है।
67 years हो गए। मैंने पूरी अध्यात्म को उल्ट पलट कर रख दिया। पता चला बुद्धि से ही शुद्र बनाया जा रहा। पहले कभी पंडित ने किया आज ये नव ब्राह्मण कर रहे।See Translation - Devesh Maurya आम्बेडकर समाज के एक बड़े हिस्से को विदेशी मिशनरियों व सामी सम्प्रदायों के जाल से बचाने का रास्ता दिखा गयेSee Translation
- Tribhuwan Singh और बाबा की समझ का दायरा समझना पड़ेगा।
- Tribhuwan Singh और कांचा इलैया जैसे दलित उनके दिखाए रस्ते का क्या इस्तेमाल कर रहे हैं आपको पता होगा Devesh Maurya boss.
न हो तो बताऊँ। - Shreyat Bouddh · 9 mutual friendsदेश की आज़ादी की लड़ाई के समय अटल बिहारी बाजपेई ने अंग्रेजो की ओर से स्वतंत्रता संग्राम सेनानियो के खिलाफ अंग्रेजो को गवाही दी थी ।
उनकी गवाही से भारत के क्रांतिवीर "लीलाधर बाजपेई" को फांसी की सजा भी हुई थी ।
आज उसी बाजपेई को मोदी सरकार भारत रत्न देने जा रही है।
अगर मानने में न आये तो ये उसका प्रमाण है।
लिंक ओपन करके खुद पढ़ लीजियेगा..........
http://www.frontline.in/static/html/fl1503/15031150.htm
www.frontline.in
frontline.in - Indra Deo Singh आंबेडकर ने लाखो अनुयायियोके साथ बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिए और बाक़ी हिन्दू धर्म के भाग ही रहे।क्या जिन लोगो ने बौद्ध धर्म स्विकार किय। वे सामाजिक और धार्मिक रूप से अति विकसित हो गए होंगे और उनके भाई जो हिन्दू धर्म में रह गए होंगे वे तो जाहिल जालिम शुद्र और कीड़े रह गये होंगे।
ये तो माँनसिक दिवलियपन अवसरवादिता की हद है कि नतो आपको आर्थिक उन्नयन हुआ और न ही धर्म के मूल को समझ पाये।।हा आपने दलित और दूसरे लोगोके बीच एक स्थाई दीवार अवश्य पैदा कर दीSee Translation - Indra Deo Singh आप को पता है कि दार्शनिक रूप से बौद्ध धर्म,,हिन्दू का संशोधित रूप है।फिर तो आप कुए से बचकर खाई मै गिर गए।
बौद्ध धर्म उपनिसद का एक संशोधित रूप है ।See Translation - Surendra Solanki इंद्र जी।
डॉ अम्बेडकर ने आध्यात्मिकता नही खोजी।
मानसिक स्तर पर अपने को शुद्र समझा। इसलिए उनके फोल्लोवेर्स अपने को शुद्र से दूर नही कर पा रहे।See Translation - Surendra Solanki सुरेन्द्र जी, क्षत्रिय जिसके क्षत्रछाया मे सभी सूखी हों
आपका कर्म का साहस ही आपको सुखी कर सकताSee Translation - Indu Shekhar Singh उनको समझना होगा कि शुद्र सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध कार्य करते थे और समाज उन्हें पसंद नही करता था ये आज भी हैSee Translation
- Surendra Solanki कर्म सभी के सभी ब्रह्म पुरुष के क्षत्रिय कार्य हैं।
मेहतर चमार लोहार किराना लड़ना पूजा।
सभी के सभी ब्रह्म पुरुष के कर्म।See Translation - सम्यक् दृष्टि · 11 mutual friendsमानना पड़ेगा Tribhuwan Singh ji, भारत रत्न और कम्यूनल अवार्ड की क्या सटीक तुलना की है| अब लगे हाथ यह भी कह दीजिए दोनों सरकारों की मंशा भी एक हैSee Translation
- सम्यक् दृष्टि · 11 mutual friendsप्रो. विवेक कुमार शिक्षक नहीं रक्तबीज हैं, वो नफरत के बीज बो रहे हैं ! आपके श्रद्धेय महापुरुषों और ग्रंथों ने तो मानवता की मिसाल कायम की हैSee Translation
- सम्यक् दृष्टि · 11 mutual friendsजाति का जहर बोने वाले दलित महापुरुष हैं और बाकी तो समता के पुजारी हैं ?इतनी विद्वता से कभी अपने ग्रंथों की आलोचना कर लीजिएSee Translation
- Tribhuwan Singh सम्यक् दृष्टि जी उन ग्रंथो तक आपकी पहुँच नही हैं क्या ।
- सम्यक् दृष्टि · 11 mutual friendsइन्हीं ग्रन्थों में कई विधानों पर नजर डालिए, आज वो संगीन अपराधों की श्रेणी में आते हैं|See Translation
- सम्यक् दृष्टि · 11 mutual friendsपहुँच है भी और जानता भी हूँ , लेकिन मैं उनकी आलोचना करके ख्वामखाह चर्चा में बनाये नहीं रखना चाहताSee Translation
- Tribhuwan Singh आने दे सम्यक जी।
शर्मावे न - सम्यक् दृष्टि · 11 mutual friendsTribhuwan Singh ji, आप के लोगों को आइना देखने की आदत नहीं है, अपना ही चेहरा देखकर नियंत्रण खो बैठते हैं और फिर मैं तो बाबा साहब की परंपरा का हूँ , हो सकता है उच्चारण गलत हो जाय, आप मर्मज्ञ हैं , उच्चारण भी शुद्ध है मैं आप को संदर्भ देता हूँ , शुद्धता के साथ आप बता दीजिए|... पब्लिकेशन बता देता हूँ , भुवन वाणी ट्रस्ट( शुद्ध उच्चारण) से ४५००/ मूल्य की रिग्वेद प्रकाशित है, उसके प्रथम मण्डल में शुनःशेप और राजा ..सॉरी, सत्यवादी राजा हरिश्चन्द की कथा दी गई है , उसे आप ही बता दीजिए कैसे और किसलिए राजा हरिश्चंद ने उसे खरीदा था| फिर आगे बात करते हैं ... आप मुझ जैसे अशुद्ध उच्चारण वाले से श्लोक की अपेक्षा मत करियेगा, हाँ इतना अवश्य है यह मेरे पास है गुमराह मत करियेगाSee Translation
- Manoj Abhigyan त्रिभुवन सिंह जी, एक और जिज्ञासा थी जिसे गूगल ने शांत नहीं किया. उम्मीद है, आप के पास इसका जवाब जरूर होगा. ये कम्युनल पुरस्कार और किन किन लोगों को दिया गया था ? लिस्ट नहीं मिल रही है.See Translation
- सम्यक् दृष्टि · 11 mutual friendsसुरेन्द्र जी, मैं आप को इसे स्कैन कर के भेज दूँगा, अभी हो सकता Tribhuwan Singh ji, लगा दें , इंतजार कर लेते हैंSee Translation
- Upadhyaya Pratibha जहाँ तक मेरी जानकारी है Nobel prize मरणोपरांत नहीं दिया जाता . पुरस्कार की घोषणा के बाद मृत्यु की स्थिति अपवाद है. यही नियम “भारत रत्न” पर भी लागू किया जाना चाहिए. वैसे तो यह “सरकारी रत्न” है.See Translation
- Tribhuwan Singh सम्यक् दृष्टि जी फिर आप कथावाचन करने लगे।
आप लोगों की यही सत्यनारायण कथा परंपरा से मुझे अरुचि है। - Upadhyaya Pratibha छोटी सी बात समझ लें, तो इसके लिए इतना परेशान नहीं होना पडेगा. यह सरकारी रत्न है, जिसकी सरकार होगी, वह अपनी Ideology के लोगों को ही यह रत्न देगा.
यह सरकार GODSE को भी दे देगी. अगर मायावती प्रधानमंत्री बनेंगी , तो Dr. अम्बेडकर और कांशीराम को भी मिल जाएगा. “क्यों” के तर्क का इस पुरस्कार से कोई सम्बन्ध नहीं है.See Translation - Surendra Solanki मेरी सरकार बनी तो में माझी साहब को भारत रत्न दूंगा।
मेरी मूल निवासी की आइडियोलॉजी के लिए उन्हें धन्यवाद।
जय मूल निवासी जय ब्रह्म पुरुष।
😇😇😇😇😇😇See Translation - सम्यक् दृष्टि · 11 mutual friendsप्रतिभा जी, डा. अम्बेडकर को भारत रत्न पहले ही मिल चुका है| थोड़ा अपडेट कर लीजिएSee Translation
- Surendra Solanki प्रतिभा जी, डा. अम्बेडकर को भारत रत्न पहले ही मिल चुका है| थोड़ा अपडेट कर लीजिए
आप परेशान न हो। लोग बाग़ ज्यादा बिजी हो जाते हैं तो महत्त्व पूर्ण जानकारी भूल जाते हैं।😯😯See Translation - सम्यक् दृष्टि · 11 mutual friendsसुरेन्द्र जी , उन्हें पता है मुझे आपत्ति कहाँ है ? उसी से तो बचना चाहते हैं| डा. अम्बेडकर के अन्दर राई बराबर दोष ढूँढने वाले अपनों की गल्तियों के पहाड़ को भी देखकर आँख बंदकर योगी बनने लगते हैं|See Translation
- Surendra Solanki डॉ आंबेडकर सामाजिक विचारक और दार्शनिक थे। शब्दों में त्रुटि निकलना उनके विरोधियो की आदत है। पर असल मुद्दा उनका ब्रह्म विष्णु महेश गोरी गणेश और ख़ास तोर से ब्राह्मण नाम धारी को पूरी तरह रिजेक्ट कर देना है।
पर मेरा मन्ना हे जो बौद्ध धर्म में हैं। उन्हें बौद्धिक अवस्था में जा कर विवेकशील जीवन जीना चाहिए। बस इतना ही।See Translation - Indra Deo Singh दलितों की सबसे बड़ी समस्या क्या है? शिक्षा का अभाव होना,,,,, भूमि हीन होना,,,,,, धर्म के असली तत्त्व को नही जानना,,,,,,,, या स्थाई रोजी रोटी की बन्दों बस्त न होंना,,
अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन से सारे दलितों को जीवत ही मुक्ति दे दी,,,, . लोग कहते हैं कि वे constitution के निर्माता थे तो भूमि हीन दलितों को न्यूनतमभूमि से सम्बंधित मुउतलिक कानून क्यों नहीं बनाये,,,,,,,,,, reservation के तो वे10 साल से ज्यादा करने के ही विरुद थे। अम्बेडकर वादी क्यों न,, बाबा की इच्छा की सम्मान हेतु resrrvation निरस्तकरने हेतु सरकार से डिमांड करते,, यह दोगलापन क्यों भाई ,,See Translation - Indra Deo Singh दलितों हेतु अम्बेडकर का सबसे historcal योगदान है कि उन्होने दलितों और बाकी समाज के बीच इतनी बड़ी खाई खोदी कि उसको कभी भरा नहीं जा सकता।क्योंकि एक एक चमार पासी आदि ko उसको उसी नाम से बुलाने का legal right मिल गया!See Translation
- Surendra Solanki दलित की मुख्य समस्या राजनीती घेरा बंदी। जो मानस में इतना छाई है कि हर एक व्यक्ति जो ब्रह्म पुरुष के आरक्षित शब्द ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य के नाम का है वह आज अनुसूचित जातियो के समूह को मदद करने से कतराते हैं। और दलित नाम धारी थोड़ी से सामाजिक प्रतिष्ठा के बाद या तो खुद को समाज से अलग कर लेता या फिर वह दलित चिंतक बन जाता
इन सभी मानसिक बदलाओ के बीच अध्यात्म की और राह तो बहुत हैं। पर कोई वहां पहुँच कर बदलाव करने की नही सोच पा रहा।
में बदल पा रहा हूँ। वो मेरा खुद का सोचना और रास्ता भी मिला। चमार से ब्राह्मण बनने का सफ़र में तीन पीढी लग गयी।
मेरे अंदर का ब्राह्नण बाहिर के ब्राह्मण से बहूत अलग है। टैग रहित है ब्रह्म पुरुष है।जो साधना के लिए कार्य कर रहा।
में बहुत हद तक बदल पाया। इतना बदलाव में हर एक व्यक्ति में देखना चाहता। भले ही वो किसी भी टैग का क्यों न हो।See Translation - सम्यक् दृष्टि · 11 mutual friendsबस संकोच इतना ही है कि आप न सही दूसरे ही मुझे अशुद्ध उच्चारण वाला कहना शुरू कर देंगे| इसी लिए तो आप से कहा था आप ही सामने रखिए, ..मैं आप को और डिटेल दे दे रहा हूँ, यह अष्टकः १, प्रथम मण्डल के सूक्त संख्या २४ के मंत्र १ से शुरू होता है( पृष्ठ सं. १५३) .. आप उद्धरण दीजिए और और इंकार कर दीजिए कि इसमें नरबलि का उल्लेख नहीं है, साथ ही इंकार करिये कि सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने अपने पुत्र रोहित के बदले वरुण देव को बलि देने के लिए ब्राह्मण अजीगर्त के मझले पुत्र शुनःशेप को १०० गायों के बदले नहीं खरीदा था और हो सके तो यह भी बताने का प्रयास करिये कि यह आज भी संगीन अपराध की श्रेणी में नहीं आताSee Translation
- Surendra Solanki दलितों हेतु अम्बेडकर का सबसे historcal योगदान है कि उन्होने दलितों और बाकी समाज के बीच इतनी बड़ी खाई खोदी कि उसको कभी भरा नहीं जा सकता।क्योंकि एक एक चमार पासी आदि ko उसको उसी नाम से बुलाने का legal right मिल गया!
ये अनुसूचित जाति के अंदर वैठे राजनेता जो अपने को अध्यात्म से न जोड़ पाये उनके कारण हुआ।
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य से डर तो लगता है क्योकि ये आध्यात्मिक प्रतीत होते हैं। पर सही में हैं नहीँ।See Translation
Tribhuwan Singh किस्मे ? Arun Kumar जी
Tribhuwan Singh Manoj Abhigyan जी आप प्रकाश डालें।
पुरस्कार ट्राफी के रूप में न होकर आशीर्वाद के रूप में भी दिया जाता है।
ये आशीर्वाद रूपी पुरस्कार था अवार्ड था।
He was awarded .
पुरस्कार ट्राफी के रूप में न होकर आशीर्वाद के रूप में भी दिया जाता है।
ये आशीर्वाद रूपी पुरस्कार था अवार्ड था।
He was awarded .
Tribhuwan Singh Narendra Mishra ji सहमत।
Tribhuwan Singh हमने कहा शिकार हुए
समर्थक नही
समर्थक नही
Upadhyaya Pratibha 'सेपरेट इलेक्टोरेट' की बात उठाने वाले डा. अम्बेडकर ही थे न? तब सामाजिक न्याय कहाँ था?See Translation
Surendra Solanki में तो सभी कर्म को क्षत्रिय स्तर पर ला रहा हूँ।
सम्यक् दृष्टि · 11 mutual friends
महानुभाव कथा वाचन की परम्परा आप लोगों की है और सत्य नारायण की कथा तो हमने सुनना है/
Tribhuwan Singh सुरेन्द्र
जी , उन्हें पता है मुझे आपत्ति कहाँ है ? उसी से तो बचना चाहते हैं| डा.
अम्बेडकर के अन्दर राई बराबर दोष ढूँढने वाले अपनों की गल्तियों के पहाड़
को भी देखकर आँख बंदकर योगी बनने लगते हैं|
सम्यक् दृष्टि जी मैं आपकी तरह सर्वज्ञ नहीं हूँ कि आप के मन की जिज्ञासा और दिमाग की धुंध को जान सकू ।
और अगर पता है तो संवाद के मंच पर सार्वजनिक करने में संकोच कैसा ??
सम्यक् दृष्टि जी मैं आपकी तरह सर्वज्ञ नहीं हूँ कि आप के मन की जिज्ञासा और दिमाग की धुंध को जान सकू ।
और अगर पता है तो संवाद के मंच पर सार्वजनिक करने में संकोच कैसा ??
Upadhyaya Pratibha सोलंकी जी ने एकदम सही बात कही है ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य आध्यात्मिक
प्रतीत होते हैं। पर सही में हैं नहीँ।
इस प्रतीति को वास्तविक मानने की गलती ही लगातार सामाजिक खाई को गहरा रही है.
प्रतीत होते हैं। पर सही में हैं नहीँ।
इस प्रतीति को वास्तविक मानने की गलती ही लगातार सामाजिक खाई को गहरा रही है.














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