- Tribhuwan Singh अब आप वापस इकनोमिक हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया , के timeline पर जाइए , और गोवा के इतिहास पे ध्यान दें ये आदेश १६०० के आसपास का होगा , और इन ब्राम्हण और शूद्रों को वहां से विस्थापित हुए , १५० से २०० साल हुवा होगा / दोनों अब ट्रेड यानि व्यापार करते हैं ,, और १८०७ में जब बुचनन ---धनि (Rich Bramhans and Shoodras ) ब्राहण और शूद्र ----- शब्द का प्रयोग करते हैं , तो ये समझना चाहिए कि १७५० में भारत , विश्व का २५ % GDP का हिस्सेदार था , और इंग्लॅण्ड और अमेरिका मिलकर मात्र २% के / अभी ५० साल में भारतीय घरेलू उद्योगों को बहुत छति नहीं पहुंची है , लेकिन १९०० आते आते भारत मात्र २% क शेयर होल्डर , बचेगा , और ७००% लोग बेरोजगार हो चुके होंगे / अभी तक धर्म परिवर्तन कि मुहीम भी नहीं चली है , अभी आंबेडकर और पेरियार को १२५ साल से ऊपर लगने वाला है , भारतीय राजनीती में चरण रखने में / और इसीलिये अभी ब्रामण --धूर्त ,दुस्ट ,घमंडी और खड़यन्त्रकारी नहीं हुवा है ,, और शूद्र / दलित अभी दरिद्र , बेरोजगार और बेघर भी नहीं हुवा है / इसीलिये ---धनी ब्राम्हण और शूद्र
- Sumant Bhattacharya Tribhuwan Singh भाई,कई सारे तथ्य आपस में जुड़ से गए हैं। गोवा से निकलने वाले कहां गए और क्या कहलाए..मौजूदा समाज में उनकी शिनाख्त कैसे करें..क्या बदलाव आया.. तथ्यों के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ें आप तो हम सब मित्र कहीं ज्यादा समझ सकेंगे। सादरSee Translation
- Tribhuwan Singh मैंने बीच में ऊपर लिखा है कि बाइबिल के Genesis यानि ब्रम्हांड के निर्माण के सन्दर्भ में व्याख्यायित सिद्धांत के अनुसार महाप्रलय के बाद जब Noah ने आर्क ऑफ़ Noah में दुनिया के सारे जीवन के एक जोड़े को अपनी नाव में भरकर , दुनिया का पुनर्संरचना की / उनके ३ पुत्र जेफेथ ,शेम और हैम थे / गॉड ने महाप्रलय के बाद जब Noah को कहा कि कुछ खेती बाड़ी करो तो नूह ने अंगूर कि खेती कि , और उसकी शराब बनाई , और उसका सेवन किया / ज्यादा सेवन कि वजह से मदहोश हो गए तो कपड़ा लत्ता उनका उत्तर गया , और वे नंगे हो गए / उनके दो पुत्रों जेफेथ और ,शेम ने उनको वापस तम्बू में ले जाकर सुलाया ,,लेकिन तीसरे पुत्र हैम को को उनकी इस दशा पर हंसी आ गयी / Noah ने सुबह इस घटना कि जानकारी होने पर इसी कारन , हैम और उसकी संततियो को , बाकी दोनों पुत्रों की संततियों की गुलामी (perpetual servitude ) में रहने का श्राप दिया / बाद में जब चौदहवीं शताब्दी में europeans ने पूरी दुनिया पर कब्ज़ा किया तो ईसाई धर्मगुरुओं ने जेनेसिस की इस कथा को उस समय पूरी दुनिया में बाइबिल के फ्रेमवर्क के हिसाब से Noah के तीनों संततियों को ,टावर ऑफ़ bable की कथा के अनुसार तीन हिस्सों में बांटा / ईसाई धर्मगुरुओं ने नूह के श्राप के अनुसार ,संसार के जो लोग भूरे या काले लोग थे ,,,,उनको हैम की संतति करार दिया / और उनके चमड़ी के रंग के कारन भारत अफ्रीका आदि देशों के निवासियों को hamites यानि हैम की संतति बताते हुए उनकी गुलामी को जायज ठहराया /
अब जब १९०० के आसपास भारत की जीडीपी, जो की १७५० में विश्व जीडीपी का २५ % थी ,घटकर मात्र २% बचेगी ,और ७०० % टेचनोक्रट्स और तथाकथित शूद्र/दलित बेघर और बरोजगार हो जाएंगे ,और ईसाई धर्मगुरु और यूरोपीय विद्वान भारत के धर्मग्रंथों को ईसाइयत के फ्रेम वर्क के खांचे में फिट करेंगे ,तो देश के लगभग ८० % बेरोजगार और बेघर हुए लोगों को ,शूद्र / द्रविड़ / अछूत /दलित आदि , तथा इनको मूल भारतीय सिद्ध करेंगे , तो ईसाइयत के Hamites के कहानी के साथ इनको आर्यों (संस्कृत भाषी ,बहार से आये) बाकी बचे २० % लोगों का गुलाम सिद्ध करेंगे /
और इसका आधार बनाया जाएगा ऋग्वेद के पुरुषसूक्त को , जोकि भारतीय संस्कृत ग्रंथों के अनुसार ब्रम्हांड की संरचना और ब्रम्ह उपासना का एक मन्त्र भर है / और बताया जाएगा कि , चूंकि पुरुषसूक्त के अनुसार शूद्रों कि उत्पत्ति उस विशाल पुरुष , जिसने ब्रम्हांड की संरचना की है , उसके पैरों से हुयी है , इसलिए उसकी हालत १९०० आते आते , ब्रम्हनिस्म के कारण , hamite परिकल्पना के हिसाब से उसे perpetual servitude में रहने को बाध्य है /
मुझे खुशी होगी अगर मित्रगण मेरे इस कथन में कुछ जोड़े , घटाए , या फिर इसको ख़ारिज करेंगे तो / - Tribhuwan Singh अब मैं सुमंत दा का सूत्र धार के चोले को उतार कर , अपना चोला धारण करता हूँ ,,अब मैं सोच नहीं पा रहा हूँ कि कहानी को और पीछे ले जाऊं , और भारत के समाज के बारे में , 15th लेकर 17th शताब्दी के डॉक्युमेंटेड एविडेंस को पेश करूँ, जो पूरी दुनिया से भारत आये भ्रमणकारियो के यात्रा वित्रांत में लिपिबद्ध है , कि आगे ईसाईयों द्वारा रचे और गढ़े गए द्रविड़ और द्रविडं मिथक कि ओर आगे बढ़ाऊं ??
मित्रों क्या कहते हो ?? - Sumant Bhattacharya Tribhuwan Singh भाई, मुझे खुशी हुई कि आप अपनी निजी व्यक्तित्व के साथ अब आए....पता नहीं क्यों अभी तक आपने सूत्रधार का चोला पहन रखा था...यह सामाजिक मंच है और आप अपने व्यक्तित्व और सोच के हिसाब से अपनी बात रखिए.....सादरSee Translation
- Tribhuwan Singh कहानी को पीछे ले जाकर १५थ शताब्दी से १८थ शताब्दी के भारतीय समाज की चरचा , उस समय के भारत आये विदेशियों की पुस्तकों में संकलित है , उससे समझा जा सकता है ,,लेकिन उसको तब उल्लिखित किया जाएगा , जब अछूत प्रथा पर हम चर्चा करेंगे /
इसलिए अब चलते हैं एक आउट मिथकीय खड़यन्त्र की चर्चा करने --जिसको द्रविड़ रेस का जन्म कैसे दिया , क्रिस्चियन पादरियों ने , जो साउथ में ईसाइयत फैलाने में असफल हो रहे थे , जिन्होंने ब्राम्हणवाद और ब्राम्हणों ( हिन्दू ऋषि मुनियों द्वारा लिखे गए शाश्त्रो ) को भारत का सबसे बड़ा दुश्मन साबित किया ,,और आज भी ये क्रम जारी है , चरित्र बदल गए हैं , उनको वामपंथी और दलित चिंतक कहा जाता है आजकल / - Tribhuwan Singh ऊपर लिखे हुए कुछ तथ्यों को दुबारा कॉपी पेस्ट कर रहा हूँ जिससे , कहानी में ले बना रहे और तारतम्य न टूटे / ............................................................................................................................ब्रिटिश अधिकारीयों और धर्म परिवर्तन का एजेंडा वाले क्रिश्चियन पादरिओं के राजनैतिक और ईसाइयत की ,मिलीजुली शाजिश है - द्रविड़ और द्रविड़ियन रेस के उपज की थ्योरी/ "कल्पना की उड़ान" जैसा कि अभी भी वामपंथ और दलित चिंतकों का मुख्य "Modus oparandi " है, जिसके जरिये इतिहास को बिना तथ्य के , अपने अजेंडे को लागू करने का, वही हुवा दक्षिण भारत में /
दो अधिकारी फ्रांसिस व्हीट एलिस और अलेक्सैंडर डी कैम्पवेल ने तेलगु और तमिल भाषाओँ के व्याकरण का अध्ययन किया, और एक नए सिद्धांत कि परिकल्पना रची , कि ये भाषाएँ,अन्य भारतीय भाषाओँ से भिन्न हैं /फिर एक नए अधिकारी B H Houghton ने एक नए शब्द कि रचना की -"तमिलियन ", और एक नयी तथ्यहीन और कपोल कल्पित कहानी को जन्म दिया कि- " ये तमिलियन ही भारत के मूल निवासी थे" / इस तरह एक नयी आधारहीन परिकल्पना ने जन्म लिया/ फ्रांसिस व्हीट एलिस और अलेक्सैंडर डी कैम्पवेल ने तमिल और तेलगू भाषियों को भाषायी, और B H Hondsgon ने नश्लीय / रेसियल भिन्नता के आधार एक अलग नश्ल की परिकल्पना की /
परन्तु इन तेलगु और तमिलभाषी भारतीयों को एक अलग नश्ल / रेस सिद्ध करने के असली खड़यन्त्र, बिशप रोबर्ट कलडवेल (१८१४- ९१) नामक एक पादरी ने की/ जिसने ऊपर वर्णित भाषायी और नश्लीय भिन्नता को आधार बनाकर एक पुस्तक लिखी (लेखन परंपरा / श्रवण परंपरा ) जिसका नाम था -"Comperative Grammer of the Dravidian Race " जो आज भी बहुत पॉपुलर है /बिशप रोबर्ट कलडवेल ने नए विचार का जन्म दिया कि dravidians भारत के मूल निवासी थे , आर्यों के आने के पूर्व / परन्तु -"आर्यों के एजेंट ब्राम्हणों " ने इन भोले भाले द्रविडिअन्स को धूर्ततापूर्व (Cunning ) धर्म के बंधनों में जकड रखा है ,, और जब तक संस्कृत शब्दों को तमिल भाषा से बाहर नहीं निकला जाएगा,,,,ये भोले भाले द्रविड़ लोग अन्धविश्वास से मुक्ति नहीं पायेगे /
(ज्ञातब्व हो की जो नेटिव परम्पराएँ और शाश्त्र ,बाइबिल के फ्रेमवर्क में फिट न हो , उसे क्रिस्चनों ने ने मिथ और अन्धविश्वास की श्रेणी में रखा )
इसलिए कड्वेल जैसे यूरोपीय लोंगो काकर्तव्य है की भोले भाले द्रविडिअन्स को अंध विश्वास से मुक्ति दिला कर उनकी आत्माओ को अवलोकित करें ,,यानि क्रिस्चियन धर्म में शामिल करे /
इस तरह राखी गयी ब्राम्हणवाद और ब्रम्हानिस्म के विरोध और गाली देने की आधार शिला / cunning Bramhans जैसे शब्दों का प्रयोग ,पहली बार क्रिश्चियनिटी को स्थापित करने के लिए हुवा / - Tribhuwan Singh H T COLEBROOKE ने १८०१ में एक लेख लिखा - की सभी भारतीय भाषाएँ संस्कृत से निकली हैं / लेकिन ALAXANDER डी कैम्पबेल और व्हीट एलिस , जो की मद्रास का कलेक्टर था , दोनों ने एक पुस्तक लिखी - "ग्रामर ऑफ़ तेलगू लैंग्वेज " (१८१६) - जिसमे उन्होंने कल्पना और खड़यन्त्रकारी तरीके से ये तथ्य पेश किया कि तमिल और तेलगु की उत्पत्ति संस्कृत से नहीं किसी अन्य भाषा से हुयी है / ये एक क्रांतिकारी और विघटनकारी नया खेल खेल गया , विदेशियों के द्वारा भारतीय समाज को बांटने का /
अब इस तथ्य को बाइबिल के फ्रेमवर्क में फिट करना था ,,तो व्हीट एलिस ने दावा किया कि द्रविड़ियन लैंग्वेजेज (तमिल और तेलगू ) कि उत्पत्ति हिब्रू भाषा से हुयी है /
वो कैसे ??
अब जब विल्लियम जोंस ने कहा कहा कि -संस्कृत नूह के पुत्र हैम कि भाषा है, कुछ और विद्वानों ने कहा कि नहीं -संस्कृत नूह के बड़े पुत्र जेफेथ कि भाषा है , तो बचा कौन नूह का तीसरा पुत्र शेम , इसलिए द्रविड़ियन भाषाओँ की उत्पत्ति शेम के वंशजों से हुयी / पूरे विश्व की आबादी का विभाजन बाइबिल के फ्रेम वर्क में , यहूदी और अरब शेम के वंशज हैं , ये तथ्य पहले से स्थापित कर चुके थे ईसाई धर्मगुरु /
अब देखिये इससे एक तीर से तीन शिकार
(१) इन भाषाओँ को संस्कृत और संस्कृत भाषियों से डिसकनेक्ट --( ईसाइयत फ़ैलाने के लिए मैदान साफ़)
(२) हिब्रू किसकी भाषा है ...ये वो भाषा है जो जीसस क्राइस्ट बोलते थे / ( ईसाइयत से कनेक्ट - ईसाइयत फैलाने का आधार )
(३) अगले १०० सालों में जब भारत की जीडीपी, विश्व जीडीपी की २५ प्रतिशत हिस्सेदारी खोकर , मात्र २ प्रतिशत का शरहोिडर् रह जाएगा , और लगभग ७०० प्रतिशत टेचनोक्रट्स , व्यापारी और अन्य लोग ,जब बेरोजगार और बेघर हो जाएंगे , तो एक वर्ग का उदय होगा जिसको दलित वर्ग कहा जाएगा , , और फिर ईसाइयत को फ़ैलाने का बड़ा मजबूत तबका एक साथ , इन पादरियों को उपलब्ध होगा / facts have been taken from a book -Breaking India by Rajiv Malhotra . - Tribhuwan Singh Shishir Yadav ;; thanks ,,but till then read my blogs and share them with your freinds to make aware of distoted facts
- Tribhuwan Singh दक्षिण भारत में संस्कृत और हिंदी विरोध का बैकगॉउन्ड की स्थापना .......................................................................................................... ......... अब एक स्कॉटिश पादरी जॉन stevension ने ये कहा कि दक्षिण भारत कि मूल भाषाए संस्कृत से पुरानी हैं / फिर दो पादरी आये एक का नाम है बिशप Caldwell , और दूसरे G U पोप जिनकी मूर्तिया आज मद्रास के मरीना बीच पर आज ईसाइयत का परचा लहरा रहीं है /
बिशप Caldwell पहले लिखा "कम्पेरेटिव ग्रामर ऑफ द्रविड़ियन लैंग्वेजेज" जिसमें ये घोषित किया कि संस्कृत नहीं बल्कि हिब्रू दखिस्न भारतीय भाषाओँ कि जानने है /
दूसरी पुस्तक लिखी -" अ पोलिटिकल एंड जनरल हिस्ट्री ऑफ़ तिन्नेवेली " १८८१ में ,,, जहाँ कि चर्च में वे पादरी थे / इसमें उन्होंने ये स्टैब्लिश किया कि तमिल भाषा बहुत ही सुन्दर और सुदृढ़ है , लेकिन ये संस्कृत से भिन्न है , लेकिन जब ब्राम्हण आर्यों ने , भारत के मूल निवासियों को उत्तर से विस्थापित करके दक्षिण में विस्थापित किया और उनको अपना गुलाम बनाया ,,तो मूल तमिल भाषाके शब्दों में , संस्कृत के शब्द घुसेड़ कर उसको corrupt कर दिया , और इसीलिये इन तमिलों में धूर्त ब्राम्हणों के हिन्दू धर्म कि सुपरस्टीशन्स ( जो प्रथाए और सिद्धांत बाइबिल से न मिले वो अन्धविश्वास और मिथक है ) सम्मिलित हो गए हैं ,,इसीलिये ये हिन्दू धर्म कि बेड़ियों में जकड गए है /
तो अब इनको शुद्ध कैसे किया जाय ????
उसका उपाय बताते हुए बिशप कालद्वेल्ल कहते हैं कि -- सबसे पहले इन धूर्त ब्राम्हणों कि भाषा संस्कृत को, तमिल डिक्शनरी से और शब्दावली से बाहर निकाला जाय / और दूसरा काम इन तमिलों को सभ्य बनाया जाय / ( यानि इनको false रिलिजन से निकालकर true रिलिजन -यानि ईसाइयत में शामिल किया जाय) .
दक्षिण भारत में संस्कृत और हिंदी विरोध का बैकग्राउंड देखिये ,,,इन्हीं पादरिओं ने रखा /. - शशि कान्त सुमन बात आगे बढ़ाइ जाय। ये तो है कि तमिल एवं हुब्रू में सम्बन्ध जोड़ना पादरियों की अतिरंजना थी। पर सवाल यह है कि क्या तमिल संस्कृत से विकसित हुई है ?See Translation
- Tribhuwan Singh एक बार ये स्थापित करने के बाद कि भोले - भाले द्रविड़ियन को जो कि भारत के मूल निवासी थे , उनको संस्कृत बोलने वाले आर्यों और ...... चालाक और धूर्त ब्राम्हणों ने .......पहले से मौजूद और उच्चीकोटि की भाषा तमिल और तेलगु ,(,जिनकी उत्पत्ति नूह के पुत्र शेम के वंशजों हिबू से हुयी थे ) में संस्कृत को घुशेड कर अशुद्ध बना दिया / इस तरह से ये पादरी इस शाजिश को अंजाम देने में कामयाब रहा कि ब्राम्हणों ने तमिल और तेलगु भाषियों को छल पूर्वक बेवकूफ बनाया ,और आर्यों कि रीति रिवाज और भाषा को इनके ऊपर जबरजस्ती लादा /
अब एक माहौल बनाने में कालद्वेल्ल जी कामयाब रहे कि अल्पसंख्यक ब्राम्हणों ने द्रविडिअन्स को गुलाम बनाया , विस्थापित किया , और उनकी संस्कृति को भ्रस्ट किया /
(एक coloniser ने देशवासी ब्राम्हणों को coloniser साबित किया )
अब रहा तमिल ग्रंथों को कैसे बाइबिल के फ्रेमवर्क में कैसे फिट किया जाय , तो ये पुनीत कार्य किया दूसरे पादरी G U पोप ने , उन्होंने दो काम किया /
(१) थिरुकुरल ग्रन्थ जो कि ऋषि थिरुवल्लार ने लिखा था , वो तमिलभाषा का बड़ा महान ग्रन्थ माना जाता है , उसे ये सिद्ध किया कि आर्यों के ग्रंथों से इसलिए फरक है क्योंकि इसे अर्थ धर्म काम का वर्णन तो है , लेकिन मोक्ष का वर्णन नहीं है , इस लिए ये संस्कृत भाषी आर्यों से इतर ग्रन्थ है / फिर और आगे जाकर उन्होंने ये प्रमाणित कर दिखाया कि
ऋषि थिरुवल्लार ने इस ग्रन्थ को रचाने की प्रेरणा ईसाई पुस्तकों से ली / इस थ्योरी को आज भी धर्म परिवर्तन के लिए किया जा रहा है /
(२) दूसरा है शैव सिद्धांत - अब इस पर ये तर्क रकह गया ,,कि ये शैव सिद्धांत ईसाईयत फलसफा 'Monogod रिलिजन " से मिलता जुलता है ,,इस लिए ये आर्यों के बहुदेवबाद से अलग है , और क्रिश्चियनिटी के ज्यादा निकट है /
इस तरह एक अलग द्रविड़ आइडेंटिटी , जो आर्यों से भिन्न लेकिन ईसाइयत के निकट तैयार कि गयी , जो धूर्त ब्रामणो के फैलाये जाल में अन्धविस्वाशी हो गये हैं / इनको सभ्य बनाये जाने और असली धर्म यानि ईसाइयत के उजाले में ले जाने कि जरूरत है , इनको ब्रांाणों के कुचक्र से फैलाये हुए अंधविश्वासों से बाहर निकालने के लिए / - Tribhuwan Singh अब ये समझने कि जरूरत है कि ------------द्रविड़ शब्द का संस्कृत------------------ में अर्थ क्या है ?? कहाँ प्रयोग हुवा है ये संस्कृत ग्रंथों में ?? और किस सन्दर्भ में ??
क्या द्रविड़ का अर्थ अलग रेस यानि नश्ल है ...जो संस्कृत से अलग है ??
या इसको भी राजनैतिक या ईसाइयत फैलाने के लिए इस्तेमाल किया गया / - Farhana Taj तेलुगू और तमिल का मूल एक है, लेकिन तेलुगू में कम से कम 20 प्रतिशत शब्द शुद्ध संस्कृत के हैं
जैसे अन्नम् तिन्नावा?
अन्नम शुद्ध संस्कृत है, तो फिर इन भाषाओं का मूल संस्कृत क्यों नहीं?See Translation - Tribhuwan Singh Arwa Fara ji यही मतिभ्रम फैलाया गया है की मनु ही नूह है । कहिये अगला पोस्ट इसी पे डालूँ।
लेकिन ये बताइए अगर तमिल का मूल संस्कृत नहीं है ,तो फिर क्या हिब्रू है। - Tribhuwan Singh Noah मनु कैसे हो सकते हैं ??
नूह अब्रह्मिक रिलिजन के पैगम्बरों के सीरीज में हैं । और क्या मनु भी उसी परंपरा में आते है , जिसमे एक भगवान होता है चाहे उसे गॉड कहो या अल्लाह कहो । और उस भगवान् का एक कूरियर यानि messanger है । जो उसको उनके अनुयाइयों को बताता है कि भगवान ने उससे ये बताया । जिसको अंग्रेजी में priviledged communication कहते है। और वो messanger इस priviledged communication को अपने followers को disclose किया। - Tribhuwan Singh अब संस्कित ग्रंथों में ---द्रविड़----शब्द का प्रयोग किन अर्थों में हुवा है ??
उसकी एक झलक।
अमरकोश में द्रविड़ शब्द को किन अर्थो में प्रयोग किया गया है , आप स्वयं देखे ।
(१) दस पराक्रमस्य
द्रविड्म तरः सहोबलशौर्यानि स्थाम शुष्मं च।
शक्ति पराक्रमह प्राणः ।
द्रविड़ पराक्रम की दस पर्यायवाचियों में प्रथम पर्यायवाची है ।
(द्वितीय कांडम क्षित्रिय वर्गः 8 श्लोक 102 - Tribhuwan Singh (२) त्रयोदस धनस्य
द्रव्यम वित्तं स्वापतेयम रिकथं ऋक्थं धनं वसु।
हिरण्यं द्रविड़म द्युम्नम अर्थम् रै विभावा अपि ।
द्वितीयम काण्डम वैश्यवर्गह 9 श्लोक 90।
यानी धन संपत्ति को भी द्रविड़ के नाम से जाना जाता है। - Tribhuwan Singh Fara Arwa जी तमिलभाषी हैं तो मेरी मदद कर सकती है। जैसे कुछ तमिल शब्द डॉ बुचानन ने कुछ Caste/Trade के 122 जान्तियों के सन्दर्भ में । आप थिरुकुराल के बारे में या ऋषि थिरुवाल्लर के बारे में, जिसका मैंने उल्लेख किया है। जिसको G U पोप नामक पादरी ने घोषित किया कि - कि उन्होंने अपने ग्रन्थ को इसाइयत की गरन्थों से प्रेरित होकर लोख है ।
- Tribhuwan Singh यानि अमरकोश के अनुसार ----- द्रविड़ ---- शब्द के मायने ----धन , बल या पराक्रम है /
इसको किसी -----अलग रेस या नश्ल ------ से कैसे जोड़ा जा सकता है / लेकिन तथाकथित इंडोलॉजिस्ट ,,जिनको संस्कृत का स भी नहीं आता ,,,देखिये किन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु ---शाजिश के तहत -- एक नयी आर्यों से इतर एक अलग रेस/ नश्ल का नाम दे डाला / आगे जब दलित नेताओं ने .. द्रविड़ शब्द को अलग जातियों...और दलितों .....किस तरह जोड़ा ...., के रूप में जिक्र करूंगा , तो इसका ध्यान जरूर रखियेगा / - Tribhuwan Singh २००८ से २०१२ बे बीच, द्रविड़ शब्द की उत्पत्ति ..जिसको अंग्रेजी में etymology कहा जाता है ,,,को पता करने हेतु ... मैंने गूगल को खंगाल डाला लेकिन कहीं नहीं मिला / पिछले वर्ष २०१२ में जब प्रयाग में महाकुम्भ का आयोजन हो रहा था ,,तो अग्निअखाड़ा के सचिव स्वामी गोविंदानंद ने मुझे एक पुस्तक भेंट की ,,और आग्रह किया कि इसकी कुछ प्रतियां छपवा दीजिये, तो मैंने सोचा कि बाबा मुझे चूना लगाना चाहता है / क्योंकि मैं बहुत भक्त टाइप का व्यक्ति नहीं हूँ , तो मैंने उनको टालने के लिए हाँ कह दिया / लेकिन जब मैंने उसको पढ़ा तो ,,द्रविड़ शब्द का जिक्र उसमें मिला ,, तो मैंने २०.००० रुपये खर्च कर उस पुःतक कि ५०० प्रतियां छपवाई /
उस पुस्तक का नाम है --" जगद्गुरु आदिशंकराचार्य , मठाम्नयाय , मठ , मढ़ियाँ , तथा सन्यासी अखाड़े "/ लेखक --अग्निअखाड़ा के सचिव स्वामी गोविंदानंद
Tribhuwan Singh अब
इस कथा वार्ता को आगे बढ़ाने के पहले मैं सुमंत दा कि भूमिका , एक सूत्रधार
को उनसे क्षणिक तौर पे उधार लेकर कुछ लिखना चाहता हूँ -
-- कौन सा वो युग था ,जब पूरा समाज एक जैसा था , अत्याचार से निर्लिप्त ???
---१५०० AD से १८०० AD , के बीच यूरोपीय क्रिस्तिानों ने अमेरिका पर कब्जा करने के बाद २०० मिलियन , यानि २० करोड़ अमेरिकी मूल निवासियों कि धर्म और अंधविस्वास के नाम पर हत्या की / और आज कितने मूलनिवासी वहां बचे हैं ?? जिनको रेड इंडियन कहा जाता है / इंडियन लेकिन रेड ?? ये क्या है भाई ?? कोई बताएगा इन सुबुद्ध जनों में से कोई एक ?? क्यों ये अमेरिकन्स अपने देश में इस अत्याचार कि बात नहीं करते हैं ??? क्यों वाइट एंड ब्लैक १९६० तक एक ही बस में स्कूल या ऑफिस जाने के लिए , वाइट आगे और काले पीछे बैठने की व्यवस्था का पालन करते थे ?? लेकिन सारे ह्यूमन राइट के मालिक वही हैं / भदोही में घरेलू उद्योग , को जिसने फैक्ट्री में बदलने को मजबूर किया ,,, और फिर उस फैक्ट्री को भी रुग्मार्क के नाम पे नष्ट किया / उसको नोबेल पुरस्कार मिला ,,,,९००० रूपया प्रतिवर्ष का व्यापार ,, और न जाने कितने स्किल्ड लोग , मजदूर बन गए / भाई किसने आवाज उठाई ?? लेकिन विदेश से पुरस्कारित यहीं , तो सम्मान तो देना ही पड़ेगा / और इसीलिए अगर शेरिंग जैसा पादरी , भारत के समाज की व्याख्या कर रहा है , और कोई मैक्समूलर नाम का जर्मन , जो संस्कृत का स भी नहीं जान सकता , अपने करियर में , वो बताता है , की कुछ संस्कृत भाषी आर्य बाहर से आये थे , और सब मूलनिवासियों को मार के खदेड़ दिया , दक्षिण की ओर/ और हम लोग इसे न समझ पा रहें हैं न सुलझा प् रहे हैं /
यहाँ तो बताया कि वर्ण यानी चमड़े का रंग / इसलिए कोई सवर्ण और कोई अवर्ण (discolored )
तो फिर वर्णमाला में वर्ण का क्या मतलब होगा ?? और वर्णधर्माश्रम में क्या इसका मतलब होगा ??
-- कौन सा वो युग था ,जब पूरा समाज एक जैसा था , अत्याचार से निर्लिप्त ???
---१५०० AD से १८०० AD , के बीच यूरोपीय क्रिस्तिानों ने अमेरिका पर कब्जा करने के बाद २०० मिलियन , यानि २० करोड़ अमेरिकी मूल निवासियों कि धर्म और अंधविस्वास के नाम पर हत्या की / और आज कितने मूलनिवासी वहां बचे हैं ?? जिनको रेड इंडियन कहा जाता है / इंडियन लेकिन रेड ?? ये क्या है भाई ?? कोई बताएगा इन सुबुद्ध जनों में से कोई एक ?? क्यों ये अमेरिकन्स अपने देश में इस अत्याचार कि बात नहीं करते हैं ??? क्यों वाइट एंड ब्लैक १९६० तक एक ही बस में स्कूल या ऑफिस जाने के लिए , वाइट आगे और काले पीछे बैठने की व्यवस्था का पालन करते थे ?? लेकिन सारे ह्यूमन राइट के मालिक वही हैं / भदोही में घरेलू उद्योग , को जिसने फैक्ट्री में बदलने को मजबूर किया ,,, और फिर उस फैक्ट्री को भी रुग्मार्क के नाम पे नष्ट किया / उसको नोबेल पुरस्कार मिला ,,,,९००० रूपया प्रतिवर्ष का व्यापार ,, और न जाने कितने स्किल्ड लोग , मजदूर बन गए / भाई किसने आवाज उठाई ?? लेकिन विदेश से पुरस्कारित यहीं , तो सम्मान तो देना ही पड़ेगा / और इसीलिए अगर शेरिंग जैसा पादरी , भारत के समाज की व्याख्या कर रहा है , और कोई मैक्समूलर नाम का जर्मन , जो संस्कृत का स भी नहीं जान सकता , अपने करियर में , वो बताता है , की कुछ संस्कृत भाषी आर्य बाहर से आये थे , और सब मूलनिवासियों को मार के खदेड़ दिया , दक्षिण की ओर/ और हम लोग इसे न समझ पा रहें हैं न सुलझा प् रहे हैं /
यहाँ तो बताया कि वर्ण यानी चमड़े का रंग / इसलिए कोई सवर्ण और कोई अवर्ण (discolored )
तो फिर वर्णमाला में वर्ण का क्या मतलब होगा ?? और वर्णधर्माश्रम में क्या इसका मतलब होगा ??
शिशिर यादव सर
आपका ब्लॉग लिंक मिल गया है ,अपना ज्ञान बढाता रहूँगा उससे | उपर आपके एक
कमेंट जिसके अनुसार ये शोध अभी पुस्तक रूप में नही है , यदि इसे पुस्ताक
रूप दीजियेगा तो कृपया बताइयेगा जरुर सर | मई इंतजार में हूँ आपकी इस
पुस्तक के |See Translation
Tribhuwan Singh आप गूगल सर्च करिये ..द्रविड़ियन लैंग्वेजेज का हिब्रू कनेक्शन मिल जाएगा /
Farhana Taj हमारा
स्पष्ट मानना है कि संस्कृत ही सभी भाषाओं की जननी है, लेकिन नूह यदि मनु
नहीं तो पोस्ट डाल ही दें साथ में प्रमाण भी दें, हो सकता है हम भ्रम हों,
चलो कुछ नया तो मिलेगा जानने के लिए।See Translation
Tribhuwan Singh (३) द्रविडम तु धनम बलं
तृतीय कॉन्डम, नानार्थवर्गः ,; श्लोक संख्या ५२
अर्थात द्रविड़ का अर्थ , धन और बल ( पराक्रम ) है /
तृतीय कॉन्डम, नानार्थवर्गः ,; श्लोक संख्या ५२
अर्थात द्रविड़ का अर्थ , धन और बल ( पराक्रम ) है /











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