- Tribhuwan Singh "The rise and fall of the great powers" - पॉल कैनेडी द्वारा लिखे पुस्तक के P. 149 पर एक बेल्जियन इकोनॉमिस्ट पॉल बैरोच द्वारा तैयार एक डाटा प्रकाशित किया गया है। वो बेहद रुचिकर और ज्ञानियों के चक्छु खोलने वाला है ।
Table.6 Relative shares of World Manufacturing Output 1750-1900
में पब्लिश की गयी रिपोर्ट के अनुसार 1750 में पूरे यूरोप का उत्पादन विश्व उत्पादन का 23.2% था और भारत अकेले का उत्पादन 24.5 % था।
ब्रिटेन का योगदान मात्र 1.9% था। - Tribhuwan Singh अब 1900 को देखिये
यूरोप अकेले 62.0%
ब्रिटेन 18.5%
भारत 1.7%
पूरे विश्व उत्पाद का ।यानी massive Fall of economy of of India
And rise of west . - Tribhuwan Singh विश्व सकल उत्पाद में भारत का योगदान datawise
1750-----24.%
1800------19.7%
1830-------17.6%
1860-------8.6%
1880--------2.8%
1900--------1.7% - Tribhuwan Singh अब एक दूसरा डाटा उसी पुस्तक से पॉल बैरोच का।Table 7.
Per capita level of Industrialisation :
1750 में
Europe as a whole---- 8
UK––------------------------ 10
USA–-----–------------------ 4
India----–---------------------7
अब per capita industrial isation in 1900
Europe as whole --35
UK--–--100
USA-----69
India------1
A massive de indusyrialition of India
यानी बेरोजगारी का चरम 150 वर्षों में। - Tribhuwan Singh Per capita de industrialisation in India
1750--7
1800--6
1830--6
1860---3
1880---2
1900---1 - Tribhuwan Singh यानी हिंदी में समझाया जाय तो यदि 1900 में मात्र 1 व्यक्ति भारत में उत्पादन व्यवसाय में कार्य करता था तो 1750 में 700 लोग उत्पादक रोजगारों में employed थे।
यानी अगर कोई statistic वाला व्यक्ति इस पेज पर हो तो वो जनसँख्या के अनुपात में कितने लोग बेरोजगार हुए , बता सकता है । जो लोग हजारों वर्षों से अपने तकनीकी ज्ञान की वजह से खुशहाल रहे होंगे। सोचिये क्या हुवा होगा उनके परिवारों का और भावी वंशजों का। न रोजगार है तो रहने का खाने का ठिकाना ही नहीं ।
तो शिक्षा की कौन सोचेगा??
कुछ पल्ले पड़ा भाइयों ??
ये काम ब्राम्हणों ने किया ??? - Sumant Bhattacharya Tribhuwan Singh भाई बहुत समृद्ध जानकारी से लैस हो रहा हूं, आपको पढ़ के। धन्यवादSee Translation
- Tribhuwan Singh जारी रखें की बंद कर दें ।
- Sumant Bhattacharya Tribhuwan Singh शर्मिंदा ना करे,.वह भी सार्वजनिक तौर पर। आपके एक कमेंट को मैं पोस्ट बनाने की इजाजत चाहूंगा..दिन में किसी वक्त पोस्ट लगाने की बदनीयत है मेरी। सादरSee Translation
- Tribhuwan Singh सुमंत भाई यहाँ कार्ल मार्क्स के एक लेख को उद्धृत करना उचित होगा ।1853 में नेव्योर्क ट्रिब्यून में प्रकाशित किया था ।वो भी मेरी बात का समर्थन करते हैं ।
- Tribhuwan Singh जरूर लगाये । मेरी इज्जताफ्जाई होगी।
- Tribhuwan Singh 8 परिवार में से मात्र 1 परिवार के पास रोजगार बचा।150 सालों में यानि 1900 में। अभी गाँधी आंबेडकर ज्योतिबा फुले आदि को भारतीय राजीनीति में आने में 15 साल से 30 साल लगने वाले है जो अन्तिब्रम्हानिस्म को ऋग्वेद के पुरुष शुक्ति मनुस्मृति और नारद स्मृति को संदर्भित करके चांडाल से भंगी के रिश्ते को स्थापित करेंगे। आंबेडकर ने तो नहीं कहा लेकिन दक्षिण के दलित आन्दोलन के अगुवा (नाम विस्मृत हो रहा है ) जो ये कहने वाले हैं इन्ही बेरोजगारों और विपन्न लोगों से की तुम्हारी दुर्दशा के कारन अंग्रेज नहीं है बल्कि ब्रम्हाण और ब्रम्हान्वाद है । इसलिए सांप और ब्राम्हण एक साथ मिलें तो पहले ब्रम्हाण को मारो बाद में सांप को ।
- Tribhuwan Singh धन्यवाद बॉस एक किताब लिख मारूं क्या ??? हा हा हा
- Tribhuwan Singh मैं न तो पत्रकार हूँ न ऐसी बिरादरी जे जुदा व्यक्ति।
- Arun Kumar ज्ञान, क्या पत्रकारों की जागीर है? आप लिखें और जरुर लिखे।आपका ज्ञान आने वाले समय का धरोहर है।See Translation
- Tribhuwan Singh सुमंत दा की इसी पोस्ट को और इन्ही कोम्मेन्ट्स को टीप दू तो एक पुस्तक न सही पुस्तिका जरूर बन जायेगी।
गाँधी की हिन्द स्वराज इसी विधा में लिखी हुई है ।हा हा हा - Tribhuwan Singh मेरी इस निष्कर्ष का कार्ल मार्क्स ने भी समर्थन किया है ।हालांकि ये बात सुनते ही कई वामपंथियों को ह्रार्ट अटैक हो जाएगा।
- Tribhuwan Singh क्योंकि वामपंथ और दलित्चिन्तकों की टोटल वैचारिक पूँजी भारत भार्तीयता और ब्रम्हानिस्म विरोध पर टिकी है। जैसे पाकिस्तान का अस्तित्व भारत विरोध भर ही है।
- Tribhuwan Singh किसी ने मोहनदास नैमिशराय का नाम सुना है जिन्होंने महानायक बाबा साहेब डॉ आंबेडकर नामक पुस्तक लिखी है। इतनी घटिया भाषा गाँधी जी के लिए इस्तेमाल की है कि क्या बताऊँ।
- Tribhuwan Singh Padhane लायक है भी नहीं। कूड़ा है । हांलांकि वे महान दलित चिन्तक होंगे यदि गाँधी को गरिया रहे हैं।
- Tribhuwan Singh मार्क्स ने १८५३ ( आर्थिक इतिहास के क्रोनोलॉजी को ध्यान में रखें ) में अपने लेख में लिखा की भारत सामाजिक पृष्ठिभूमि का वर्णन किया फिर कहा कि -(१) भारत एक ऐसा राष्ट्र है, जहाँ प्रोडूसर यानि मैन्युफैक्चरर और कंस्यूमर दोनों ही एक हैं , यानि कंस्यूमर ही मैन्युफैक्चरर है , और मनुफकरेर ही कंस्यूमर है , खुद ही निर्माण करता है और खुद ही इस्तेमाल करता है ,,यानि हर गावं एक स्वतंत्र आर्थिक इकाई है / इसको उसने "एशियाटिक मॉडल ऑफ़ प्रोडक्शन' का नाम दिया / किसी भी तरह के वर्गविशेष द्वारा किसी वर्गविशेष के शोसण का जिक्र नहीं है /
(२) ईस्ट इंडिया कंपनी ने कृषि को नेग्लेक्ट किया और बर्बाद किया
(३) ब्रिटेन जो कि इंडियन फैब्रिक इम्पोर्ट करता था ,,,एक एक्सपोर्टर में तब्दील हुवा /
(५) भारत के फाइन फैब्रिक मुस्लिन के निर्माण का नष्ट होने के कारन १८२४ से १८३७ के बीच ढाका कि फैब्रिक मैन्युफैक्चरर आबादी १५०,००० से घट कर मात्र २०,००० रह गयी / अब कोई फैक्ट्री तो होती नहीं थी उस वक़्त , इसलिए सब मैन्युफैक्चरिंग घर घर होती थी ./
(६) हालांकि सब ठीक है ,,लेकिन ये जनमानस गायों और बंदरों (हनुमान जी ) कि पूजा न जाने कब से करते आ रहे है ,, इसलिए ये semibarbaric सभ्यता है ,,और जो अंग्रेज कर रहे हैं यद्यपि पीड़ादायक है , लेकिन क्रांति अगर लानी है तो इस सभ्यता को नष्ट कर अंग्रेजों को उसमे पाश्चात्य matrialism की नीव रखने का अतिउत्तम कार्य कर रहे हैं ?? - Tribhuwan Singh link pl ...more articles might have been written but I read only one ...https://www.marxists.org/archive/marx/works/1853/06/25.htm
- Tribhuwan Singh मार्क्स एक नास्तिक था उसको क्रिश्चियनिटी से उतनी ही दूरी बनाके रखनी चाहिए थी जितनी हिंदूइस्म से /
लेकिन क्यों कहा उसने ऐसा , ये तो वही जाने लेकिन आधुनिक मार्क्सवादी वामपंथी और लिबरल्स अभी भी उसी फलसफा पर का अनुसरण कर रहे हैं / - Tribhuwan Singh मार्क्स ने गाय और हनुमान कि पूजा करने वालों को सेमी barberic कहा, लेकिन १५०० से १८०० के बीच यूरोपीय christianon ने २०० मिलियन (२० करोड़ हुए न ) मूल निवासियों कि अमेरिका में मार दिया ,,वो दैवीय लोग थे ?? इस न मार्क्स ने कुछ बोला कभी न उनके उत्तराधिकारिओं ने /
- Tribhuwan Singh अब दो मूल प्रश्न :
(१) जो लोग ढाका जैसे शहरों से बेरोजगार होने के कारण भागे शहर छोड़कर, वो कहाँ गए ?? और क्यों गए ?? मेरा मानना है वो गाओं कि और गए , जहाँ उन्हें प्रताणित नहीं किया गया बल्कि शरण दिया लोगों ने /
(२) आप जानते हैं शहर में रहना महंगा है , कपड़ा लत्ता घर माकन और भोजन अगर कोई बेरोजगार है तो शहर में जिन्दा नहीं रह सकता / गावं में लोगों ने उनको कहा एक छोटा सा घर बनवा लो , रहो और खेती बाड़ी में मजदूरी करो या मदद करो / क्योंकि गावं में आप एक लुंगी या चड्ढी में भी बसर कर सकते हैं/ श्रीलाल शुक्ल के रागदरबारी का शनिचर सिर्फ चड्ढी और बनियान में ही रहता था प्रधान बनाने के बाद भी /
इस तरह एक स्किल्ड और enterpreuner तबका एक मजदूर वर्ग में तब्दील हो गया / इसी तथ्य में आंबेडकर का उस प्रश्न का भी उत्तर छुपा है , जिसमे उन्होंने कहा कि यद्यपि स्मृतियों में मात्र १२ अछूत जातियों का वर्णन है , लेकिन govt कौंसिल १९३५ ने ४२९ जातियों को अछूत घोषित किया गया है / और आप अनुमान लगाये ७०० प्रतिशत बेरोजगार कितनी बड़ी जनसँख्या होती है /
जो लोग गावं में रहे हैं वो जानते हैं कि उंडे दादा परदादा बातबते थे कि हमने फलने फलने को बसाया / बसाया तो कौन लोग थे, जो उजड़कर दुबारा बसने गए थे ?? वो वही लोग हैं "७०० % बेरोजगार स्किल्ड मन्फक्टुरेर ऑफ़ इंडिया ". - Tribhuwan Singh to phir likhana band karta hoon plagiarism ka jmana bad fast hai ??
- Tribhuwan Singh कहानी जम रही है दादा कि नहीं / Sumant Bhattacharya
- Tribhuwan Singh Arun Kumar ji plagiarism ka dar hai mujhe /
- Tribhuwan Singh aapne dara diya ..
- Tribhuwan Singh Arun Kumar आपकी राय पर इसको ब्लॉग में संकलित कर रहूँ क्योकि सरस्वती जी हमेशा कृपा नहीं रहती ख़ास तौर पर जब कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा जोड़ रहे हैं तो ?
- Tribhuwan Singh thanks ...main isko jas ka tas sankalit kar raha hoon ..shayad ek nayi vidha ka janm ho thans dada
- Tribhuwan Singh Arun kumar ji It has started one of my freings of fb have started posting jas ka tas by has name ..I requested him to atleast write my name ..
- Tribhuwan Singh अब कहानी को मंथर गति से आगे बढ़ाते हैं ..अगर १९०० तक भारत के स्किल्ड कारीगर और व्यापार से जुड़े अन्य लोग, जो विश्व के सकल घरेलु उत्पाद में भारत की २५% हिस्सेदारी, कम से कम angus maddison के आंकड़ों से अनुसार पिछले १७५० साल तक बरकरार रखा , और जो १९०० आते आते मात्र १.८% तक सिमटकर रह गया , उनकी काम कौशल के साथ जीविका और जीवन भी बदल गया/ जो निर्माता से मजदूर में तब्दील हो गया ,,,क्या वो मनुस्मृति या वेदों में लिखे कुछ श्लोकों के कारन हुवा?? क्या दलित चिंतक समाज के अर्थशास्त्र को समाज की से मिलकर देखने का साहस रखते हैं ?? आजादी आते आते और ५० साल लगभग गुजर गए ,,और इन ५० वर्षों में और भी स्किल्ड लोग बेरोजगार, और बेघर हुए होंगे /
क्या ये ब्राम्हणवाद की देन है ??
बंगाल में आजादी के पूर्व करीब ४० से ज्यादा बार सूखा पड़ा ,,जिसमे करोणों लोग मरे / कौन लोग थे ??
इस भयानक दुर्दशा से अगर कोई अपने आपको बचा पाया होगा तो वो रहे होंगे किसान ,, और वो भी वही किसान,जो जमींदारी प्रथा और टैक्सेशन से अपने आपको बचा पाएं होंगे / पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक बहुत बड़ा वर्ग दलित वर्ग में आता है , और संविधान प्रदत्त आरक्षण का लाभ भी लेता है , बहुतायत से उसमे मेरे मित्र भी हैं , लेकिन वो सैकड़ों बीघो के जमीन के मालिक हैं / कैसे हैं वे इतने बड़े काश्तकार होते हुए भी दलित ?? क्या ये विसंगतियां दिखती नहीं लोगों को ?? इससे ज्यादा ईमानदार चिंतक तो आंबेडकर जी थे ,जिन्होंने स्मृतियों में वर्णित और कौंसिल ऑफ़ इंडिया में लिस्टेड S C जातियों की विसंगत्यों पर एक ईमानदार प्रश्नचिन्ह तो खड़ा किया / - Tribhuwan Singh अब आइये उस बात की चर्चा करें की भारतीय समाज को टुकडे टुकडे में कैसे बांटा प्रशासन ने और पादरियों ने। कैसे स्वास्तिक जर्मनी के हिटलर और सैनिकों
- Tribhuwan Singh के बांह पर सुशोभित हुवा । कैसे ब्राम्हण वाद की फलसफा ने जन्म लिया?? क्यों जरूरत पड़ी इन सबकी।
- Tribhuwan Singh १८५७ के संग्राम में इतने अंग्रेज मारे गए की पंजाब के राजघराना जो कि अभी राजनीती में सक्रीय हैं , दूसरे सिंधिया घरानों ने अगर अंग्रेजों कि मदद न कि होती तो शायद उसी समय भाग गए होते / लेकिन १८५७ कि पुनरावृत्ति न हो इस लिए सबसे पहला काम किया उन्होंने कि योजना बद्द तरीके से भारत में न सिर्फ हिन्दू मुस्लिम भेद , पैदा किया बल्कि हिन्दू समाज को िाटने हिस्सों में बाँट दो कि वे एक न हो सके / ये अघोषित राजनीतिक योजना थी / दूसरे कुछ वर्षों के लिए मिशनरियों के क्रिया कलाप पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया/ क्योंकि सेना में उच्च पदों पर बैठे अधिकारी खुले आम सिपाहियों के हिन्दू धर्म को नीचा दिखाया करते थे , इसलिए सेना में काफी असंतोष रहा करता था /
अब बात ये है कि सिर्फ हिन्दू समाज को ही क्यों बांटना था ?/ क्योंकि १८५७ के संग्राम में मैक्सिमम हिस्सेदारी हिन्दुओं कि ही थी // १८५७ के पहले सेना में सभी वर्ण के लोग एक साथ थे / मंगल पण्डे तो याद ही होंगे आपलोगों को /
तो पहला काम था सेना का regimentation करना / जिसके बाद उन्होंने राजपूत बटालियन सिख रेजिमेंट , मराठा रेजिमेंट , इत्यादि खास तौर पर उन वर्गों को सेना में शामिल किया, जिन्होंने अंग्रेजों कि १८५७ में मदद क़ी थी / खास तौर पर ब्रामणो को सेना से बाहर किया ,,और ये ख्याल रखा कि जवान जो रखे जाय उनकी पारिवारिक पृष्ठिभूमि ,और उनके कोई रिश्तेदार आर्मी में हैं कि नहीं / एक नया शब्द कॉइन किया गया --मार्शल रेसेस जिनमे क्षेत्रों और सिखों को रखा गया / - Tribhuwan Singh कितने लोग इस बात से आज तक भी सहमत हैं कि आर्य बाहर से आये, खास तौर पर सेक्युलर गैंग और दलित चिंतक /
पहले आर्यों की बात की जाय : विलियम जोन्स ने १७९९ में संस्कृत को कहा कि ये रोमन और लैटिन से अच्छी परिष्कृत और व्याकरण युक्त भाषा है , और ठीक लगभग एक शताब्दी बाद मॅक्समुल्लर (१८२३-१९००) ने ये खोज निकला कि संस्कृत एक यूनिक भाषा है और इस भाषा का यूरोप के महान races नस्लों से बहुत पुराना रिश्ता है / एक कम्पलीट U टर्न विल्लियम जोंस से / इस बीच संस्कृत के ग्रंथों का इंग्लिश और जर्मन इत्यादि भाषाओँ में अनुवाद होने लगा था / एक नए सामजिक विज्ञानं का जन्म हुवा जिसको philology नाम दिया गया जिसका उद्देश्य ही संस्कृत भाषा का अध्यन से था / अब ढेर सारे विद्वान संस्कृत का िनरपरेटशन करने लगे / उसमे जर्मन सबसे आगे थे / मॅक्समुल्लर एक जर्मन था ,,जिसने कभी जर्मन भाषा में कोई लेख नहीं लिखा , और न ही एक तथा कथित संस्कृत विद होने के बाद संस्कृत में एक वाक्य लिखा है /
लेकिन हमारे यहाँ उसको इतना सम्मान दिया गया कि अभी भी किसी बड़े शहर में मॅक्समुल्लर भवन नामक संस्था और बिल्डिंग है /
मॅक्समुल्लर प्रथम विद्वान था जिसने ये कहानी गाढ़ी आर्य बाहर से आये / - Tribhuwan Singh कितने लोग इस बात से आज तक भी सहमत हैं कि आर्य बाहर से आये, खास तौर पर सेक्युलर गैंग और दलित चिंतक /
पहले आर्यों की बात की जाय : विलियम जोन्स ने १७९९ में संस्कृत को कहा कि ये रोमन और लैटिन से अच्छी परिष्कृत और व्याकरण युक्त भाषा है , और ठीक लगभग एक शता...See More - Tribhuwan Singh @Arun कुमार जी कुछ जोड़ें।। या व्यक्त करें ।
- Arun Kumar सुमंत जी का वाल बहुत ज्ञानी,हमारे जैसे अल्प ज्ञानी का अखाडा है। सभी का वर्जिस हो रहा हैSee Translation
- Tribhuwan Singh अरे कुछ बोलिए तो -- अपने विचारों को रखिये तो ।
- Arun Kumar आप इतिहास के बिखरे हुये पक्षों को अपने अध्ययन से संकलित कर रहें हैं। प्रयास सराहनीय है। मै केवल साधुवाद ही कहने की स्थिति मे हुँSee Translation
- Tribhuwan Singh अरुण जी आप ही हौसला अफजाई कर रहे हैं ,, इसलिए ये प्रश्न आप से ही है ..सूत्रधार तो सूत्र बता दिए,जैसे हमारे क्षेत्र जीवन में गुरुवर लोग बताते थे/
और छोड़ दिए छुट्टा हम लोगों को, उस सूत्र के आधार पर पिछले १५० सालों में यूरोपियन, क्रिस्चियन पादरियों और बाद में वामपंथियो और दलितचिंतकों के dwara फैलाये गए भ्रमजाल और अनाधार ब्राम्हणविरोधी आंदोलन के खिलाफ लड़ने के लिए Arun Kumar - Arun Kumar आपको सत सत नमन मेरे भावना को समझने के लिये। सभी चिंतक लकीर पीट रहें है साँप कहाँ है कौन है किसको काटा कब काटा क्यों काटा ,कोई नहीं समझने का कोशिश कर रहा।बस लकीर पीट रहें है।See Translation
- elongs to eminent journalist Sumant Bhattacharya , who must have communists , leftists and Dalit chintaks in his freind list on FB , who blabber day and night against Brahmanism in every place , where they get space to demonize Indian culture and civilization . Where they are ?? either they left this page ?? or busy in preparing for diwali/kali pooja ,,, when some article may come out ,,as why this should be celebrated ,, as Aryan Ram came back to ayodhya after killing a Dravidian Rawana ...or why Goddess Kali danced over a Tribal God Shiva, as Dalit God or leader in current times ...as it was published in favour of Mahishasur in some eminent journal , against Durga pooja, as it is unhuman to killi any creature , even a Mahish ...a Male bufallow ..painted as a Asur by Bramhins ,Even she may be Goddess Durga .
- Arun Kumar अभी तक मै जितना सुमंतजी को समझ पाया हुँ मुझे पूर्ण विश्वास है सुमंतजी पर और उनके क्षमता पर। आप आगे चलें कारवाँ बन जायेगा।See Translation
- Arun Kumar Sumant G, pl. do something positive on ds issues
- Tribhuwan Singh आपको ये जानकार बड़ा आश्चर्य होगा की आर्य भारत में बाहर से आये । इस मिथ को फैलाने में ज्यादातर जेर्मन विद्वान थे। मक्स्मुल्लर ईस्ट इंडिया कंपनी का paid एम्प्लोयी था। जिसको ईस्ट इंडिया co ने भारतीय संस्कृत टेक्स्ट को अनुवादित करने का पेज to पेज बेसिस पर न...See More
- Tribhuwan Singh इन विद्वानों के नाम अगर गिनाये तो J G Herder (1744-1803)
Karl Wilhelm Fredrich Schegel (1772-1829)
Ernest Renan...See More - Tribhuwan Singh इनको गूगल करिए और डिटेल में पता चल जाएगा इनके बारे में।
- Tribhuwan Singh अब सोचिये तमाम जर्मन को भारत संस्कृत और आर्यों में क्यों रूचि थी।
क्योंकि उनको भारत और संस्कृत से क्या लेना देना ? उनका तो भारत पर कोई कब्ज़ा नहीं था। - Tribhuwan Singh इसके पहले कुछ शब्द philology पर जो बाद में Indology और orientalism के नाम से पुकारा गया।
ये संस्कृत,भारत के बारे में अध्यन करने की विधा को कहते हैं । - Tribhuwan Singh willium Jones और उसके बाद अन्य संस्कृत के विद्वानों ने संस्कृत को indoiranian indoeuropean और बाद में Indogerman भाषा में स्थापित के पीछे जर्मनी christianty और इंग्लॅण्ड के क्या इंटरेस्ट थे ??
संस्कृत सारी भाषाओँ की माँ (Sanskrit is mother of all languages) ,की अवधारणा ने शायद तभी जन्म लिया होगा। संस्कृत कैसे यूरोपियन भाशाओं अरबिक और hebrew की जननी हो सकती है। - Tribhuwan Singh इन तीनो के इंटरेस्ट अलग अलग होते हुए भी एक कॉमन फैक्टर था इनमे - christianity और उसकी superiority को हिंदूइस्म से ऊपर सिद्ध करना।
- Tribhuwan Singh संस्कृत का पतन तो तभी हुवा जब मैकाले ने शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी बनाई। संस्कृत को पढ़कर आर्य द्रविड़ बंटवारे की शुरवात हुई।
Tribhuwan Singh Paul
bairoch says -- a horrifying state of affair , whereas in 1750 per
capita industrialisation in Europe and third world was not too far apart
from each other , but by 1900 , later was only one eighteenth (1/18) of
Europe and one fiftieth (1/50) of UK.
Arun Kumar Tribhuwan
G, surgery जरुरी है।वामपंथी बुरा मानें या दक्षिणपंथी ।दलित चिंतक या
ब्राह्मणवादी।नासूर खत्म करना होगा।कब तक इस ग्रंथीयों को लेकर लोग बाग
अपने राजनीति करते रहेंगे।See Translation
Tribhuwan Singh Arun Kumar ji aur Sumant Bhattacharya
ji आपके कहने पे मैंने ये ब्लॉग संकलित करना शुरू किया है / सुमंत दा आपका
टाइटल ही मैंने चुराया है / अगर ऐतराज हो तो बदल दूँ कृपया चेक करें और
बताये कि इस में और सुधर संभव है क्या?
Tribhuwan Singh भारत
के हिन्दू समाज को बाँटने का सिलसिला शुरू हुवा "आर्य " और "द्रविड़"
बंटवारे से / नार्थ साउथ विभाजन ,,क्योंकि दक्षिण में क्रिस्चियन मिशनरीज
काफी पहले से आ गयी थी परन्तु धर्म परिवर्तन में सफल नहीं हो प् रहीं थी /
शेरिंग पादरी के frustation का जिक्र ऊपर किया जा चूका है / इस लिए सबसे
पूर्वे भारत को उत्तर और दक्षिण भारतीयों में बांटा और उसमे वे सफल रहे /
यानी आर्य और द्रविड़ /
Tribhuwan Singh thanks ...but I am amazed that this page b
Tribhuwan Singh मैं
सोच रहा था कि आर्य संस्कृत को यूरोपियन च्रिस्तिएनों के द्वारा कैसे
खद्यन्त्र कारी तरीके से पोषित और दुस्प्रचारित किया गया , इसको थोडा
संक्षिप्त रखू ।लेकिन Sumant Bhattacharya ji ke पेज पर आर्यों द्वारा महिषासुर का वध जैसा कोई लेख आया है।
यानी अभी भी उन दुस्प्रचारों को जारी रखा जा रहा है। इसलिए इसको थोडा विस्तार देना चाहिए।
यानी अभी भी उन दुस्प्रचारों को जारी रखा जा रहा है। इसलिए इसको थोडा विस्तार देना चाहिए।



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