- Tribhuwan Singh आदि शंकराचार्य ने सम्पूर्ण भारत में अलग अलग दिशाओं में चार मठों कि स्थापना के पश्चात ,,उसमे नैष्ठिक ब्रम्ह्चहारियों ( जो जीवन भर मठों में ही जीवन व्यतीत करे ) को दस नाम से सम्बोधित किया ...जिसको आप आज अखाड़ों को दसनामी अखाड़ों के नाम से जानते है :
तीर...See More - Tribhuwan Singh //मठाम्नयाय - महानुशासन //
प्रथमः पश्चिमामन्यायः शारदा मठ उच्च्यते /
कीटवार सम्प्रदायः तस्य तीर्थाश्रमौ पड़े // १//
सिंधु-सौवीर -सौराष्ट्र - महाराष्ट्रः तथान्तराः /
देशाः पश्चिमदिगवस्थताः ये शारदामठ भागिनः //५//
अर्थात प्रथम मठ पश्चिम में है , जिसको शारदा मठ के नाम से जानते हैं /
इसका सम्प्रदाय कीटवार है , और इसके नैष्ठिक ब्राह्यणों को तीर्थ और आश्रम पद प्राप्त है /
सिंधु -सौवीर -सौराष्ट्र - महाराष्ट्र और इनके आसपास का क्षेत्र शारदा मठ के अधीन आते हैं / - Tribhuwan Singh //मठाम्नयाय - महानुशासन //
पूर्वामन्यायों द्वितीयः स्याद गोवर्धनमठ स्मृतः /
भोगवारः सम्प्रदायों वन अरण्ये पड़े स्मृतः //१०//
अंगबंगकलिङ्गाश्च मगधोउत्कलबर्बरा /
गोवर्धन मठाधीनः देशाः प्राचीव्यवस्थिता//१३//
अर्थात -
दूसरा आम्न्याय (मठ ) पूर्व दिशा में स्थित गोवर्धन मठ है /
इसका संप्रदाय भोगवार और इसके सन्यासियों का नाम वन और अरण्य है /
अंग (भागलपुर ) बंग (बंगाल ) कलिंग (दक्षिण पूर्व भारत ) मगध ,उत्कल (उड़ीसा ) और बर्बर (जांगल प्रदेश) गोवर्धन मठ के अधीन आते हैं / - Tribhuwan Singh //मठाम्नयाय - महानुशासन //
तृतीयस्तुत्तराम्न्यायो ज्योतिर्नाम मठोभवेत् /
श्रीमठश्चेति व तस्य नामान्तरमुदीरितम् //१८//
कुरु कश्मीर -काम्बोज - पाञ्चालादि विभागतः /
ज्योतिर्मठवषा देशा उदीचीदिगवस्थिता //२२//
अर्थात-
तीसरा ामन्याय उत्तर दिशा में है , जिसको ज्योतिर्मठ या श्रीमठ कहते हैं / //१८//
कुरु (हस्तिनापुर ,कुरुक्षेत्र) कश्मीर काम्बोज (हरियाणा और पश्चिमोत्तर उत्तर प्रदेश ) पांचाल (पंजाब) तथा उत्तरदिशा के सभी प्रदेश इस मठ के अधीन हैं //२२// - Tribhuwan Singh //मठाम्नयाय - महानुशासन //
चतुर्थो दक्षिणामन्याहः श्रृंगेरी तू मठो भवेत् /
सम्प्रदायों भूरिवारो भूर्भुवो गोत्रमुच्यते //२८//
आंध्र - द्रविड़- कर्नाटक -केरलादि प्रभेदतः /
शृङ्गेरीराधीना देशास्ते ह्यवाचीदिगस्थिता //३२//
अर्थात -
चौथा आम्नाय (मठ ) दक्षिण दिशा में है , जिसको श्रृंगेरी मठ के नाम से जानते हैं / इसका संप्रदाय भूरिवार है , और गोत्र भूर्भुवः है //२८//
आंध्र ------द्रविड़------कर्नाटक , केरल और इसके आसपास का क्षेत्र , श्रृंगेरी मठ के अधीन माने जाते हैं / /३२// - Tribhuwan Singh चौथा आम्नाय (मठ ) दक्षिण दिशा में है , जिसको श्रृंगेरी मठ के नाम से जानते हैं / इसका संप्रदाय भूरिवार है , और गोत्र भूर्भुवः है //२८//
आंध्र ------द्रविड़------कर्नाटक , केरल और इसके आसपास का क्षेत्र , श्रृंगेरी मठ के अधीन माने जाते हैं / /३२// - Tribhuwan Singh आंध्र ------द्रविड़------कर्नाटक , केरल और इसके आसपास का क्षेत्र , श्रृंगेरी मठ के अधीन माने जाते हैं /
- Tribhuwan Singh संस्कृत ग्रंथों , अमरकोश के अनुसार -----द्रविड़ शब्द का मतलब ---बल --- और पराक्रम -------
आदि शंकराचार्य के " मठाम्नयाय महानुशासनम्" के अनुसार ...श्रृंगेरी मठ के अधीन आने वाले प्रदेशों ---- केरल कर्नाटक आँध्रप्रदेश और द्रविड़ (जिसको आज तमिलनाडु ) के नाम...See More - Tribhuwan Singh आगे बढ़ने से पहले कुछ उद्धरण --महान दलित चिंतकों के जिन्होंने आर्य ब्राम्हण , शूद्र अछूत और द्रविड़ियन ,,जैसे शब्दों की लुगदी बनाकर फेंटा और समाज को परोसा / और आज भी रिसर्च पेपर्स में वही लुगदी फेंट और परोस रहें हैं /
बीसवीं शताब्दी के दलित चंतकों को थोड़ा इस बात बोनस मार्क ,,और छूट मिल सकती हैं / क्योंकि उनमे से अधिकतम लोग अंगरेजी में ( मौकौले शिक्षा पद्धति ) शिक्षित थे ,, और विदेशों में भी शिक्षा ग्रहण किया था / वे संस्कृत नहीं पढ़ सकते थे , इसलिए उनका सूचना का श्रोत ,,उन्ही पादरियों और अंग्रेजी अधिकारियों द्वारा संस्कृत से अंग्रेजी में अनुवादित पुस्तकों ,, और उन्ही पादरियों द्वारा निकाले गए निष्कर्षों तक ही सीमित थी / और १९०० के बाद भारत का ८० % से ज्यादा का तबका जिस गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहा था , जिसका कारण यही अंग्रेजी शासन तंत्र था , न की ब्राम्हण समाज या , मिथक घोषित किये गए संस्कृत ग्रन्थ /
मजे की बात तो ये है कि रामायण और महाभारत तो मिथक हो गए और न जाने कब की रचना ( जिसकी रचना मनु ने ,,,कब की थी ) वो प्रामाणिक हो गयी / कभी मनु को शासन की "बुक ऑफ़ लॉ " थी कि नहीं , ये तो पता नहीं, और न इसका प्रमाण है ,, और दूसरे अंग्रेजों के पहले भारत में ८०० साल मुग़लों और तुर्कों का रहा ,,तो शासन नीति उन मुग़लों की थी ,,,या ब्राम्हणों द्वारा बनाये गए "बुक ऑफ़ लॉ " का पालन मुग़ल और तुर्क भी करते थे ,,इसका भी कोई प्रमाण नहीः है / लेकिन १९०० के आसपास जब भारत कि जीडीपी ,,मात्र १५० सालो में विश्व की GDP में २५ प्रतिशत से घटकर मात्र २ प्रतिशत रह गया ,,और ७००% टेचनोक्रट्स और व्यापारी और छोटे किसान जब बेरोजगार और बेघर हो गए (८० प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या ) , तब अंग्रेजी शाशकों के हाँथ ----मनुस्मृति के रूप में एक ऐसा हथियार मिला , जिसने उनके सारे कुकृत्यो और घड़यन्त्रों को ढाल प्रदान का कार्य किया /
अब आगे बढ़ने से पहले ..कुछ उद्धरण ,आर्य , ब्राम्हण ,,और शूद्र , अछूत और द्रविड़ियन की तैयार की हुयी लुगदी ,,,,को दलित चिंतकों के मुहं से सुनते हैं / - Tribhuwan Singh Only if the Brahmin is destroyed, caste will be destroyed. The Brahmin is a snake entangled in our feet. He will bite. If you take off your leg, that's all. Don't leave. Brahmin is not able to dominate because power is in the hands of the Tamilian[ - Periyar ji Viduthalai. 30 July 1957.
- Tribhuwan Singh मैं आंबेडकर जी के इस - निष्कर्ष से सहमत हूँ , कि शूद्र ,,,क्षत्रिय हों न हों ,,,, लेकिन वाकई में अछूत ...चमारों को , छोड़कर , जैसे मेहतर ,,और जमादार ,,वाकई क्षत्रिय वंशज के कुलवाहक थे /
और इसके लिए उन्होंने जो श्रम शाध्य मेहनत करके , वेद पुराण और उपनिषद की यात्रा करने की जरूरत नहीं थी. सिर्फ गुलाम भारत के एक साल हजार साल का इतिहास पढ़ने की क्षमता पैदा कर लेते , तो / - Tribhuwan Singh १९३७ में जब राजगोपालाचारी जी मद्रास प्रेसीडेंसी के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने हिंदी को स्कूलों में शिक्षा कि अनिवार्य भाषा घोषित किया / तो इ. व् रामास्वामी पेरियार ने ,,ये कहकर हिंदी के विरुद्ध आंदोलन छेड़ा कि हिंदी का तमिलनाडु में प्रवेश आर्यों कि एक खतरनाक शाजिश है ,और ये द्रविड़ियन संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास है / और जितने पॉलिटिशियन थे सबने पार्टीलिने के बाहर जाकर उनका समर्थन किया /
कालद्वेल्ल और G U पोप जैसे पादरियों का ये खड़यन्त्र कि तमिल में आर्यों ने संस्कृत को घुसेड़ा है ,,, कामयाब हो गया //
ऊपर लिखे पोस्टों में मैंने यही लिखा है / - Tribhuwan Singh On caste, he believed that the Kural illustrates how Vedic laws of Manu were against the Sudras and other communities of the Dravidian race. On the other hand, Periyar opined that the ethics from the Kural was comparable to the Christian बाइबिल
अब दूस...See More - Tribhuwan Singh आगे पेरियार जी कहते हैं , मुस्लिम पुरानी द्रविड़ियन संस्कृति के अनुयायी हैं ..और द्रविड़ियन रिलिजन को अरबिक में इस्लाम कहते हैं /
- Tribhuwan Singh आप देख सकते हैं ,,आर्य ,,द्रविड़ शूद्र ितयादि किस तरह बिना किसी आधार पर गढ़े हुए ,,,आधारहीन तथ्यों कि एक कहानी है /
- Tribhuwan Singh अब एक और दलित चिंतक और सच्चे अर्थों में महात्मा ,, ज्योतिबा फुले जी ( १८२७ - १८९०) के बारे में एक छोटा सा द्रिस्टान्त ,,भारत के इकनोमिक हिस्ट्री , एजुकेशनल हिस्ट्री ,,और आज के द्विजों में से एक क्षत्रियों के पूर्वज शिवजी महाराज ,,जो कोल्हापुर के राजा थे उनके बारे में ,,अगर गलत होऊंगा तो टोंक दीजियेगा /
महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म एक मौर्या जाति के वंशजों में हुवा / बेसिक एजुकेशन के के बाद एक मिशनरी स्कूल में उच्च शिक्षा प्राप्त किया / लेकिन १८४८ में एक ब्राम्हण ( उस ब्राम्हण का नाम नहीं लिखा हैं ,,गूगल गुरु ने ) ,,के हांथों अपमानित होने के बाद ,, उन्होंने ब्राम्हणों और ब्रम्हानिस्म के खिलाफ ,,और समाज में फैले अंधविस्वास ( यानि वो रीति रिवाज जो बाइबिल कि फ्रेम वर्क के बाहर थी ) और कुरीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया / उन्होंने ढेर सारे सामाजिक सरोकारों जैसे जैसे स्त्री मुक्ति , विधवाओं के अधिकार , शिक्षा के क्षेत्र ,और छोटी जाँतियो , बहुजन , शूद्र और अतिशूद्रों के शोषण के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभायी /
उन्होंने १८७३ में शाहूजी महराज , को कोल्हापुर के राजा थे , ( एक क्षत्रिय और द्विज ,जिसको कालांतर में ढेर सारे अंग्रेजी तमगे मिलने वाले हैं ) , के सहयोग से " सत्य सोधक समाज " की स्थापना की / जिसका उद्देश्य ब्रामणो के शोषण से शूद्रों को मुक्त करवाना था / उन्होंने वेदों के पवित्रता को ख़ारिज कर दिया ,,और चातुर्वर्ण व्यवस्था को भी / उन्होंने शिव जयंती ( शिवा जी के जन्मदिन ) कि शरुवात की /
वेदों कि सार्थकता को ख़ारिज करते हुए उन्होंने प्रश्न उठाया -" कि अगर वेद ब्रम्ह के शब्द है ,,और सम्पूर्ण मानवता के हितसाधने के लिए बने हैं ,,तो ये संस्कृत में ही क्यों लिखे गए हैं ??" उन्होंने मूर्तिपूजा का घोर विरोध किया / ( ये भी बाइबिल के फ्रेम वर्क में फिट नहीं होता , इसलिए मिथक और अंधविस्वास ) - Tribhuwan Singh डॉ आंबेडकर ने अपनी पुस्तक - हु वेरे शूद्रास में जो रीसर्च किया है ,,वह अतुलनीय है ,,उन्होंने कहा है की पुरुष शुक्ति एक क्षेपक (interpolation ) है ,,, और निष्कर्ष निकला है की शूद्र खत्रिय थे, आर्य द्रविड़ थ्योरी की ही तरह ये सिद्ध किया कि ,,वशिष्ठ और विश्वामित्र के वंशजों में अनंत काल तक दुश्मनी ( perpetual enemity ) की वजह से ,,ब्राम्हणों ने उन क्षत्रियों का उपनयन संस्कार करवाना बंद कर दिया शाजिश वष ,, और इस तरह से वे आज कि तारीख में इस दुर्दशा को प्राप्त हुए / जबकि जो लोग रामायण का अध्ययन किये हैं वे जानते हैं,कि जब विश्वामित्र दसरथ से यज्ञ कि रक्षा हेतु , मांगे आये थे ,तो दसरथ अनिक्षुक थे ,,रामऔर लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेजने के लिए / गुरु वशिष्ठ के कहने पर दसरथ राम और लक्षमण को विश्वामित्र को सौपने को तैयार होते हैं ,,,कहाँ गयी वो अनंत काल तक दुश्मनी ??
Tribhuwan Singh एक
झलक अभी २००५ में छपी एक प्रसिद्द एग्रीकल्चर रेसेअर्चेर द्वारा छपी
पुस्तक का पुस्तकांश पेश कर रहा हूँ ,,जो अभी भी आर्य ,,,द्रविड़ .शूद्र और
अछूत की लुगदी फेंटकर इस मिथक को आगे ले जा रहें हैं ,,अपनी पुस्तक में
---Encyclopaedia of Oriental Philosophy and Religion: Hinduism :
Nagendra Kumar Singh
Tribhuwan Singh अब कुछ प्रश्न ,,जिस पर चाहें तो दलित भाई ,,मेरा सर भी फोड़ दें तो मुझे ऐतराज नहीं है ??
---- स्कॉटिश मिशनरी स्कूल से शिक्षित और दीक्षित ,फुले जी , १८४८ में एक ब्राम्हण से अपमानित होकर ब्रम्हानिस्म से लड़ने का बीड़ा उठाया , २१ वर्ष कि उम्र में ,,लेकिन ९ साल बाद भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ,,में भाग लिया कि नहीं लिया ,,ये तो नहीं पूंछ रहा हूँ ,,लेकिन ३० साल के जवान फुले जी का खून नहीं खौला ?? कहीं जिक्र नहीं है , कि उन्होंने कुछ कहा हो , इस सन्दर्भ में ,,क्यों सिर्फ इसलिए कि मंगल पाण्डेय उसके नेता थे ??
-----१८७३ में जब उन्होंने सत्य सोधक समाज क़ी स्थापना क़ी शूद्रों को ब्रामणो के बंधन से मुक्त करने के लिए ,, तो भारत क़ी मैन्युफैक्चरिंग और GDP १५० सालों के निम्तम पायदान पर थी ,,जो भारत १७५ तक विश्व क़ी GDP का २५% हिस्सेदार था ,,वो घट कर मात्र ५ % का आसपास आ गयी थी / और ६०० - से सात ७००% लोग बेरोजगार और बेह्गर हो गए थे / (कार्ल मार्क्स के १८५३ में छपे लेख के अनुसार १८५० तक ढ़ाका के डेढ़ लाख वस्त्रशिल्पियों में से १ लाख ३० हजार शिल्पी बेरोजगार होकर शहर छोड़ कर भाग गए मात्र २० हजार बचे थे ,,तो अगले २५ वर्षों में कितने लीग और बेरोजगार और बेघर हुए होंगे सोच लीजिये ) / बेरोजगारी के खिलाफ लड़ने के बजाय .....
---- वेद और संस्कृत को खारिज करने के बाद ,,उस समय अगर किसी के पास ज्ञानार्जन ,,और सूचनाओं को एकत्रित करने का श्रोत था ,,तो वही ईसाइयत फैलाने क़ी नीयत , और बांटो और राज्य करो ( खास तौर पे १८५७ क़ी घटना दुबारा न हो , इसलिए ) , वाले अंग्रेजों क़ी पुस्तकें ,,और उनको अगर आप भारत का हितैषी मानते हैं ,,तो ये पोस्ट न पढ़े /
---- स्कॉटिश मिशनरी स्कूल से शिक्षित और दीक्षित ,फुले जी , १८४८ में एक ब्राम्हण से अपमानित होकर ब्रम्हानिस्म से लड़ने का बीड़ा उठाया , २१ वर्ष कि उम्र में ,,लेकिन ९ साल बाद भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ,,में भाग लिया कि नहीं लिया ,,ये तो नहीं पूंछ रहा हूँ ,,लेकिन ३० साल के जवान फुले जी का खून नहीं खौला ?? कहीं जिक्र नहीं है , कि उन्होंने कुछ कहा हो , इस सन्दर्भ में ,,क्यों सिर्फ इसलिए कि मंगल पाण्डेय उसके नेता थे ??
-----१८७३ में जब उन्होंने सत्य सोधक समाज क़ी स्थापना क़ी शूद्रों को ब्रामणो के बंधन से मुक्त करने के लिए ,, तो भारत क़ी मैन्युफैक्चरिंग और GDP १५० सालों के निम्तम पायदान पर थी ,,जो भारत १७५ तक विश्व क़ी GDP का २५% हिस्सेदार था ,,वो घट कर मात्र ५ % का आसपास आ गयी थी / और ६०० - से सात ७००% लोग बेरोजगार और बेह्गर हो गए थे / (कार्ल मार्क्स के १८५३ में छपे लेख के अनुसार १८५० तक ढ़ाका के डेढ़ लाख वस्त्रशिल्पियों में से १ लाख ३० हजार शिल्पी बेरोजगार होकर शहर छोड़ कर भाग गए मात्र २० हजार बचे थे ,,तो अगले २५ वर्षों में कितने लीग और बेरोजगार और बेघर हुए होंगे सोच लीजिये ) / बेरोजगारी के खिलाफ लड़ने के बजाय .....
---- वेद और संस्कृत को खारिज करने के बाद ,,उस समय अगर किसी के पास ज्ञानार्जन ,,और सूचनाओं को एकत्रित करने का श्रोत था ,,तो वही ईसाइयत फैलाने क़ी नीयत , और बांटो और राज्य करो ( खास तौर पे १८५७ क़ी घटना दुबारा न हो , इसलिए ) , वाले अंग्रेजों क़ी पुस्तकें ,,और उनको अगर आप भारत का हितैषी मानते हैं ,,तो ये पोस्ट न पढ़े /
Surendra Pratap Singh Sumant
Ji ap ne acha kaha Trivuan ji ap ne bhi acha kaha Uma Ji ap ne bhee
acha kaha Ye anant kal tak chalne wali baudhi ladai hai sabke apne apne
tark haiSee Translation




No comments:
Post a Comment