सुबो-सुबो............
हर युग प्रवर्तक को सबसे बड़ा खतरा होता है अपने ही समर्थकों से
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कबीर साहेब के जीवित रहते ही एक शिष्य भगवानदास उनका "बीजक" लेकर भाग गया, और पूरे बीजक को ही सांप्रदायिक बनाकर भ्रष्ट कर डाला। स्वयं कबीर साहेब ने अपने इस शिष्य को "भागूदास" और "भग्गूदास" नाम से याद किया।
हर युग प्रवर्तक को सबसे बड़ा खतरा होता है अपने ही समर्थकों से
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कबीर साहेब के जीवित रहते ही एक शिष्य भगवानदास उनका "बीजक" लेकर भाग गया, और पूरे बीजक को ही सांप्रदायिक बनाकर भ्रष्ट कर डाला। स्वयं कबीर साहेब ने अपने इस शिष्य को "भागूदास" और "भग्गूदास" नाम से याद किया।
"भागदास की खबरी जनाई । ले चरणामृत साधु पियाई ।
कोई आप कह कालिंजर गयऊ । बीजक ग्रंथ चोराई ले गयऊ।।"
बिहार के छपरा जिले के धनौटी में भग्गूदास की परंपरा आज भी जीवित है। कहने का आशय यह है कि किसी भी महापुरुष के लिए सबसे बड़ा खतरा उस महापुरुष के अपने ही समर्थक होते हैं।
कमअक्ल और निर्बल बुद्धि के गिरोहबंद, दिल्ली के सत्ता के गलियारों में दलाली करने वाले चंद लोगों की वजह से "अंबेडर" के "सामाजिक न्याय" का आंदोलन आज हाशिए पर जा टिका है। यह गिरोह खुद को अंबेडर का पुजारी कहता है और अंबेडकर को अपना भगवान भी घोषित करता है।
पर ये कैसे समर्थक हैं अंबेडकर के? ये कैसे आराधक है अंबेडकर के? जो ना तो अंबेडकर को कभी अनुशासित होकर पढ़े हैं.. ना ही अंबेडकर की स्थापनाओं को आत्मानुशासन ही बनाया है?
यदि सिर्फ इनको सुने तो आप महसूस करेंगे अंबेडकर नाम के एक इंसान ने दलित इतर जातियों के लिए गालियों की मोटी-मोटी किताबों की रचना की है, और विरासत में वसीयत इनके नाम कर गए हैं। गालियों पर इनका एकाधिकार है।
लेकिन अंबेडकर तो कुछ और ही थे..वो एक दृष्टि थे..गिरोह नहीं. एक संवेदना थे, गाली नहीं। एक मेधा थे, कुंठा नहीं।
यही वजह है कि आज अंबेडकर के लिखे और किए पर सुरक्षा कवच से बाहर निकल यह गिरोह शेष समाज के साथ सीधा संवाद करने को राजी नहीं हैं.. भाग रहे हैं, इस गली से उस गली..सच, कबीर साहेब को तो एक ही "भग्गूदास" मिला था, जिसने उनके बीजक को सांप्रादिक तौर पर भ्रष्ट कर डाला,.और यहां तो अंबेडकर का ग्लोसाइन लगाकर तो तमाम "भग्गूदास" खड़े हो गए हैं...अंबेडकर को भ्रष्ट करने वास्ते।
इन भग्गूदासों के बूते क्या समतामूलक समाज संभव है कभी ? सामाजिक न्याय के सच्चे योद्धाओं को ठहर कर सोचना ही होगा..आत्ममंथन करना ही होगा.. मैं गालियां सुनने को तैयार हूं।
शुभप्रभात - सुमंत भट्टाचार्य
कोई आप कह कालिंजर गयऊ । बीजक ग्रंथ चोराई ले गयऊ।।"
बिहार के छपरा जिले के धनौटी में भग्गूदास की परंपरा आज भी जीवित है। कहने का आशय यह है कि किसी भी महापुरुष के लिए सबसे बड़ा खतरा उस महापुरुष के अपने ही समर्थक होते हैं।
कमअक्ल और निर्बल बुद्धि के गिरोहबंद, दिल्ली के सत्ता के गलियारों में दलाली करने वाले चंद लोगों की वजह से "अंबेडर" के "सामाजिक न्याय" का आंदोलन आज हाशिए पर जा टिका है। यह गिरोह खुद को अंबेडर का पुजारी कहता है और अंबेडकर को अपना भगवान भी घोषित करता है।
पर ये कैसे समर्थक हैं अंबेडकर के? ये कैसे आराधक है अंबेडकर के? जो ना तो अंबेडकर को कभी अनुशासित होकर पढ़े हैं.. ना ही अंबेडकर की स्थापनाओं को आत्मानुशासन ही बनाया है?
यदि सिर्फ इनको सुने तो आप महसूस करेंगे अंबेडकर नाम के एक इंसान ने दलित इतर जातियों के लिए गालियों की मोटी-मोटी किताबों की रचना की है, और विरासत में वसीयत इनके नाम कर गए हैं। गालियों पर इनका एकाधिकार है।
लेकिन अंबेडकर तो कुछ और ही थे..वो एक दृष्टि थे..गिरोह नहीं. एक संवेदना थे, गाली नहीं। एक मेधा थे, कुंठा नहीं।
यही वजह है कि आज अंबेडकर के लिखे और किए पर सुरक्षा कवच से बाहर निकल यह गिरोह शेष समाज के साथ सीधा संवाद करने को राजी नहीं हैं.. भाग रहे हैं, इस गली से उस गली..सच, कबीर साहेब को तो एक ही "भग्गूदास" मिला था, जिसने उनके बीजक को सांप्रादिक तौर पर भ्रष्ट कर डाला,.और यहां तो अंबेडकर का ग्लोसाइन लगाकर तो तमाम "भग्गूदास" खड़े हो गए हैं...अंबेडकर को भ्रष्ट करने वास्ते।
इन भग्गूदासों के बूते क्या समतामूलक समाज संभव है कभी ? सामाजिक न्याय के सच्चे योद्धाओं को ठहर कर सोचना ही होगा..आत्ममंथन करना ही होगा.. मैं गालियां सुनने को तैयार हूं।
शुभप्रभात - सुमंत भट्टाचार्य
- Sumant Bhattacharya Muchchhu Anupam आपको यह कमजोरी लगती है,मुझे तो ताकत लगती है। जहां एक इंसान भी ईश्वर बन सकता है। शंकराचार्य ने कहा कि साईं मुसलमान थे.यह किस धर्म व्यवस्था में संभव है कि जहां एक विजातीय फकीर को ईश्वर के रूप में स्वीकार कर लिया जाए? कहां यह संभव है कि उसे चर्च या मसजिद में जगह दे दी जाए...?यानि यह वह मुल्क है, जहां यदि "नैतिकता" और "त्याग" के "उच्च आदर्श" स्थापित करे तो एक "साधारण मानव" भी "ईश्वर" बना कर पूजा जाएगा....दुनिया में स्थापित किसी भी दूसरे धर्म में ऐसा यदि कहीं कोई "दूसरा उदाहरण" हो तो जरूर दें Muchchhu Anupam भाई,,,कैसा बौद्धिक व्यभिचार है, जहां हर कदम कदम पर संतो-सूफियों को ईश्वर की वाणी का इहलाम हुआ हो..उसे आज भ्रष्ट कहा जा रहा है। यह धतकरम तो भीतर से फरकापरस्त इंसा नहीं कर सकता है भाई..
- Sumant Bhattacharya Muchchhu Anupam तो फिर क्या गलत है जब जेएनयू में जारी महिषासुर मगिमामंडन और दुर्गा मंडन के दौरान गालियों के बदले गालियां मिलती हैं..तो फिर नागरिक समाज से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हिफाजत की याचना क्यों भला........जिस स्तर, जिस भाषा में विमर्श होगा,उस स्तर पर, उस भाषा में जवाब देने वाले तो समाज के हर गिरोह में मौजूद हैं,.फिर हमारे आपके बीच संवाद की क्या सार्थकता...See Translation
- Sumant Bhattacharya Muchchhu Anupam आप निसंकोच होकर विमर्श करें...मैं कभी नहीं सोचता कि यह मेरी वॉल है या उसकी वॉल है। बस हम सभी भाषा की शालीनता बनाए रखे..इत्ती सी गुजारिश रहती है मेरी...
- संजय कोटियाल मुच्छु जी ये तो और अच्छि बात है । सुमंत भाई लोकतांत्रिक तरीके से मौक़ा देते हैं बात का । असहमति का कारण मुझे लगता है भारतीय जनमत की लेस इन्फो । जिस पर आधारित अलग अलग नुस्खे । पर तब भी डीप में अनजाने वो संस्कार जो साहस भी दे देते हैं । पर साहस की रेंज कम और मेनिपुलेशन की ज्यादा है । ऐसा मुझे लगता है
- संजय कोटियाल मुच्छु जी । असहमत होने का कारण था पहले आदर्श को जाने तो ? जब जानेंगे तभी तो मानने न मानने का प्रश्न होगा । ये मेरा मंतव्य आगे के कमेन्ट में लेस इन्फो के रूप में लिखा गया है ।
- संजय कोटियाल Sumant भाई शानदार पोस्ट है । हमेशा कि तरह अध्यात्म और सामाजिकता में फंस जाता हूँ । आज गुड नाईट । ॐS
- Sumant Bhattacharya Muchchhu Anupam सबसे बड़ी दिक्कत यही आ रही है, सामाजिक न्याय के चिंतकों के सामने। यदि वो विस्तार देते हैं, यदि वो तथ्यों पर जाते हैं तो बनी सामाजिक गोलबंदी टूटती है...और यह खतरा सामाजिक न्याय के भ्रष्ट चिंतकों को व्यापक विमर्श से भागने के लिए मजबूर कर ..
- Shailendra Pratap Singh भग्गूदास की चोरी की प्रसंग रोचक । राजनीति में तो जिधर देखो भग्गूदास
- Sanjay Pandey Bhaiya 100% satya vachan......ambedakar kisi panth ka nahi tha....Wo to pure dekh ka ka tha ....par ye log use ek panth ka margdarshak bana kar usaki watsap lagaya diye......jo kabir jiwan bhar pooja ka virodh kiya uske manage wale Paisa chauka aarati karate hai ki...kabir dekhe to fir se mar jaye.....
- Sarita Jain Singhai कबीरा खड़ा बाजार में मागेँ सबकी खैर
न काहू से दोस्ती न काहू से बैर .।
भग्गू दासों ने ही देश और धर्म दोनों को ही बरबाद कर रखा है ..... - Shashi Bhushan Singh भग्गूदास के लेटेस्ट एडिसन हैं #उदितराज
- Shatrunjay Singh भागू दास जैसे लोगो का लंबा इतिहास है। ऐसे लोग अपने आपको किसी महापुरुष का वारिस बना लेते है फिर उनके विचारो को अपनी सुविधानुसार तोड़मरोड़कर अलग आकार देते है।उसके बाद पालिशयुक्त कर नये नये उत्पाद बनाकर अपनी दुकान मे सजाकर मार्केटिँग मे लगे हुए है।अब इन्ही उत्पादो को बेचकर कोई चिन्तक तो कोई राजनेता बनने का सुख भोग रहे है।ऐसे लोगो के खिलाफ पेटेँट चोरी का मामला बनता है:D
- Shalini Khattar Mehta Isiliye to aaj tak smay kulbula rahaa hai
badlaav ki saarthkataa dhans jaati hai jaise hi aandolan charam par pahunchta hai .. - Shatrunjay Singh दादा आपकी पोस्ट से इतर एक जिज्ञासा है मन मे,सोचा शांत कर लुं ।क्या आप जैसे स्थापित पत्रकारो व लेखको के बीच कोई गुप्त सन्धि है कि कोई भी एक दुसे की वाल पर जाकर टिप्पणी नही करेगा। सभी लोग अपनी अपनी बख्तरबंद वाल मे छुपे रहते है जहां एक जैसी ध्वनि सुनाई दे..
- Sumant Bhattacharya Shatrunjay Singh मेरी टिप्पणी आपको सभी की वॉल पर मिलेंगी, जो मेरे दोस्तों की सूची में हैं। मैं जाता हूं, कुछ सवाल भी उठाता हूं, जब जवाब नहीं मिलता तो मायूस होकर वापस आ जाता हूं। हां, थोड़ा पत्रकारिता के अदब का ख्याल रखना पड़ता है, कुछ लोग उम्र में काफी..
- Anugunja Sinha चिराग तले अंधेरा,वाली बात अक्सर मुझे सोचने पर मजबूर करती है।सुमंत सर की बात केवल गुरू-शिष्य पर ही लागू नहीं होती है बल्कि ये पिता-पुत्र,माता-पुत्री पर भी लागू होती है।बहुत से महान इंसान की औलाद भ्रष्ट और घटीया होती है जो अपनी हरकतो से अपने माँ-बाप के नाम पर बदनामी का मुहर लगाती रहती है।ऐसी औलाद खुद तो इज्जत कमा नहीं पाती पर अपने माता-पिता के बरसो से कमाई इज्जत को तार-तार कर देती है
- Bharti Subedi Rawat agree ,sumant the reason behind the politicization of caste is only al l these hypocritical follower of AAMNBEDKAR only used his name for political gains not for the emancipation of dalits i always say they are the best example of fake leadership of...
- Alpana Mohini Nayak Katai nahee ! Samtamoolak samaaj nirmaan ki baat to chodiye is tarah to ye samaaj ki mukhya dhaara se hi katte jaa rahe hain...
- Jitendra Tiwari Me aap logo jaisa gyani to nahi lekin ek bat avashya mahshoos hoti me dunia ka sabse kroor dhongi or anya ka raschoosak prani hu qki me brahmad hu or uper se purush ye WO hi bat huyi na ki ek to karela uper se neem chada??
- Mahima Shree
भारतीय समाज की यही तो त्रासदी है .. जब भी कोई युगदृष्टा आता है चालाक लोग उनके अनुयायी बन उनके विचारों और कार्यों की ऐसी तैसी कर मलाई उड़ाते हैं और बदले में मूर्ति बैठाकर हर साल मालार्पण कर भोले जनमानस को भुलावे में रखते हैं - नीलम महाजन भग्गुदास ... जित खोजा , तित पाया , हर स्थान , काल और पल मिल जायेंगे ।
एक नहीं इतने हैं कि भग्गुदासों में से उन्हें खोजना पड़ता है जो नहीं हैं frown emoticon
मेरे पास भी हैं बहुत से .. - Vinod Singhi जहाँ जहाँ समूह आया वहां वहां ऐसे उपद्रव हुए smile emoticon .विचारधाराएँ और चिंतन हमेशा वैयक्तिक स्तर पर फलते हैं ऐसा मेरा मानना है.
- Rupa Banka Bilkul sahi sumantji..
- Tribhuwan Singh दादा आंबेडकर वादियों ने ,,अम्बेडकर को नहीं पढ़ा ,,ये तो कहना मुश्किल है ,/ लेकिन ये बात पक्की है कि उन्होंने आंबेडकर से उतना ही लिया जितना ,उनके राजनैतिक जरूरतों को ,,उनके स्वार्थ को सिद्ध करने में सहायक है /
- Tribhuwan Singh Sanjay Kotiyal जी आप कि बात सच हैं कि मेरे पूर्वजों ने ,आपके पूर्वजों को मार ,तो आप कि आने वाली वंशजें ,मेरे आने वाली वंशजों को सताएंगी /
ये तर्क और फलसफा के पीछे एक theology है / देखिये किसी भी हकीकत के पीछे कोई न कोई ..सिद्धांत और फलसफा होता है / क्या आप बता सकते हैं कि १९६० तक अमेरिका में ब्लैक्स को whites को बराबर का अधिकार नहीं मिला तो क्यों ??
Sumant Bhattacharya ji दूसरी दिक्कत ये भी हो सकती है कि डॉ अम्बेकर ने जो sientific चीजे लिखी अपनी पुस्तको में वो इन दलित चिन्तको के सर के ऊपर से गुजर गयी हो
तीसरी सभावना ये है की ,वो इनके किसी काम की न हो ।- Sumant Bhattacharya अभिव्यक्ति पर्यालोचन किसने कहा कि शोध नहीं हुआ..क्या कबीर पर हुए सारे शोध आपकी दृष्टि से गुजर चुके हैं....
- Sumant Bhattacharya अभिव्यक्ति पर्यालोचन भाई,आप तो बहुत उच्च स्तर पर गरज गए...कबीर समाज से आपका साबका कहां पड़ा है..क्या अनुभव साझा करेंगे...
- Tribhuwan Singh अब देखिये भाषा की समस्या ।
मैं देहाती अवधी भाषी ।
हिंदी मेरी मात्रिभाषा ।
लेकिन मैं ही फंस गया ।
लेकिन maxmuller, john Muir , M A Shering , संस्कृत के विद्वान निकल गए ।
लगता है मैं ही मंद बुद्दि हूँ । - Tribhuwan Singh दादा आंबेडकर जी पहले व्यक्ति हैं जो इस बात को 1946 में नकार देते हैं ,कि आर्य यानि संस्कृत बोलने वाले लोग , बाहर से नहीं आये थे, भारत के मूलनिवासी थे । फिर कौटिल्य और महाभारत को उद्दृत करते हुए कहते हें कि शूद्र आर्य है यानि संस्कृत भाषी है । एक सामान..
- Tribhuwan Singh तो किस विद्वान ने कहा कि आर्य बाहर से आये ??
मक्स्मुल्लेर ने ?? या जॉन मुइर ने या पादरी शेरिंग ने ??
कब आये ?? प्रागैतिहासिक काल में ??
यानी मिथकों (महाभारत और रामायण काल) के पहले ??
अच्छी गुंडई फैलाये हैं , मिथक भी कह रहे हो , और उसी को आधार बना कर ड्रामा भी रचा जा रहा है ।
भाई एक दिशा में चलो न ??
ये अंग्रेज तो आपका उद्धार ही करने आये थे , आप के पुरखो को तारने के लिए , आर्य द्रविड़ सवर्ण अवर्ण असवर्ण शूद्र अति शूद्र दलित शब्द गढ़े ।
अगर ये वैदिक काल से है तो ये शब्द भी वेदों में मिलने चाहिए ??
दिखिए किस वेद में लिखा है ??
शब्दों का अपना एक इतिहास होता है ।
25 - 30 साल पहले की कोई डिक्शनरी उठा लीजिये, और खोजिये scam शब्द ??और अगर मिल जाय तो बताइएगा ।
जब नेहरु के जमाने से लेकर इंदिरा के जमाने तक जितने सरकारी चोरों का स्तर गिरा हुवा था तो घोटाला शब्द से काम चल जाता था । लेकिन जब मनमोहन के जमाने में उच्च कोटि के सरकारी डकैत आ गए , तो scam यानि महाघोटाला जैसा शब्द गढा गया ।
लेकिन न तथ्यों से मानेगे और न तर्कों से मानेगे ,इन्हें महिसासुर की ही पूजा करनी है , तो मुझे लगता है कि दिमाग में कुछ केमिकल लोचा है । - Tribhuwan Singh अब एक प्रश्न उठता है कि आंबेडकर साहब ने रिगवेद को ही क्यों आधार बनाया , अपने बात को सिद्ध करने के लिए ??
और नारदस्मृति और आरण्यक ब्रम्हंस जैसे अर्चिएक पुस्तको के आधार पर ही क्यों अपने निष्कर्षो पर पहुंचे ??
इसके दो उत्तर है ;
(1) एक ख़ास किस्म की एक कौम पैदा हुयी जो संस्कृत के पुराने ग्रंथो के अध्यन में ही रूचि थी जिनको orientalist phillologist indologist जैसे कौम के नाम से जानी जाती है ।उन्होंने भारत के तात्कालिक स्थिति का वर्णन न करके सिर्फ एक अनदेखे समयकाल के ग्रंथो के आधार पर तात्कालिक भारत पर चपका दिया। एक मिथ फैलाया गया की भारतीयों के पास इतिहास लिखने की कूबत नहीं होती ।इसलिए इतिहास को अपने हिसाब से लिख दिया । ये मिथ भी फैलाया कि वे बिजेता थे । इसलिए उनका शासन जस्टीफ़ाइड था । वही तात्कालिक राजनैतिक और सामाजिक परिस्थियों पर सन्नाटा पसरा पड़ा है ।"Castes of Mind " By Nicholas B. dirk
ऐसी स्थिति में डॉ आंबेडकर ने जब 1925 के आसपास जब भारतीय राजनीति में कदम रखा तो उनके पास 175 साल पूर्व के भारतीय समाज को समझने का कोई साधन या इनफार्मेशन उपलब्ध नहीं था ।
इसलिए घूमफिर कर उनको वेदेशी संस्क्रितज्ञो की शरण में जाना पड़ा।
ये संस्क्रितज्ञ इतने ज्यादा संख्या में थे की आप कल्पना नहीं कर सकते । मात्र जर्मनी ने अकेले दम पर 132 इन्दोलोगिस्ट पैदा किया । - Pavan Ambedkar मै आप लोगोँ की तरह ज्ञानी महापुरुष तो नही हूँ,, लेकिन मैँ आप लोगो को अपने मन की बात बताना चाहता हूँ।
मैँ आप लोगो की बात से सहमत हूँ के आज हिन्दुस्तान मेँ बदलाव का दौर आ गया है, लेकिन आज भी हम दलितो के साथ सवर्ण वर्ग ऐसा व्यवहार करता है जैसा कि हम इं... - Satya Narain Mishra 'ये संस्क्रितज्ञ इतने ज्यादा संख्या में थे की आप कल्पना नहीं कर सकते । मात्र जर्मनी ने अकेले दम पर 132 इन्दोलोगिस्ट पैदा किया ।' like emoticon
- Pavan Ambedkar ab aap samaj skte hai ki jab ek vyakti jo pure rajya ka mukhiya hai.....uske sath aisa vyabhar hota h to aam dalit kya chiz h.
aap log educated log h,, mai abi graduate tk ni hu......aap log btaye hm kya isi vyabhar ke layak h.
aur TRIBHUVAN JI aap mere pita saman h,, kripya muje ji kahkr sambodhit n kreS - Tribhuwan Singh दूसरा कारण है ,,कि डॉ आंबेडकर हिंदूइस्म के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे , और चूंकि सूचना के श्रोत सारे के सारे , ईसाईयो के द्वारा भारत के ऊपर तथाकधित संस्कृत विद्वानों के द्वारा लिखी हुई पुस्तकें थी / च्रिस्तिअनों ने जब पूरी दुनिया पर कब्ज़ा किया , तो..
- Tribhuwan Singh Pavan Ambedkar @क्या कभी आप हिन्दुओं के सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व महाकुम्भ में गए हैं ,अभी दो अल पहले यह संगम नगरी में हुएवा था / इतनी जगह ,इतने हिन्दू संतों से मैं मिला ...यहाँ तक कि नागा साधुओं से ,,किसी ने ये नहीं पूंछा कि मेरी जाती क्या है ..बस एक ही वाक्य सर्वत्र ---आओजी , बैठो जी ,चाय पियो जी /
दूसरा कभी लगता है आप कभी किसी पवित्र बड़े मंदिर में भी नहीं गए हैं / मैं एक साल पहले मथुरा गया था ,,वहीँ भी किसी ने नहीं पूछा / आप क्या सींग लगाकर जाते हैं क्या कि लोग आप को दूर से पहचान कर ये काम करते है /
और सवर्ण avarn और असवर्ण का मिथ भी तोड़ूंगा / भागिएगा नहीं मैदान छोड़कर / - Tribhuwan Singh डॉ आंबेडकर शूद्र की उत्पत्ति का कारण खोजने के लिए फिर संस्कृत विद जॉन मुइर के पुस्तक "the ऑरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट " के पुस्तकांश का रिफरेन्स देते हैं / जो १९ साल की उम्र में भारत आया था , और २९ साल की उम्र में "मत्परीक्षा " नाम की पुस्तक लिखता है , जिसमें ईसाइयत को हिंदूइस्म से श्रेष्ठ घोषित करता है, जो त और ट के उच्चारण का फर्क नहीं समझता , जिसने दस साल की उम्र में निष्ठापूर्वक सरकारी नौकरी करते हुए ,समस्त संस्कृत ग्रंथो ,वेद उपनिषद् ,आरण्यक ब्राम्हण ,रामायण हैभारत और न जाने ग्रंथों , को उदरस्थ कर लिया था / और इस लायक हो चूका था कि "the ऑरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट " जैसी अप्रितम रचना लिख मारी थी /उसकी पुस्तक के पुस्तकांश में Satyayana ब्रह्मण के हवाले से , वशिष्ठ और विश्वामित्र (सुदास राजा ) कई वंशो कि दुश्मनी का आधार बनाया है / इस तथ्य कि भी पड़ताल होना आवश्यक है / कि डॉ आंबेडकर जैसा विद्वान , जो उस समय काल में जितने राजनीतिज्ञ थे ,सबसे अधिक शिक्षित थे , कैसे एक bigot ईसाई के जाल में फंस गए , संस्कृत भाषा की अज्ञानता के कारण /
- Tribhuwan Singh कुछ लोग आहत हैं कि उनकी नफ़रत की राजनीति का आधार खिसकता दिख रहा है /
कुछ चिंतित हैं कि धर्म परिवर्तन का बेस गायब हो रहा है / अगर शूद्र सम्बोधन उतना ही सम्मानीय था जितना कि बाकी वर्ण ,,तो समाज का एक बहुत बड़ा तबका ..एक गर्व से सम्मानित महसूस कर रहा है / उसके मस्तिस्क में भरे गए विष की ग्रंथि ,,अचानक से फुट जा रही है ,,और वो राहत की साँस ले रहा है, जिस घुटन का अहसास पता न जाने कितने सालो से , वो महसूस कर रहा था , उससे निजात मिलता दिख रहा है / - Surendra Solanki मूल निवासी कांसेप्ट। तथाकथित दलित और पिछड़ा वर्ग को ले कर बनाया गया एक कहानियो में खुद को खोजने का प्रयास है।
इसकी ताकत है श्रम जीवी वर्ग में व्याप्त रोष। और उसी की भावना को भड़काने से इसे तृप्ती मिलती है।
इसका निर्बलता। संस्कृत भाषा की अज्ञानता ओर आध्यात्मिक सत्ता की जगह सामाजिक सत्ता का मोह। और सामाजिक सत्ता परिवर्तन को उद्देश् मान कर कार्य करना।
ये बहुत ज्यादा प्रभावशाली है। क्यों की जो लोग शुद्र शब्द से आज भी जुड़े। और मानसिक शब्दों के गुलाम हैं । वे इससे बच पाना मुश्किल है। - Surendra Solanki आंबेडकर के भक्त।
अम्बे कम समझ पाये। डर कर अधिक रहे।
और इसी डर की वजह से आंबेडकर को अंध भक्त की तरह पुजते। भाई क्यों नही बनते आंबेडकर जेसे।
मूल निवासी क्यों बनना चाहते?? - Tribhuwan Singh कुछ लोग आहत हैं कि उनकी नफ़रत की राजनीति का आधार खिसकता दिख रहा है /
- Surendra Solanki आपने जिसे अपनी बात की बाकई वह गोरवान्वित महसूस करेगा। और होना भा यही चाहिए।
लेकिन केवल लिस्ट में रहने वाले व्यक्ति ही शुद्र हें। यह मिथक कैसे दूर होगा।
तथाकथित सवर्ण में बहुत से महा शुद्र(केवल मानसिक अवस्था में मौजूद हैं) उन्हें कैसे विश्वास दिलाओगे । - Tribhuwan Singh लेकिन जो राजनीति की दूकान चला रहे है , नफरत की फसल उगाकर , वो आटंकित हैं।
- Surendra Solanki दलित राजनीती एक विचार पर चल रही है और उसी को दिन रात ठोकती पीटती है।
ब्राह्मण को कोसना।
अस्पर्शता के लिए ब्राह्मण या किसी भी समाज को कोसना मुझे जायज लगता है।
लेकिन समस्या हम सब की हे।
राजनीती केवल दलित को मानसिक स्तर पर इस्तेमाल कर रही है। और यही मुझे कभी समझ नही आया।S - Suhanand Bagale Babasaheb's thoughts well reflect themselves in Indian constitution. And that is the reason why we have the largest and world wide respected constitution.
- Suhanand Bagale Caste in India means an artificial chopping off of the population into fixed and definite units, each one prevented from fusing into another through the custom of endogamy.
-- Dr. Babasaheb Ambedka
संजय कोटियाल 2014
में कैसे कोई सोचे कि बेटे या बाप का किया अपराध का सजा बाप या बेटे को
मिले ??? क्या कोई उत्तरदाई हो सकता है इस समय में ??? मैं मेरे बेटे या
बाप के करतूत का उत्तरदायी कतई नहीं हो सकता । और जो अच्छा है वो अच्छा है ।
कहीं वो न भस्म हो जाएSee
अभिव्यक्ति पर्यालोचन कबीर
का बीजक भगवान दास ने चुराया --यह जनश्रुति है। कहीं पर भी अभी तक शोध यह
निश्चित नहीं कर पाया है। चोरी मानवीय आदत हे। नेता प्रतीक चुराते हैं।
धर्माधिकारी शास्त्र। कबीर को भी तो कबीर पंथियों ने चुराया हुआ है। कबीर
चौरे हैं ,मठ हैं परन्तु इनमें कबीर क..
Tribhuwan Singh दादा थोडा कठिन शब्द प्रयोग किया आपने । मेरी पहुँच से बाहर । थोडा विस्तार दें ।
Tribhuwan Singh Pavan Ambedkar ji , मैं आपकी बात से 200 % सहमत हूँ ।
Tribhuwan Singh अगर
आप वर्तमान को , एक ऐसे प्रागैतिहासिक पुस्तकों में वर्णित कुछ श्लोकों के
आधार पर वर्णित करना चाहेंगे, और उस को किसी और रिलिजन के फ्रेमवर्क में
फिट करेंगे , जिसमे वो फिट ही नहीं बैठ सकता , तो आप हमेशा दिग्भ्रमित
होंगे, सनातन काल तक की दुश्मनी अब्रह्मिक monotheism की फलसफा है, जो आज भी जारी है ,यहूद ,इस्लाम और ईसाई के अनुयायियों में /
हिन्दू धर्म के ऐतिहासिक परंपरा में ,perpetual enmity का , हारने वालों को स्लेव बनाने का , उनका क़त्ल करने का कोई जिक्र तक नहीं है / राम ने रावण को हराया तो , राज्य विभीषण के हवाले कर, वापस अयोध्या आ गए / कृष्ण ने जब जरासंध की हत्या करवाई भीम के हांथों ,तो उसके पुत्र को राज पात सौप दिया/ युधिस्ठिर ने जब चक्रवर्ती राजा बनने के लिए , जब राजसूय यज्ञ कराया , तो सारे अधीन राजाओं से कर लेकर ,उनको अभयदान दिया /
लेकिन ये तो हैं मिथक , लेकिन पृथ्वीराज ने मुहम्मद गोरी को १६ बार हराया ,लेकिन हर बार उसने माफी मांग ली , और उन्होंने उसको माफ़ कर दिया /
अगर ईसाई Bigot जॉन मुइर , जैसे संस्कृतज्ञ इंडोलॉजिस्ट , की पुजस्तक थे "ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट " , को क्वोट करते हुए , डॉ आंबेडकर ने जब वशिष्ठ और विश्वामित्र , तथा सुदास के वंशजों के बीच perpetual enmity का आधार बनाकर , शूद्रों की उत्पत्ति की परिकल्पना की , तो उन्हें ,मालूम नहीं था , की अगर ऐसे कोई दुश्मनी थे भी तो , सतयुग के ४००० साल बाद त्रेता आते -आते दोनों में , सुलह हो गयी थी / क्योंकि जब राजा दशरथ से विश्वामित्र जी राम लक्ष्मण को अपने यज्ञ की रक्षा करने के लिए माँगते हैं , तो दशरथ जी नहीं देना चाहते थे ,,और कहा चौथे पण में मुझे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी हैं ..इसलिए कैसे इनको आपके साथ भेज दूँ ?? तो गुरु वशिष्ठ ने दसरथ को समझाया -कि राजन आप अपने दोनों पुत्रों को, ऋषि विश्वामित्र के साथ जाने दें , ये राम को राम बना देंगे /
तीसरी बात फिर ४००० द्वापर में महाभारत में पजावन राजा का जिक्र किया है जो राजा सुदास का वंशज है /
तो दो प्रशन उठते हैं कि न तो संस्कृतज्ञ जॉन मुइर को सनातन धर्म के कालचक्र , यानी सतयुग -कलयुग - द्वापर त्रेता ,,के टीमें लाइन का पता था , और न डॉ आंबेडकर को / इसीलिये कब हुयी ये दुश्मनी ?? कब हुयी ये लड़ाई ??
इसीलिये , इसका अर्थ है ,यर एक Bigot ईसाई की शाजिश थी ,या अज्ञानता थी ,जिसके जाल में डॉ आंबेडकर जी , उस आधारहीन नतीजे पर पहुंचे ??
लेकिन मेरा मत है किये एक Bigot ईसाई अधिकारी की ये भारत के समाज को बांटने की शाजिश थी , जिसमे वो कामयाब रहा /
कैसे ?? आगे लिखूंगा /
हिन्दू धर्म के ऐतिहासिक परंपरा में ,perpetual enmity का , हारने वालों को स्लेव बनाने का , उनका क़त्ल करने का कोई जिक्र तक नहीं है / राम ने रावण को हराया तो , राज्य विभीषण के हवाले कर, वापस अयोध्या आ गए / कृष्ण ने जब जरासंध की हत्या करवाई भीम के हांथों ,तो उसके पुत्र को राज पात सौप दिया/ युधिस्ठिर ने जब चक्रवर्ती राजा बनने के लिए , जब राजसूय यज्ञ कराया , तो सारे अधीन राजाओं से कर लेकर ,उनको अभयदान दिया /
लेकिन ये तो हैं मिथक , लेकिन पृथ्वीराज ने मुहम्मद गोरी को १६ बार हराया ,लेकिन हर बार उसने माफी मांग ली , और उन्होंने उसको माफ़ कर दिया /
अगर ईसाई Bigot जॉन मुइर , जैसे संस्कृतज्ञ इंडोलॉजिस्ट , की पुजस्तक थे "ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट " , को क्वोट करते हुए , डॉ आंबेडकर ने जब वशिष्ठ और विश्वामित्र , तथा सुदास के वंशजों के बीच perpetual enmity का आधार बनाकर , शूद्रों की उत्पत्ति की परिकल्पना की , तो उन्हें ,मालूम नहीं था , की अगर ऐसे कोई दुश्मनी थे भी तो , सतयुग के ४००० साल बाद त्रेता आते -आते दोनों में , सुलह हो गयी थी / क्योंकि जब राजा दशरथ से विश्वामित्र जी राम लक्ष्मण को अपने यज्ञ की रक्षा करने के लिए माँगते हैं , तो दशरथ जी नहीं देना चाहते थे ,,और कहा चौथे पण में मुझे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी हैं ..इसलिए कैसे इनको आपके साथ भेज दूँ ?? तो गुरु वशिष्ठ ने दसरथ को समझाया -कि राजन आप अपने दोनों पुत्रों को, ऋषि विश्वामित्र के साथ जाने दें , ये राम को राम बना देंगे /
तीसरी बात फिर ४००० द्वापर में महाभारत में पजावन राजा का जिक्र किया है जो राजा सुदास का वंशज है /
तो दो प्रशन उठते हैं कि न तो संस्कृतज्ञ जॉन मुइर को सनातन धर्म के कालचक्र , यानी सतयुग -कलयुग - द्वापर त्रेता ,,के टीमें लाइन का पता था , और न डॉ आंबेडकर को / इसीलिये कब हुयी ये दुश्मनी ?? कब हुयी ये लड़ाई ??
इसीलिये , इसका अर्थ है ,यर एक Bigot ईसाई की शाजिश थी ,या अज्ञानता थी ,जिसके जाल में डॉ आंबेडकर जी , उस आधारहीन नतीजे पर पहुंचे ??
लेकिन मेरा मत है किये एक Bigot ईसाई अधिकारी की ये भारत के समाज को बांटने की शाजिश थी , जिसमे वो कामयाब रहा /
कैसे ?? आगे लिखूंगा /
Tribhuwan Singh कुछ चिंतित हैं कि धर्म परिवर्तन का बेस गायब हो रहा है / अगर शूद्र सम्बोधन
उतना ही सम्मानीय था जितना कि बाकी वर्ण ,,तो समाज का एक बहुत बड़ा तबका
..एक गर्व से सम्मानित महसूस कर रहा है / उसके
मस्तिस्क में भरे गए विष की ग्रंथि ,,अचानक से फुट जा रही है ,,और वो राहत
की साँस ले रहा है, जिस घुटन का अहसास पता न जाने कितने सालो से , वो
महसूस कर रहा था , उससे निजात मिलता दिख रहा है /
उतना ही सम्मानीय था जितना कि बाकी वर्ण ,,तो समाज का एक बहुत बड़ा तबका
..एक गर्व से सम्मानित महसूस कर रहा है / उसके
मस्तिस्क में भरे गए विष की ग्रंथि ,,अचानक से फुट जा रही है ,,और वो राहत
की साँस ले रहा है, जिस घुटन का अहसास पता न जाने कितने सालो से , वो
महसूस कर रहा था , उससे निजात मिलता दिख रहा है /
Suhanand Bagale koi
hai jo cast system ko khatam karne ke liye tayar hai ? ya fir apne apne
cast ko shreshth sabit karne ke liye hi prayatna kiya ja raha hai? Jara
socho Babasaheb ne dharmantar kyu kiya?Dharmantar karnekeliye itane sal
kyu lagaye? Dr.babasaheb ko jana..

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