आंबेडकर जी पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने आर्यों के बाहर से आने का खंडन किया था।
आंबेडकर जी पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने अंग्रेजो द्वारा प्रचारित और प्रसारित , चमड़ी के रंग को आधार बनाकर (रंगभेद ) हिन्दू समाज का , सवर्ण और अवर्ण में समाज के विभाजन का खंडन किया था। और उदाहरण के रूप में दसरथ पुत्र मर्यादा पुरुषोत्तम रामचंद्र जी और यदुवंशी कृष्ण जी के स्यामल / काले रूप का उद्धरण देते हुए , अंग्रेजों की शाजिश का पर्दाफाश भी किया है ।
तो फिर क्यों दलित चिन्तक अब महिसासुर की पूजा करना चाहते हैं ।
और दुर्गा जी के लिए घृणित उपमा दे रहे हैं ।या तो ये आंबेडकर से परिचित नहीं है या फिर ये उन्ही का अपमान करने पे तुले हैं ।
- Tribhuwan Singh सुमंत दा आपके यहाँ नाउ को नाउ ठाकुर कहते हैं ,,लेकिन जहाँ आपका बचपन बीता हैं ,,वहां ठाकुर को नाउ ,,कह देते तो लोग आप को दौड़ा लेते / लेकिन यही सांस्कृतिक विविधता हमारी विरासत हैं ,,,क्या उसको संघिताबद्ध रिलिजन के प्रचारक ,,समझ सकते हैं?? ,,क्या वो समझ सकते हैं कि धर्म का अनुवाद रिलिजन नहीं हो सकता ??
तो कैसे वे संस्कृत के प्रकांड पंडित हो गए / मॅक्समुल्लर फ्रांस में एक संस्कृत -इंग्लिश डिक्शनरी पढ़कर, संस्कृत का विद्वान हो गया ? उसको और तमाम उसी खपड़ी में नहाये, अंग्रेज विद्वानों के कथन को हम ब्रम्हवाक्य मान लेंगे क्या हम ?? हम क्या ऐसे ही विद्वानों के चश्मे से भारत के समाज और उसके इतिहास को पढ़ेंगे ?? क्या कभी अपनी सोच और देश के विद्वानों के ग्रंथों से समाज का चरित्र - चित्रण नहीं करेंगे ?? - Tribhuwan Singh Dr Ambedkar was great thinker and reformer ,,but what was problem in that era ??..the only source of information about Indian history and society was narratives written by European writers ,,thinkers and missionary agents ,,who had a feeling of privileged white race and their affiliation True Religion (Christianity) ....so obviously ..it was White men's burden to rule over barbaric and and uncivilized people of False Dharma (Hinduism)....
- Tribhuwan Singh Amalendu Upadhyaya भाई, व्यक्ति पूजा का कभी कद्रदान नहीं रहा। और मेरा इतिहास बोध इसकी इजाजत भी नहीं देता। गांधी हो या अंबेडकर, राम हो या ईसा। इतिहास के हर नायक को तर्क पर कसने का भावी पीढ़ी को हक है और यह होना चाहिए। मैं यह सवाल बार-बार करूंगा कि अंबेडकर के इतिहासबोध के आधार क्या थे। मूल ग्रंथ या फिर कुछ पादरियों के अंग्रेजी अनुदित पुस्तकें। क्योंकि जैसे ही आप सेकंडरी सोर्सेस पर निर्भर हो जाते हैं, आपकी इतिहास को विवेचन की क्षमता वहीं दूषित हो जाती है। मैं एक छात्र हूं और सवाल उठाना मेरा छात्र धर्म है। मैं किसी वैचारिक गिरोह का समर्पित और बंद मस्तिष्क कार्यकर्ता तो कतई नहीं हो सकता।
- Tribhuwan Singh "शूद्र कौन थे " नामक पुस्तक में पेज ९० पर ,, डॉ आंबेडकर ने कौटिल्य अर्थशास्त्र को उद्धृत करते हुए ,,ये प्रमाणित किया है ,,ब्राम्हण क्षत्रिय और वैश्य के साथ शूद्र भी आर्य थे / और उसके पहले उन्होंने प्रमाणित किया था की आर्य यानि संस्कृत भाषी हिन्दू ,,बाहर से नहीं आये थे ,वे भारत के मूल निवासी थे / कितना तथ्यात्मक अध्यन है उनका / किसने इंकार किया की शूद्र आर्य नहीं थे ,,,भारत के ब्राम्हणों ने ???
- Tribhuwan Singh शूद्रो के गुलाम बनाये जाने की बात को ,,एकदम एक सिरे से ख़ारिज करते हुए डॉ आंबेडकर लिखते है -" गुलाम तो दूर की बात है ,,शूद्रों तो चक्रवर्ती राजाओं के राज्याभिषेक में शामिल होते थे / राज्याभिषेक में हिस्सा लेने वाले जनप्रतिनिधयों को रतनी के नाम से जाना ज...See More
- Tribhuwan Singh एक झलक डॉ बुचनन कि पुस्तक Journey From Madras to the countries of Mysore Canara and Malabar .......... जोकि १८०७ में छपी थी ,,,,उसके कुछ पुस्तकांश ..
(१) ये मछुवारे मोगयार कहलाते हैं ,जो तुलवा के निवासी हैं ,मोगयार नाविक ,मछुवारागिरी , सामान धोने और पालकी उठाने का काम करते हैं ,,और आपस में ही शादी ब्याह करते हैं /वे अपने आप को पवित्र शूद्र वंशज के मूल से उत्पत्ति बताते हैं , और हेल्पिकास ( एक और शूद्र जाती) से ऊपर का दर्जा रखते हैं, तुलवा की ज्यादातर खेती यही लोग करते हैं (हेल्पिकास) / लेकिन ये अपने आपको बुन्ट्स से नीचे दर्जे का मानते हैं /------पेज २२
(२) तलुवा के ब्राम्हण कहते हैं कि पुरुष राम ने इस जगह को ब्राम्हणों के लिए तैयार किया था ,इसलिए उन्हें ही इस जगह का मालिक समझा जाना चाहिए /
लेकिन ,,वर्तमान में इस प्रदेश कि ज्यादातर जमीनों पर बुन्ट्स और दूसरे शूद्रो का कब्ज़ा है ,,और वो ही अपने आप को इसका मालिक बताते हैं / यद्यपि ब्राम्हण अपना मालिकाना हक़ जाता तो रहे हैं ,लेकिन अब ये जमीन उनके हाथ में नहीं है ,,और न भविष्य में संभावना दिख रही है / पेज -३२
अब कौटिल्य के शूद्रों के धर्म यानि कर्तव्यों को फिर से पढ़िए ,,डॉ आंबेडकर के शान्तिपर्व में शूदों के पवित्रता के उल्लेख को पढ़िए ,,और डॉ बुचनन के शूद्रों के उल्लेख को पढ़िए The Mogyar ....they pretend to be Shudras of pure decent ... और भारत के आर्थिक इतिहास को पढ़िए ..इस पुस्तक के छापने के समय काल को पढ़िए १८०७ ...अभी भारत विश्व जीडीपी के २५% हिस्सेदारी से कुछ ही नीचे आया है / और ,, अभी शूद्र एक घृणित शब्द बनके नहीं उभर पाया है / - Tribhuwan Singh किसी भाषा के ज्ञान होने से और उस भाषा से अनभिज्ञ होने से ,समझने और लिखने में क्या खोट हो सकता है,या आप किस तरह बहकाये या दिग्भ्रमित किये जा सकते हैं, उसका उदाहरण मैं पेश कर रहा हूँ /
कौटिल्य के जिस दासकर्मकरकल्पम् को उद्धृत करके डॉ आंबेडकर (अभी मेरे पिछले कमेंट में देखें ), इस निर्णय पर पहुंचे कि शूद्र भी आर्यों के अंग हैं / उसको मैं कौटल्य के अर्थशाश्त्र से हिंदी में अनुवादित ( संस्कृत टेक्स्ट अगर आप कहेंगे तो वो भी पेश करूंगा ) ,तथ्य और डॉ आंबेडकर का ओरिजिनल इंग्लिश टेक्स्ट ,मैं पोस्ट कर रह हूँ /
"उदारदास को छोड़कर आर्यों के नाबालिग शूद्र वैश्य क्षत्रिय या ब्राम्हण को यदि उनके ही परिवार का कोई व्यक्ति बेंचे या गिरवी रखे तो उन पर क्रमशः बारह पण , चौबीश पण ,छत्तीश पण और अड़तालिश पण का दंड किया जाय / यदि इन्ही नाबालिग शूद्र आदि को यदि कोई दूसरा व्यक्ति बेंचे या गिरवी रखे ,तो उक्त करम से उनको प्रथम ,माध्यम ,उत्तम साहस और प्राण बढ़ का दंड दिया जाय / यही दंड खरीददारों और इस मामले में गवाही देने वाले का भी किया जाय /
डॉ आंबेडकर की पुस्तक से वही पंक्तिया (कौटिल्य के अर्थशाश्त्र से) नीचे लिख रहा हूँ ---तुलना करिये कि क्या एक ही शब्दार्थ , एक ही मायने ध्वनित हो रहा है कि नहीं ?? That the Shudra is a non-Aryan is contrary to the view taken by the school of Arthashastra. As a representative of that school, the opinion of Kautilya on that question is of great value. In laying down the law of slavery, Kautilya says:[f56]
The selling or mortgaging by kinsmen of the life of a Shudra who is not a born slave, and has not attained majority, but is Arya in birth shall be punished with a fine of 12
panas.
Deceiving a slave of his money or depriving him of the privileges he can exercise as an Arya (Aryabhava) shall be punished with half the fine (levied for enslaving the life of an Arya).
Failure to set a slave at liberty on the receipt of a required amount of ransom shall be punished with a fine of 12 panas; putting a slave under confinement for no reason
(samrodhaschakaranat ) shall likewise be punished.
The offspring of a man who has sold himself off as a slave shall be an Arya. A slave shall be entitled not only to what he has earned himself without prejudice to his masters work but also to the inheritance he has received from his father.
Here is Kautilya, who calls the Shudra an Aryan in the most emphatic and express terms possible. From "who were shudras " by Dr B R Ambedkar ,,page 90 - Tribhuwan Singh और अगर डॉ अम्बेदकर ने सिर्फ john Muir के द्वारा संदर्भित रिफरेन्स को उद्दृत करने के बजाय ,,कौटिल्य के अर्थशास्त्र को संस्कृत में न सही उसकी अंग्रेजी या मराठी अनुवाद ही पढ़ लेते ,,तो उनकी ढेर सारी भ्रांतियां ख़त्म हो जातीं ,अछूतों के बारे, में भंगी के बार...See More
- Tribhuwan Singh " जो स्वामी अपने पुरुष मातहतों से मुर्दा , मलमूत्र या जूठन उठवावे , और महिला मातहतों को अनुचित दंड दे ,उसके सतीत्व को नष्ट करे ,नग्न अवस्था में उनके पास जाय, या नंगा कराकर अपने पास बुलाये तो उसके धन जब्त कर लिया जाय /
- Tribhuwan Singh इसके बाद क्या शूद्र कि उत्पत्ति खोजने के लिए वेदों कि सैर करने कि आवश्यकता बचती है , है पुरुषोक्त को क्षेपक घोषित करने कि आवश्यता ??
- Tribhuwan Singh जो स्वामी अपने पुरुष मातहतों से मुर्दा , मलमूत्र या जूठन उठवावे , उसके धन जब्त कर लिया जाय--Kautiya
- Tribhuwan Singh It was a Government order and an article of Constitution written by Kautilya .
- Tribhuwan Singh लेकिन ये मुद्दे को फिर उठायेंगे ,,अभी तो फिलहाल डॉ अम्बेदकर के लिखे हुए पर ही ,,केंद्रित करते हैं /
डॉ अम्बेदकर ने जब "पुरुषसूक्ति" को आधार मानकर ,,वर्ण व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह खड़ा किया / तो उनका ये निष्कर्ष कि ''चूंकि शूद्र उस विराट पुरुष के पैरों से पैंदा हुवा है , इसलिए 1900 के बाद भारत के एक बड़ा वर्ग " शूद्र" जैसे घृणित श्रेणी में ,,घृणित काम (Menial जॉब) करने के लिए मजबूर करने को मजबूर हुवा ,और इसके पीछे ,,ब्राम्हणो की शाजिश ,थी , जिन्होंने धूर्ततापूर्वक ..ऋग्वेद के उस सूक्ति में ..एक क्षेपक जोड़ दिया (interpolation ) /
लेकिन फिर उसी सूक्ति से ये भी निकल के आता है कि उसी विराट पुरुष के पैरों से हिरण्यगर्भा धरती भी उत्पन्न हुई / - Tribhuwan Singh लेकिन सवाल ये है ,, कि जब डॉ अम्बेदकर ये कहते हैं ,,कि उनकी इस हाइपोथिसिस पर इसलिए कोई प्रश्न चिंह नहीं लगा सकता ,,क्योंकि वे संस्कृत नहीं जानते थे , क्योंकि जितने धर्मग्रन्थ थे सबका ,अनुवाद हो चुका है / तो फिर ये भी देखना चाहिए कि किन संस्कृतविदों के अनुवाद से उन्होंने ,,अपनी थीसिस के लिए "मटेरियल एंड मेथड " लिए ?? उन संस्कृतविदों की संस्कृतज्ञ होने के क्लेम में कितना दम है ?? और दूसरी बात ये है , की इन संस्कृतज्ञों के संस्कृत में रूचि का कारण अकादमिक था , की कुछ इतर उद्देश्य थे ?? कम से कम इतना तो सभी मानेंगे ,,की ये विदेशी संस्कृतज्ञ भारत में फिलैंथ्रॉपी के उद्देश्य से तो नहीं ही आये थे ??
तो क्यों न उनकी जांच कर लिया जाय जिनके पुस्तकों से डॉ अम्बेदकर ने अपनी थेसिस के लिए "मटेरियल एंड मेथड " लिया था / क्या यह अप्रसांगिक है ?? - Tribhuwan Singh तो क्यों न उनकी जांच कर लिया जाय जिनके पुस्तकों से डॉ अम्बेदकर ने अपनी थेसिस के लिए "मटेरियल एंड मेथड " लिया था / क्या यह अप्रसांगिक है ? P.T.O.
- Sanjay Jothe बहुत सुन्दर ... बाबा साहेब आम्बेडकर ने निश्चित ही आर्य आक्रमण का विरोध किया है ... लेकिन ब्राह्मणों ने जिस शोषण का जाल रचा है उसे उन्होंने पूरी तरह नंगा किया है, आजकल ब्राह्मण आक्रमण थ्योरी भी प्रचलन में है, मुझे नहीं पता यह कितनी सत्य है लेकिन उस थ्योरी के अनुसार ब्राह्मण मूलतः अब्राह्मिक संस्कृति के वाहक हैं ... मेसोपोटामिया की सभ्यता अभी तक की ज्ञात वैदिक सभ्यता से पुरानि रही है .. उस थ्योरी के अनुसार ब्रह्म और ब्राह्मण अब्राहम से उत्पन्न हुए हैं... शब्द मेंभी समानता है, अब्राहम अपने पुत्र की बलि अग्नि की साक्षी में देते हैं यही शायद आगे चलकर ब्राह्मणों का यज्ञ बन जाता है .... अब्राहम के सैकड़ों साल बाद मूसा के महान निष्क्रमण की बात आती है जिसमे उनके दो कबीले पवित्र भूमि इस्राइल की खोज में निकलते हैं... ये बात इसा से हजारों साल पुरानी है. ओल्ड टेस्टामेंट में कहानी आती है कि मूसा का एक कबीला भटक गया और दूसरा अभी के इस्राइल में पहुंचा.... बाद की खोजें बतलाती हैं कि वो भटक गया कबीला असल में कश्मीर के रास्ते भारत आया था औरउन्होंने.धीरे धीरे इस देश पर कब्जा किया और अपनी रक्तशुद्धि. बनाए रखने के लिए विवाह और खान पान कठोर नियम बनाए, यही नियम वर्ण और जाति के नियम बने. ब्राह्मणों केआलावा शेष वर्ण जो मूल रूप से भारतीय हैं उनका दमन किया गया. बाद में अनेक रूपों में रक्त कामिश्रण हुआ और ब्राह्मण क्षत्रियों में संघर्ष हुआ... परशुराम उसी संघर्ष के नायक हैं... इसी संघर्ष के क्रम में इंद्र कामूलनिवासी कृष्ण से युद्ध होता है. अब इंद्र पर गौर कीजिये, वह वर्षा का देवता है. भारत में वर्षा की कोई कमी नही थी, इरान या बेबीलोन में वर्षा कम होती थी इसलिए उन्होंने वर्षा के देवता को सबसे बड़ा माना है. इसलिए इंद्र के मानने वाले निश्चित ही सूखे प्रदेश से आए होंगे....इस प्रकार मूल गोरे ब्राह्मण अब्राहमिक संस्कृति के वाहक हैं... इस बात की भी पूरी संभावना है कि शिव और कृष्ण इस देश के मूल निवासियों या बहिष्कृत समाज के लोग हों और बाद में उन्हें अपने पुराण रचने के षड्यंत्र द्वारा निगल लिया गया हो ...See Translation
- Tribhuwan Singh अब्राहमिक संस्कृति ?
आप जानते है इसके बारे में Sanjay Jothe भाई ??
जरा और विस्तार से बताये ।
रेफेटेंस भी कोट करे उस विद्वान का।
जिससे पाठक गण खुद पढ़ सकें उनको। - Tribhuwan Singh ओह हो दलित साहित्य से निकला वेदवाक्य है ये।
उतना ही ओरिजिनल है जितना जॉन मुइर जैसे Bigot ईसाई द्वारा लिखित "ओरिजिनल संस्कृत Text "।जहां से
डॉ आंबेडकर ने संस्कृत पढ़ा था। - Sanjay Jothe अब आप संस्कृत और वैदिक साहित्य को प्रमाण मान सकते हैं तो दूसरों को भी स्वतंत्रता है कि वे अपने प्रमाण ढूंढ सकें ....See Translation
- Tribhuwan Singh ये साहित्यकार हैं कि इतिहासकार Sanjay Jothe भाई ?
दोनों का फर्क तो मालूम है न ?? - Tribhuwan Singh मैंने किस वैदिक साहित्य को कोट किया है संजय भाई ?
मैंने पहले ही घोसित किया क़ि इन मिथकों तक मेरी पहुँच नहीं है। - Sanjay Jothe जी हाँ ... फर्क तो है ... वैसे पुरातत्वविद वैज्ञानिक होते हैं ... उन्होंने वैदिक सभ्यता को सबसे पुरानि नहीं माना है ... जेनेटिक विज्ञानी भी कहते हैं सारी मनुष्यता अफ्रीका से और वो भी बंदरों से उत्पन्न हुई थी ... इस प्रकार ब्रह्म शायद अफ्रीका में पाया जाने वाला कोई चौपाया प्राणी था जिससे वर्ण आदि सहित मनुष्यता पैदा हुयी ... सादर ...See Translation
- Sanjay Jothe आप मिथक नहीं मानते ? मतलब आप चार वर्ण भी नहीं मानते? फिर राम द्वारा समुद्रसेतुनिर्माण, हनुमान का सूर्या निगलना, अहिल्या का पत्थर बनजाना, वानर सेना, पुष्पक विमान, भीष्मकाइच्छामृत्यु, औरकृष्ण का कालियावध, द्रोपदी की साड़ी लम्बी होना... ये सब नहीं मानते? फिर आप हिन्दू कैसे हो सकते हैं?See Translation
- Indra Deo Singh संजय JOTHE जी
कल तो आपने ने सारे साहित्य को कूड़ा कबाड़ बताया था ।
आज तो उसी को आधार बना कर चर्चा कर रहे हैं
। भारतीय संस्कृत की उत्पति मेसोपोटामिया से बता रहे हैं
क्या आप को रात को इलहाम हुआ है क्या ?
अपने को तर्क संगत तथा वस्तुनिस्त बनाये ।
आप शोध छात्र है
ऐसी मन गनन्त बातों से काम - नहीँ चलेगा
आदर सहितSee Translation - Sanjay Jothe इंद्र जी ... जिस साहित्य के आधार पर आप अपनी थ्योरी बना सकते हैं तो दूसरों को भी हक़ है ... मैं उन्हें कूडा कह दूं लेकिन वे मेरी थोड़े ही मानते हैं ....See Translation
- Tribhuwan Singh अब्रह्मिक संस्कृति के बारे में बताएं ।Sanjay Jothe भाई।
- Tribhuwan Singh और ये भी बताएं की मुद्राराक्षस जी पुरतत्वविज्ञ है क्या ?
- Sanjay Jothe वो आप पता कीजिये न सर ... आप भी खोज सकते हैं ... जब हमारे महान मिथक रचने वाले गीता का उपदेश सूर्य को देते हैं, फिर सूर्य से विवस्वान को, फिर लाखों साल बाद मनुष्यों को ... इतनी लम्बी इतिहास वाली पद्धति के लोग बहुत कुछ खोज सकते हैंSee Translation
- Tribhuwan Singh अरे चलिए वो मैं खोज लूंगा आप अब्रह्मिक संस्कृत के बारे में बताये जहां से ब्राम्हण पैदा हुवा ।Sanjay Jothe ji
- Tribhuwan Singh Are इतना तो बता के ही जायं
- Tribhuwan Singh चले गए ?
कोई बात नहीं
लौट के बता दीजियेगा Sanjay Jothe जी। - Sanjay Jothe त्रिभुवन जी ... मैंने पहले ही कह दिया है कि ये एक थ्योरी है ... और आप समझ सकते हैं ये थ्योरी मैंने नहीं बनाई. मैंने सिर्फ चर्चा के निमित्त यहाँ रखा है. उसका अगला पिछला सभी ढूंढना मेरी जिम्मेदारी नहीं. जैसे आप एक डाक्टर हैं शायद, आप किसी को दवाई देते हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि उस दवाई पर अलग से आप पीएचडी करें, आप इंजेक्शन लगाते हैं तो जरुरी नहीं कि पूरा ब्लड सर्कुलेशन सिस्टम पहले सिद्ध करके दिखाएँगे ... वैसे याद आया ... मनुष्य शरीर के निचले अंगों से यौन क्रिया करता और जन्म देता है ... ये ब्रह्म के मुख से ब्राह्मण कैसे पैदा हो सकता है ? आप डाक्टर होकर इसे समझायेंगे ? ... सादर ...See Translation
- Anshuman Pathak बस मैं जानता था आप पुरुष सूक्त की चर्चा अवश्य करेंगे । पुर अर्थात ब्रम्हाण्ड और इस ब्रम्हाण्ड में परिपूर्ण होने से ईश्वर पुरुष...इस शरीर में जीवात्मा के परिपूर्ण होंने से यह भी पुरुष है ।
और वैदिक ईश्वर निराकार है यजुर्वेद अध्याय चालीस में उसे अशरीरी और नाड़ी स्वांस आदि के बंधन से मुक्त बताया गया है वेद में कहीं भी परम पुरुष को शरीरधारी कहा गया हो ऐसे प्रमाण नहीं हैं ।
अब इस सम्बन्ध में केवल एक प्रमाण दिया जाता है कि पुरुष सूक्त में ईश्वर के सहस्त्र मुख और सहस्त्र हाथ आदि बताये गए हैं ।
लेकिन वेदार्थ करने के नियम हैं उसके लिए वेदांगों का विज्ञान है उन्ही में से एक निरुक्त में सहस्त्र का अर्थ असंख्य बताया गया है । और उसके असंख्य हाथ और मुख होने से यह बताया गया है कि वह सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है क्योंकि असंख्य मुख वाला व्यक्ति संभव ही नहीं इसलिए सही सही भावार्थ करना चाहिए शब्दार्थ और भावार्थ का भेद आपको नहीं समझाना पड़ेगा क्योंकि आप उन्नत साहित्यिक समझ रखते हैं ।See Translation - Tribhuwan Singh ha ha ha ha वह क्या परवचन दिया है संजय भाई / अपने कहे को ही व्याख्यायित नहीं कर सकते लेकिन उस पर भरोसा करते हैं , और अपने बहस का मूलाधार बंनाते है / इसको क्या कहूँ बौद्धिक विमर्श , बौद्धिक दिवालिया पण या बौद्धिक व्यभिचार ?? आत्म चिंतन और आत्म मंथन करे Sanjay Jothe भाई किसी तथ्य को प्रमाणित माने के पहले /
- Anshuman Pathak मुख से पैदा होने सम्बन्धी उक्त मन्त्र का अर्थ कर लोगों ने कबाड़ा कर दिया । मन्त्र पढ़िए ब्राम्हणो अस्य मुखमासीद् ब्राम्हण इसका मुख है मुख से पैदा नहीं हुआ ।See Translation
- Sanjay Jothe आपकोउदाहरण दिया ... आप सिद्ध कर दें की ब्रह्म पूरे शरीर से बच्चे कैसे पैदा करता है? आप डाक्टर हैंSee Translation
- Tribhuwan Singh "-जैसे आप एक डाक्टर हैं शायद, आप किसी को दवाई देते हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि उस दवाई पर अलग से आप पीएचडी करें, आप इंजेक्शन लगाते हैं तो जरुरी नहीं कि पूरा ब्लड सर्कुलेशन सिस्टम पहले सिद्ध करके दिखाएँगे ... वैसे याद आया ... मनुष्य शरीर के निचले अंगों से यौन क्रिया करता और जन्म देता है ... ये ब्रह्म के मुख से ब्राह्मण कैसे पैदा हो सकता है ? आप डाक्टर होकर इसे समझायेंगे ? ... सादर ..." Sanjay Jothe संजय भाई इसको कुतर्क कहते हैं / हमें इंजेक्शन लगाने के पूर्व फिजियोलॉजी पढ़ाई कराई जाती है , जिसमे यही पढ़ाया जाता है और वो भी फर्स्ट ईयर में / आपको अपनी विधा का ज्ञान है कि नहीं ये तो नहीं मालूम लेकिन दूसरी विधाओं के बारे में ऑथेंटिक कमेंट करने का दुस्साहस है , ये मैं जनता हूँ / सादर
- Shalini Khattar Mehta Tribhuwan Singh ji ,,,theory to Sanjay ji swayam hi maan chuke hai ,,,phir is par ab baat karne ko shesh to kuchh rahaa hi nahin ,,theory hai ,,vaastvikta nahin ,,Sanjay ji ,,,vaise Tribhuwan Singh ji ne yahaan Ambedkar theory par likhaa hai ,,,,,Sanjay ji brahm to hum sabhi kaa saar hai ,,,chaahe aap maane yaa n maane ,,,sab kuchh jaivik kriyaa se sambhav hai ,,lekin aapki vaichaarik kshamta ,,jo aapko anay se Bhinn karti hai ,,wahi usi brhm ki hi den ,,aagey aap jaisaa chaahe trk dijiye ,,,,,parnatu mere alp gyaan ne mujhe yahi sikhaayaa hai ,,isiliye kah diyaa ,,vaise hum yahaan charchaa Vartmaan ko dhyaan main rakhkar kare to ,,kyaa jyaadaa sahi n hoga ??? Raam Raam sabhi mitro koSee Translation
- Tribhuwan Singh Shalini Khattar Mehta ji कभी कभी Surendra Solanki ji के थ्योरी से सहमत होने का मन करता है Sanjay Jothe जैसे चिंतक पोस्ट के तथ्यों पर बात न करके अंड band न जाने क्या क्या कुतर्क करते है / ब्रम्ह कि खोज फेसबुक पे कर रहे है ?? इन मूढ़ विद्वानों को ये नहीं मालूम कि ऋषि मुनि ज्ञानी इतनी तपस्या करते हैं तब कहीं जाकर ब्रम्ह को समझ पाते हैं /
- Shalini Khattar Mehta ji Tribhuwan Singh ji ,,par aaj Sumant Bhattacharya ji kahaan hai ,,binaa unke charchaa ,,,adhuri si prateet ho rahi hai ,, smile emoticon hai n ,,,Jaagiye Sumant Bhattacharya,,Savera ho gayaa smile emoticon smile emoticonSee Translation
- Surendra Solanki हर कोई अपने अपने आधार पर वर्ण व्यवस्था को चलाता।
योगी साधना का आधार।...See MoreSee Translation - Sanjay Jothe त्रिभुवन जी ... उस ब्रह्म में संवेदना हैकि नहीं? अगर है तो ये वर्णविभाजन उसने कोसे पैदाकिये और क्यों किये? क्या वह महाक्रोधी और कष्ट देने वाला है? जिनऋषियोंको ब्रह्म मिल गया उन्होंने क्या ब्रह्म से इन प्रश्नों का उत्तर जान लिया? फिर जानकर इस समाज सेशोषण ख़त्म करने के लिए क्या किया? ... आप एक सुशिक्षित व्यक्ति हैं ... मुझसे बड़ेहैं... मैं आपका बहुत सम्मान करता हूँ... आशाहै हम सभ्य भाषा में भी बात कर सकेंगे ... प्रणाम ....See Translation
- Arun Kumar Sanjay Jothe G, साहित्य ज्ञान विज्ञान को जातीय स्तर पर भेद करना असमाजिक है। इस भेदभाव के तहत अध्ययन करने से गुमराह होने का खतरा है।रामायण को आप किस श्रेणी के साहित्य मे रखेंगे।See Translation
- Shalini Khattar Mehta Tribhuwan Singh ji ,,,sab ki talaash internet pfr ,,phir bhi gaaliyaan bhi isi ko hi dii jaati hai ,,,gyaan ,,aur wah bhi aatmik vishleshan ,,,yahaan ek band kamre main internet par chalti ungliyon ke dwaaraa sambhak kaise ????????,,,,,,,,,,ab yah to gyaani hi bataa sakte hai ,,hum to yaahaan gyaan lene aate hai jiSee Translation
- Tribhuwan Singh क्या वह महाक्रोधी और कष्ट देने वाला है? is Abrahmic God , not Sanatani Bramh . You know nothing about Sanatan Dharma Sanjay Jothe ji .Then why proving youself ??
- Shalini Khattar Mehta बुद्धिहीनता से बुद्धिमान बनने की कला का विभाजन। अब अगर कोई अपने को अपनी बुद्धि से
शुद्र मान के तो इस व्यवस्था में कोई कमी नही। बल्कि उसकी चेतना इन आधार तक
नही पहुंची।See Translation - Surendra Solanki संजय जी।
भाषा सभ्य हो या असभ्य। उसका उद्देश् दुसरे व्यक्ति का ध्यान आकर्षित करना और उससे अपनी बात मनवाना।
शुद्र शब्द का इस्तेमाल पंडित निम्नता से करता है। क्योकि वह साधना रत नही है इसलिए उसे ही नही पता होता। साधना में वहा शूद्र हे। बाकी सब उससे आगे निकल गए।See Translation - Sanjay Jothe जोब्रह्म चार वर्णों को बना कर उन्हें आपस में लडवाए वो यहोवा से भी भयानक और क्रोधी है ...त्रिभुवन जी ...See Translation
- Bharti Subedi Rawat Actually it is all fake character of so called leaders of dalit they want a political power and using the issue of savarn and dalits I again mention these so called DALIT CHINTAKS who wants to worship mahusasur are brainless creatures attracted towards sanskritization .....They are neither well wishers nor loyal so no reason to accept their identity...
- Sanjay Jothe त्रिभुवनजी... इस सम्मान के लिए आपका आभारी हूँ... मेरे प्रणाम स्वीकार करें ...See Translation
- Indra Deo Singh ए कहते हैं कि अभी कर के दिखा दो ।
कोaइ हम किन। राम बाबा तोड़े हैं ।
गजब हाल है ।
त्रिभुवन जी AND सुरेन्द्र सोलंकी के आनुसार
चेतना के स्तर के हिसाब से हम सभी लोग " शूद्र " हैं ।See Translation - Indra Deo Singh SANJAY JOTHE जी
कभी आप महर्षि अरविन्द को STUDY करे
एक बार नहीँ , कम से कम20 बार
तब आप को शूद्र AND आर्य का मतलब समझ में आयेगाSee Translation - Tribhuwan Singh Sanjay Jothe जी आपकी विनम्रता का मैं सम्मान करता हूँ ।लेकिन आप बताएं कि क्या आपने पोस्ट के एक भी कमेंट पे कमेंट किया क्या ?
क्या आप की जिद और दुराग्रह पूरा करूँ ?
आप सार्थक चर्चा के लिए तैयार ही नहीं है।
आशा है कि आप मेरी धृस्तता को क्षमा करेंगे। - Sumant Bhattacharya Sanjay Jothe भाई, क्या आप इस बात पर सहमति देंगे कि तमाम यूनिवर्सिटी का सर्वे कराया जाए और यह देखा जाए कि कितने वास्तविक दलित उच्च शिक्षा तक पहुंच पा रहे हैं, अब बीस साल बाद क्यों नहीं दलित चिंतक इस बात पर सहमति जाहिर करते हैं, कहीं दलितों के बीच में आरक्षण के लाभों पर पपड़ी जमा कर बैठा दलित तबका यह तो नहीं चाहता है कि उनके भीतर से ही उनके लिए प्रतिस्पर्धी ना पैदा हो जाए ? यहां जो दलित के नाम पर विमर्श कर रहा है वो एक लाभ पर कुंडली मारे बैठा डरा सहमा सा दलित हितों को प्रवक्ता है ? जो उस समाज के खिलाफ खड़ा है, जिसका प्रवक्ता होने का दावा करता है...See Translation
- Surendra Solanki शुद्र अवस्था बुद्धिहीन अवस्था को कहा जाता है। जब बुद्धि आ जाती है तब अपने आप ये अवस्था चली जाती है।
हनुमान चालीसा पढ़ते वक्त भी हम सब यही कहते।
बुद्धिहीन तनु जान के सुमरो पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देऊ मोहे हरिउ क्लेश विकार।
अब बुद्धि हीन मान के क्यों पवन को सुमिरन कर रहे।
क्या ये साँस पर ध्यान करने की बात नहीँ। जिसके बाद बल बुद्धि और विद्या आती।See Translation - Surendra Solanki चमार शब्द को धारण करने वाले लोग।
या कोई भी शब्द के साथ जीवन बिताते लोग। कोई भी बुद्धिहीन नही है। इसलिए शुद्र नही है।
हाँ खुद को शुद्र मान लेना। यही गलती है। जी चमार शब्द को इस्तेमाल करता है ।
क्योकि एक शब्द जो जाति कहा जाता है। वह आपको पूरा डिफाइन नही करता। केवल एक शब्द है।
कबीर दास सही कहे हैं।
जात न पूछो साधू की
पूछ लीजिये ज्ञान
मोल करो तलवार का
पड़ी रह ने दो म्यान।
अर्थात बुद्धिहीन अवस्था से बुद्धिमान बनने की कला को ज्ञान कहते हैं।See Translation - Surendra Solanki अगर साधना में वर्ण की स्तिथी देखनी होगी तो वह इस प्रकार होगी। जेसे मुझे समझ आ रही।
प्रथम अवस्था । शुद्र। मन भटकना साधना में न लगना।
द्वितीय अवस्था। साधक का सांस को चक्रों में ले कर क्रिया करना। पर अभी भी भटकाव क्योकि। चक्र सही से नही दिख रहे।
क्षत्रिय अवस्था। चक्रों पर ज्योति कम्पन और स्वर सुनाई देना । प्रणव बहुत अच्छे से सुन पाना।
ब्राह्मण अवस्था। अपने आप को आज्ञा चक्र और टॉप ऑफ़ हेड(सर के ऊपरी भाग) के बीच स्थापित कर लेना। ब्रह्म पुरुष जो दस अंगुल का है नाप के देख लें। उसमे समां जाना।
इसके अतिरिक्त वर्ण का वर्णन नही होगा मुझसे।See Translation
- Chandran Bahadur Sanjay jothe ji, Indra Deo Singh ji, I am a stanch Hindu But I am the son of north Indian kayestha and south Indian Brahmin woman thus a Chandal by ancient cast definition. I do not get any cast reservation thus I am not treated as untouchable. All that is worth accepting is only dharma and rest is nonsense. Bhagwan Shanker is also considered as untouchable by some idiots.
- Tribhuwan Singh @भगवान शंकर किरात यानि shcheduled tribe के रूप में क्षत्रिय अर्जुन को दर्शन देते हैं और अर्जुन को निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है ।इसको कैसे आज के भारत में व्याख्यायित करेंगे फलित चिंतक Chandran Bahadur सर ??
- Surendra Solanki त्रिभुवन जी।
जो देवता हम लोग पूजते हैं। जिन्हें भीलट देव कहा जाता है। उन्हें शिव जी का पुत्र कहा गया है।...See MoreSee Translation - Surendra Solanki समाज ने sc st लिस्ट को शुद्र मानने का आधार क्या है।
अब इस पर बहस करना चाहता।See Translation - Upadhyaya Pratibha आंबेडकर जी पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने आर्यों के बाहर से आने का खंडन किया था। फेसबुकिए दलित चिंतकों का मत तो इसके विपरीत है.See Translation
- Chandran Bahadur When the third eye of Shankar shall open all the darkness that is prevailing shall vanish.
- Surendra Solanki When the third eye of Shankar shall open all the darkness that is prevailing shall vanish.
तीसरी आँख को आज्ञा चक्र या कूटस्थ भी कहा जाता है।
देख चूका हूँ। इसलिए चर्चा को आध्यात्मिक रंग दे सकता हूँ।See Translation - Surendra Solanki प्रतिभा जी
ये फसबूकिये दलित चिंतक।
बुद्धि का इस्तेमाल करके बुद्धिहीन अवस्था का लबादा ओढ़े हुए हैं।
में पूरी कोशिश करूँगा। इनसे कहूं। आप शुद्र कैसे। क्या प्रमाण हें ।
आज जो चाहे वो दलित को इस्तेमाल कर रहा।
कोई अपनी अयोग्यता को योग्य सिद्ध कर के बोलने में रूचि नही ले रहा। क्यों।See Translation - Surendra Solanki आरक्षण कौन चाहता। सभी हाथ उठाते।
ब्राह्मण स्तर कौन बनेगा। सभी इधर उधर झांकते।See Translation
- Tribhuwan Singh आपने आज देखा कि फसबुकिया फलित चिंतक Sanjay Jothe जी आपकी बात से असहमत है Upadhyaya Pratibha जी।
वो तो उसी उलटे चिंतन को काट रहे हैं। - सरिता शर्मा ईसाई (यहूदी लॉबी के पैसे से कार्यरत) की पत्र पत्रिकाएं जब विषय लोगों के सामने लाती हैं तो महिषासुर की भक्ति याद आती है। न सिर्फ भक्ति अपितु 80% दलितों (??) के उद्धारक भी कह दिए जाते हैं जिसे .001% भी 80 प्रतिशत मानेंगे। पर तर्क कुतर्क करने कहां तक जाते हैं ये देख कर पता चलता है।
भारत सरकार के कर्मचारियों अधिकारियों को चार श्रेणी में बांटने पर आपत्ति नहीं उठाई है आश्चर्य। सरकार या प्रशासन में युद्ध की आशंका नहीं जताई। यहां तक कि विभागीय पदोन्नति व सीधे आने वालों में समान पद में भी समानता नहीं है यह याद नहीं आया।
ले देकर भारत में दलित दलित की बात कहते हुए न्यायालयों के आदेश के विरुद्ध जन आंदोलन के नारे, यह संकट नहीं सुविधा की लूट की लड़ाई है जो अब नए नए आरक्षित वर्गों तक पहुंचाने के लिए लूट के लिए लड़ी जा रही है। इसका भारत के सांस्कृतिक पक्ष से संबंध नहीं है, साधना पथ से संबंध नहीं है, आर्थिक व वैज्ञानिक चिंतन से संबंध नहीं है।
यह वह समूह हैं जो अमेरिका में एक अपराधी के लिए विद्यालयों में जाकर काले गोरे के भेद के नाम से संवेदना का व्यापार करते हैं। व्यवस्था को कमजोर करते हैं। इनकी चोटी पकड़ी हुई किसी और ने जो मनचाहे घुमाते हैं। अफ्रीका में तो सभी काले थे वहां कैसे भेद की राजनीति हुई यह देखें। हांगकांग में आज भी चीन के लोग पासपोर्ट वीसा दस्तावेज लेकर ही जा सकते हैं जबकि चीन का भाग है यह भेद करने वाले कौन हैं।See Translation 
- Madan Tiwary अंबेडकर जी त बुद्ध के जीवन चरित्र भी बदल दिए थे जिसको कोई नहीं पढ़ता यहाँ तक की बुद्धिस्ट भी । आर्य बाहर से नहीं आये थे ? अच्छा तोड़ाफोड़ी है इतिहास का । हाहाहाहा । हत्या और वध वाला । हाहाहाहा । अजी महाराज सबके आपलोग कूपमंडूके समझते है ?See Translation
- Surendra Solanki एक दलित चिंतक कोई भी हो सकता है।
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य कोई भी वर्ण हो सकता। पर शुद्र कदापि नही हो सकता।
क्योकि चिंतन करते हुए वो अपनी शुद्र अवस्था को त्याग कर देता।
शुद्र केवल बुद्धिहीन अवस्था है जिसके ऊपर बुद्धि आती ।
जो भी दलीत चिंतक अपने को शुद्र अवस्था में मानते वे अपनी बुद्धि से ही मानते। इसलिए शुद्र नहीँ हैं।See Translation - Tribhuwan Singh Nilu Kumari जी पहुँच के बाहर का दायरा है वो ।
मेरी पहुँच से दूर।
इसलिए नो कमेंट। - Tribhuwan Singh वैसे सिर्फ उत्सुकतावश कही इथोपिया का जिक्र तो नही है ? Nilu Kumari जी

- Madan Tiwary Nilu Kumari हु बहुत पढ़ती है । अब समझा । जी हाँ अफ्रिका से ही मानव सभ्यता का जन्म हुआ और भाषा का भी । मूल भाषा तीन थी शायद । चलिए आप तो कभी चाय भी नहीं पिलाएँगी मै ही तिलकुट भेज रहा हूँ इमेल से ।See Translation


- Madan Tiwary Surendra Solanki भाई मेरी तो खोपड़ी इतने सारे चिंतारत चिन्तको ने झनझन्ना दी खैर आपका नेह निमंत्रण है इसलिए कुछ चिंता हम भी प्रकट करते है आपलोगन उसपर चिंतन कीजिएगा चिता मत सजाने लगिएगा ।
दर्शन के स्तर पर शुद्र सवर्ण जैसा कुछ नहीं होता है कबीर दार्शनिक थे । दर्शन बौद्धिकता के मूल को प्रतिपादित करता है और जीवन को समझने को एक शैली विक्सित करता है । उसका घालमेल धर्म राजनीति के साथ न करे ।
धर्म के स्तर पर शुद्र वर्ण को व्यवस्था है जो एक विशेष कर्म करने वालो का था । कर्म का वर्गीकरण धार्मिक कवर देकर आपने कर दिया है उस फोटो में अच्छा बचाव है ब्राह्मण व्यवस्था का ।
आधुनिक काल में सबसे झाड़ू लगाने वाला । रिक्सा चलाने वाला या अन्य वैसे कार्य जो वर्ण व्यवस्था में यकीन रखने वाले निम्न स्तर का माने या करने में शर्म महसूस करे उसे करने वाले को भी आप शुद्र की श्रेणी में रख सकते है ।
राजनीतिक स्तर पर दलित उस वर्ग विशेष को प्रतिपादित करता है जिसकी बहुसंख्यक आबादी सामजिक आर्थिक शैक्षिक रूप से अन्य के बराबर नहीं है ।
अब दलित चिंतक की बात करे । चिन्तक सिर्फ चिंतक होता है ।
कुछ लोग अगर अपने वर्ग विशेष के लिए विशिष्ट चिंतन करते है तो उन्हें दलित चिन्तक की श्रेणी में रखा जाता है परन्तु वैसे लोग बहुत घातक होते है क्योकि उनका चिंतन समतामूलक समाज नहीं होता बल्कि टकराव होता है ।
आप लोग जिन चिन्तको की चर्चा कर रहे है अगर नाम लेकर करते तो बेहतर होता अन्यथा हमारे जैसे दलित चिन्तक भी उन्ही जातिय मच्छरों की श्रेणी में गिन दिए जा रहे है । खैर मै आपलोगों के इशारे को समझ गया हूँ । वे चिन्तक नहीं है बल्कि प्रोफेशनल है विशुद्ध प्रोफेशनल । उन्हें शरीर चाहिए गोरी सवर्ण महिला का लेकिन सम्मान चाहिए समाज सुधारक का ।
अब ज़रा दलित पर । दलित वर्ग सिर्फ कल्पना में है अभीतक वह वर्ग के रूप में परिवर्तित हुआ ही नहीं । वह आज भी ब्राहमणवादी जातिय व्यवस्था को जीता है और उसकी मानसिकता सामंती है ।
दलित वर्ग के निर्माण के लिए विभिन्न जातियों का पूर्ण समागम होना जरुरी है । उन्हें अपने जातिय पहचान को वर्ग में परिवर्तित करना पडेगा जो उनकी ब्राहमणवादी मानसिकता नहीं करने देती अन्यथा दलित वर्ग के होने का दावा करने वाली जातियाँ पहले आपस में शादी ब्याह का संबंध स्थापित करती वह भी सात फेरे वाली पद्धति से नहीं । आज चमार और डोम के बीच वैवाहिक संबंध नहीं स्थापित होता है और न वे इसके लिए प्रयास करते है या उनकी इच्छा है । हाँ उन्हें जातीय विभेद समाप्त करने का रास्ता सवर्ण गोरी महिलाओं के साथ विवाह में ही दीखता है ।
अब थोड़ा चाय पानी बाकी फिर कभी ।See Translation - Tribhuwan Singh Nilu Kumari ji खतरों के खिलाडी बनिए / विद्वानों के आतंक से न डरे /
- Tribhuwan Singh The great fertility of the soil
attracts many Europeans to these parts, and it was Sultan
Sujah's policy to encourage and conciliate the foreigners
settled in this province. He particularly favoured the
Portuguese Missionary Fathers, holding out a prospect
of future wealth to them all, and promising to build
churches wheresoever they might desire to have them
erected. Indeed these people were capable of rendering
the Prince essential service ; the Prankish families residing
in the kingdom of Bengale, whether half-caste 1 or of
Portuguese birth, amounting to eight or nine thousand, at
the lowest computation." From the book of Francosis Bernier . - Tribhuwan Singh the Prankish families residing
in the kingdom of Bengale, whether half-caste 1 or of
Portuguese birth, amounting to eight or nine thousand, at
the lowest computation." ये ..half-caste .क्या है भाई ? Sanjay Jothe जी - Tribhuwan Singh Neelam Shanker जी फिर ये दलित चिंतक ?? ये क्या आइटम हैं ।
- Chandran Bahadur Dalit chintak is the one who wants' to segregate the schedule castes and become their leader.
- Chandran Bahadur Bhagwan Shanker had given Shanker Acharya Darshna ss Chandal in Kashi. Tribhuwan ji.
- Anshuman Pathak Sanjay Jothe साहब आपकी वाल पर भी इसी पर चर्चा चल रही है मैंने आपको पुरुष शब्द का व्याख्या किया तो :-
आपने उसका व्यंग करते हुए कहा क़ि पुर अर्थात् ब्रम्हाण्ड तो ब्रम्ह क्या और एन्ड क्या ? ब्रम्हाण्ड का यही संधि विच्छेद होता है और इसकी क्या आवश्यकता थी ?
यजुर्वेद से प्रमाण दिया कि परमपुरुष अशरीरी है और आपको कहा आप शरीरी सिद्ध कर दीजिये वेदों से आप उस पर कुछ नहीं बोले ऊपर से बोले वो मुख से और कहाँ कहाँ से बच्चे पैदा करता है ?
मैंने पुरुष सूक्त के उसी मन्त्र की सूक्ति लिखी 'ब्राम्हणो अस्य मुखमासीद्' अब भैया इसमें पैदा होना कहाँ लिखा है तो आप इस पर कुछ नहीं बोले ....बोले ये कौन सा विज्ञान है कि यहाँ से पैदा किया वहां से किया....
****
अन्त में आपका बहुत सम्मान है मेरी/हमारी नज़रों में अगर आप दुराग्रह या हठ से ऊपर उठ कर विमर्श के इच्छुक हैं तो ठीक है वर्ना....
सादर नमस्तेSee Translation - Tribhuwan Singh जातं वंशे भुवनविदिते पुष्करावर्तकानां
जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोनः
तेनार्थित्वं त्वयि विधिवशाद् दूरबन्धुर्गतोऽहं
याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा:॥१.६॥ कालिदास के मेघदूतम से जात और वंश का उद्धरण /
मैं कितने दिन से लगातार कह रहा हूँ जाति (Caste ) नहीं जात ...जात
जात हमारी थे जाति उन्होंने हमें गुलामी के बदले में उपहारस्वरूप भेंट किया / - Er Narendra Nohar Dhruv आप भी सर गलत पत्थर पर सर फोड़ रहे हो.... कुछ क्रिएटिव और प्रोग्रेसिव पोस्ट करो.. वैसे सुरेन्द्र सर जो लिख रहे है बड़ा मज़ा आ रहा है उसे पढने में....See Translation
- Er Narendra Nohar Dhruv सर मैं भी चिंतक हूँ....मुझे तो दलित और ब्राह्मण दोनों की चिंता है तो क्योंकि दोनों की लड़ाई में देश का नुकसान हो रहा है। अब जितने भी चिंतक है इस पोस्ट पर सभी से कह रहा हूँ की अपने अपने चिंतन को थोड़ा साईड रखे और देश की चिंता करना चालू करे क्योंकि देश को अभी सभी की जरुरत है।See Translation
- Tribhuwan Singh Er Narendra N Dhruv जी कुछ ऐसा नहो है ।
मंथन के बाद ही मक्खन और अमृत निकलता है।
इस मंथन में आपका सुसगत है। - Tribhuwan Singh चलने दीजिये ।
हमें कौन सी जल्दी है।
आराम से बजायेंगे। - Tribhuwan Singh लेकिन अब चिंतित और चिंतक के फर्क को समझना पड़ेगा।
- Indra Deo Singh त्रिभुवन sir
आप " jat " और जाति " को
साफ़ साफ़ लोगों को समझाते चले । इस मानसिक गुलामी को तोड़ना एक युद्ध जीतने के बराबर है । ।See Translation - Tribhuwan Singh Indra Deo Singh सर मुझे सर न बोले ।
त्रिभुवन बोले या ज्यादा से ज्यादा डॉ त्रिभुवन ।
आग्रह । - Indra Deo Singh Allahbad की कुछ परम्पराओं को लेकर हम लोग प्रस्थान किये थे । एक दूसरे का ख्याल करना , सम्मान देना , जिंदगी में कभी हार न मानना , सर्वोच्च हासिल करना , अटूट मेहनत करना , । सुम्मन्त दा इन चीजो को खूब जानते हैं । उनकी आक्रामकता हमें आकर्षित करती हैं ।
यह सम्मान आपकी विद्वता , सीखने , आदि गुणों को लेकर है । यदि आप रोकेग तो हम " असहज तथा कुंठित " अनुभव करेगे ।
यह तो सायास ही सम्बोधित हो जाता है ।
विश्वाश है आप स्नेह बनाये रखेंगे । अपने अधिकार से वंचित नहीँ करेगे ।
आप काSee Translation - Tribhuwan Singh नहीं अग्रज ही निकलेंगे आप timeline से। इसीलिए आग्रह किया।Indra Deo Singh sir.
इलाहबाद की परम्परा में । - Surendra Solanki इंद्र जी।
में इस समस्या का हल खोज लिया है।
शुद्र बुद्धिहीन अवस्था है।
एक व्यक्ति में मन बुद्धि अहंकार और चित्त सब होता।
बुद्धि से अपने को बुद्धिहीन समझना ही दलित समस्या है।See Translation - Amit Kumar Nilu Kumari मैंने भी यही पढ़ा सारी दुनियाँ के इंसान एक अफ्रीकन माता की संतान हैSee Translation
- Prem Prakash · 43 mutual friends
१ . त्रीग्वेद मे न. १० लिखा है कि हम हैSee Translation
कि उत्तर
ध्रुव से आये हुये लोग है . आर्य –अनार्य
का युद्ध है
२. बाल गंगाधर टिळक ने किताब लिखा “
THE ARCTIC HOME
AT THE VEDAS “ हम बाहर से आये हुये लोग
है
३. जवाहर लाल नेहरू ने
‘DISCOVERY OF
INDIA” मे
लिखा कि हम मध्य आशिया से आये हुये...
लोग है. ये बात
कभी भुलना नही चाहिये ऐसे ३० पत्र
इंदिरा को लिखे जब ओ होस्टेल मे पढ
रही थी
४ “वोल्गा टो गंगा” मे राहुल संस्कृतीयान
“केदारनाथ
पाण्डेय” ने लिखा कि हम बाहर से आये हुये
लोग है
५ . सावरकर ने “सहा सोनेरी पाने” मे
लिखा कि बाहर से
आये हुये लोग है
६. इक्बाल “काश्मिरी पंडित” ने भी अपने
गीत “सारे जहा से अच्छा”
लिखा लिखा कि हम बाहर
से आये हुये लोग है
७. राजाराम मोहन राय इंग्लंड मे जाकर
भाषण दिया कि हजारो सालो से
घर छोडा था, मै अपने घर पर वापस आया है
इसी सन्दर्भ में अमेरिका के यूताहा विश्व
विद्यालय
(University Of Utaha ,Utaha,USA) के
शोध कर्ता माइकल
बमशाद (Michael
Bamshad) ने शोध करके
बताया की भारत देश के ब्राह्मण जात
का डी.एन.ए. (DNA) ९९.९६%,
क्षत्रिय का ९९.८८%
तथा वैश्य (बनिया) लोगों का डी.एन.ए.
९९.८४%
मध्यएशिया (Central एशिया), रशिया के
पास
जो 'काला सागर' (Black
Sea) है, वहां के
लोगों से
मिलता (match) है। यानि कि ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य
विदेशी लोग है। - Indra Deo Singh प्रेम प्रकाश जी
आप का मानसिक दिवालिया पन मैं देख कर हैरान हूँ।
जो d n a ki report है सादर आप उसकी लिंक बताये।
प्रो लाल जी सिंह जो डी न ए तकनीकी के जनक हैं ,चाचा हैं, कभी इसका mention नहीं किये।उसके लिए ,उनका एक अध्यन भारतीय जातियो को लेकर है, उसमे निष्कर्ष है इंडियन जातियां और जनजातीय यही की है बल्कि उनका विस्तार बाहर कीओर हुआ।See Translation - Chandran Bahadur Freedom to India came with an award that is these arguments and debates which would have lost their meaning if otherwise.
- Indra Deo Singh आपने उपरोक्त बाते एक दम सही कही है।
उसमे विरोधाभाष कत्तई नहीं हैं
सारे उपरोक्त साक्ष्य एक दूसरे के पूरक है।
आप सिर्फ उनको लिंक नहीं कर पा रहे है।
दूसरी बात, मैं संशोधन भी कर लूँगा, आदर के साथ, लेकिन,
प्रो विवेक कुमार की तरह विरोधी और सही विचारो
को erase नहीं करूँगा।यह डा Tribhuwan Singh की वाल है जो बहुत बड़े दिल के है।आप के logial विचारो को welcome किया जायेगा हैम लोग ऐसी नीच मानसिकता के नहीं हूँ कि दुसरए के विचरो को साफ कर दे।
हम लोग तो सभी प्रकार के विचारो और ब्यक्तियों
का स्वागत करते है।आखिर मानव मात्र सभी बराबर है।
चमार होना या ब्राह्मण होना, या कुछ और भी होना ,आपकी मानसिकता, रूचि, संकल्प, पर निर्भर करता है।See Translation - Indra Deo Singh शुद्र, ब्राह्मण. वैश्य आदि को समझनेके लिये आप
Surendra Solanki को उनकी time लाइन पर जा के study करे।आप के जिंदगी का भ्रम दूर हो जाइएगा।See Translation - Surendra Solanki धन्यवाद इंद्र जी
जो फ़ॉर्मूला मैंने निकाला हे वो सभी को अलग दिशा देता है।
समझने के लिए धन्यवादSee Translation - Arun Tripathi एक बेहद सार्थक विमर्श इस पोस्ट पे चल रही है।।।आप सभी को आहिस्ता से पढ़ रहा हूँ ।।।आप सभी को साधू वादSee Translation
- Indra Deo Singh Prem Prakash you have raised very good
Question
If you are present , I may give all answer of all ure questions
Tribhuwan Singh गीता
में लिखा गया है -" जन्मना जायते शूद्रः , संस्काराय द्विजः भवति /" यानी
जन्म से हर व्यक्ति शूद्र होता है ,,लेकिन जैसे जैसे उसके संस्कार चेतन
होते जाते हैं ,,वह द्विजता कि सीढ़ी चढ़ता जाता है /
गीता में शूद्रों के लिए लिखा गया है- "परिचर्यात्मकम् कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम" -- यदि स्वाभाव से शूद्र है तो उसका कार्य परिचर्या करना है /
कौटिल्य अर्थशाश्त्र में शूद्रों का धर्म बताया -" शूद्रश्य द्विजात शुश्रूषा वार्ता कारकुशीलव कर्म च \"
- वार्ता का अर्थ कौटिल्य के अनुसार --,"वार्ता --कृषि पशुपालन और व्यापार ,,वार्ता विद्या के अंग हैं-- यह विद्या धान्य , पशु , हिरण्य ,,ताम्र आदि खनिज पदार्थों के बारे में ज्ञान "
-कारकुशीलव - का अर्थ ..शिल्प विज्ञानं में expertise हासिल करना --जिसको आज कि भाषा में technocrate इंजीनियर ,,और न जाने कितने नामों से बुलाया जाता है -- यानि GDP क़ी रीढ़ .
अब बचता है --परिचर्या और शुश्रूशा ,,और संस्कार / संस्कार पर बाद में विमर्श आगे कहीं --आंबेडकर जी क़ी हाइपोथिसिस क़ी जब व्यख्या करेंगे / अभी --परिचर्या और शुश्रूशा का अर्थ संस्कृत ग्रन्थ से /
"अमरकोश" के अनुसार --द्वितीयं कॉन्डम -ब्रम्हवर्ग -७ श्लोक ५ के अनुसार --
चत्वारि श्रुशूषायाः - वरिवस्या तू शुश्रूषा परिचर्या उपासना /
-वरिवस्या का अर्थ तो हम भी नहीं जानते ,,(अगर आप बता सकें तो ,,ज्ञानवर्धन करे) ,,लेकिन शुश्रूषा, परिचर्या, उपासना, शब्दों का अर्थ तो आप भी जानते हैं /
तो फिर ,,डॉ आंबेडकर द्वारा वर्णित --शूद्रों के लिए --menial जॉब ?? कहाँ से आया ?? कहीं से तो लिया होगा डॉ आंबेडकर ने ,,,क्योंकि संस्कृत तो उनको आती नहीं थी ,,तो फिर संस्कृत के विद्वान क्रिश्चियन से ,,अंग्रेज अधिकारी ,,इतिहासकार ,,या फिर किसी संस्कृतज्ञ पादरी से ??
गीता में शूद्रों के लिए लिखा गया है- "परिचर्यात्मकम् कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम" -- यदि स्वाभाव से शूद्र है तो उसका कार्य परिचर्या करना है /
कौटिल्य अर्थशाश्त्र में शूद्रों का धर्म बताया -" शूद्रश्य द्विजात शुश्रूषा वार्ता कारकुशीलव कर्म च \"
- वार्ता का अर्थ कौटिल्य के अनुसार --,"वार्ता --कृषि पशुपालन और व्यापार ,,वार्ता विद्या के अंग हैं-- यह विद्या धान्य , पशु , हिरण्य ,,ताम्र आदि खनिज पदार्थों के बारे में ज्ञान "
-कारकुशीलव - का अर्थ ..शिल्प विज्ञानं में expertise हासिल करना --जिसको आज कि भाषा में technocrate इंजीनियर ,,और न जाने कितने नामों से बुलाया जाता है -- यानि GDP क़ी रीढ़ .
अब बचता है --परिचर्या और शुश्रूशा ,,और संस्कार / संस्कार पर बाद में विमर्श आगे कहीं --आंबेडकर जी क़ी हाइपोथिसिस क़ी जब व्यख्या करेंगे / अभी --परिचर्या और शुश्रूशा का अर्थ संस्कृत ग्रन्थ से /
"अमरकोश" के अनुसार --द्वितीयं कॉन्डम -ब्रम्हवर्ग -७ श्लोक ५ के अनुसार --
चत्वारि श्रुशूषायाः - वरिवस्या तू शुश्रूषा परिचर्या उपासना /
-वरिवस्या का अर्थ तो हम भी नहीं जानते ,,(अगर आप बता सकें तो ,,ज्ञानवर्धन करे) ,,लेकिन शुश्रूषा, परिचर्या, उपासना, शब्दों का अर्थ तो आप भी जानते हैं /
तो फिर ,,डॉ आंबेडकर द्वारा वर्णित --शूद्रों के लिए --menial जॉब ?? कहाँ से आया ?? कहीं से तो लिया होगा डॉ आंबेडकर ने ,,,क्योंकि संस्कृत तो उनको आती नहीं थी ,,तो फिर संस्कृत के विद्वान क्रिश्चियन से ,,अंग्रेज अधिकारी ,,इतिहासकार ,,या फिर किसी संस्कृतज्ञ पादरी से ??
Tribhuwan Singh डॉ
आंबेडकर ने लिखा है कि -"शान्तिपर्व में राजनीति कि शिक्षा देते हुए भीष्म
युधिस्ठिर को समझाते हैं कि उनके मंत्रिमंडल में कौन कौन लोग हों ? तो
भीष्म कहते हैं - चार ब्राम्हण ,जो वेदों में निष्णात हों ,और चरित्रवान
हों , 8 क्षत्रिय जो युद्धकला में पार...See More
Sanjay Jothe आप
मुद्राराक्षस को पढ़िए ... डाक्टर हरिनारायण ठाकुर कीकिताब में उल्लेख है
... किताब का नाम है - दलित साहित्य का समाज शास्त्र ... इसकी भूमिका
कमलेश्वर ने लिखी है और बहुत अकादमिक ढंग की किताब है ... http://books.google.co.in/.../%E0%A4%A6%E0%A4%B2%E0%A4%BF...See Translation
Tribhuwan Singh Shalini Khattar Mehta जी ज्ञान और विज्ञानं को समझना पड़ेगा ।
दोनों अलग विधाए है ।
मैं विज्ञानी हूं ।
मुझसे ज्ञान के बारे में पूंछेंगे तो कैसे बताऊंगा।
फिर या तो पूंछने वाला मूढ़ है या मैं ।
दोनों अलग विधाए है ।
मैं विज्ञानी हूं ।
मुझसे ज्ञान के बारे में पूंछेंगे तो कैसे बताऊंगा।
फिर या तो पूंछने वाला मूढ़ है या मैं ।
Tribhuwan Singh Prem Prakash जी ऋग्वेद न 10 में क्या लिखा है ?
जरा वो श्लोक लिखे प्रभु।
क्योंकि वो संस्कृत में है तो आग्रह है क़ि ओरिजिनल लिख दे। जिससे हम भी समझ ले कि आपकी समझदानी की गहराई कितनी है।
जरा वो श्लोक लिखे प्रभु।
क्योंकि वो संस्कृत में है तो आग्रह है क़ि ओरिजिनल लिख दे। जिससे हम भी समझ ले कि आपकी समझदानी की गहराई कितनी है।





















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