- Tribhuwan Singh Prabhakar ji I loved that you named the great Gandhian scholar ..I dont know how many of us have read him .
- Tribhuwan Singh उनकी तीनों किताबें पढ़िएग / भारत के बारे में आपको नए विचार मिलेंगे /यही उन जैसे गंधवादियो को सच्ची श्रद्धांजलि होगी /
- Tribhuwan Singh विदेशी लोग उन पर रिसर्च कर रहें हैं और हमारे लिए घर कि मुर्गी साग बराबर /
- प्रसन्न प्रभाकर चर्चा होने से ही बात खुलेगी। यहाँ अपने देश में अभी कोसाई का दौर चालु हैSee Translation
- Tribhuwan Singh एक प्रश्न और रह जाता है कि यदि स्कूल जाने वाले शूद्रों (दलितों ) छात्रों कि संख्या इस १८३० के डेटा के अनुसार अगर ब्रामणो कि तुलना में अगर चार गुना थी ,,तो पिछले १०० वर्षों में ऐसा क्या हुवा कि उनकी शिक्षा का स्तर (लिटरेसी रेट ) एकदम से घाट कैसे गयी / क्या उनका उन स्कूलों में प्रवेश वर्जित था ?? जो अंग्रेजी पद्धति पर चलाये जा रहे थे ?/ या कोई और कारण था ??
- Tribhuwan Singh एकदम सही है ,,,,लेकिन फिर क्या सिर्फ एक खास तबका ही क्यों ??
और क्या कोई प्रामाणिक पुख्ता तथ्य उपलब्ध है ?? - प्रसन्न प्रभाकर सभी हुए। आज़ादी के समय की साक्षरता दर ऐसे ही कम नहीं थी। हाँ बाकी तबके कुछ बाद प्रभावित हुए होंगे। दरअसल निचला तबका इंडिकेटर का काम कर सकता है। पुख्ता सबूत हो सकता है मिल जाए लेकिन स्पष्ट इशारा करता हो , यह कहा नहीं जा सकताSee Translation
- Tribhuwan Singh आजतक ब्रम्हानिस्म के विरोधियों ने जितने लेखन प्रस्तुत किये हैं, वे ऋग्वेद के एक सूक्ति को आधार बनाकर और बाकी कहानिया गढ़ गढ़ कर लिखी हैं / जैसे समाज एक कोई शिला हो , और गतिहीन हो ,,वैदिक काल से लेकर आज तक समाज में कोई परिवर्तन नहीं आया है / इतने तुर्क और मुघलक्रमणकारी और दमनकारी अत्याचारी और फिर अग्रेज च्रिस्तिअनों के शोसण का समाज पर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ा ??
ऐसा संभव है कहीं ?? - प्रसन्न प्रभाकर समाज बहुत गतिशील रहा है। इतना कि वर्णों में उतार चढ़ाव समय के हर मोड़ पर होता रहा। इसमें आक्रमणकरियों , बौद्ध और जैन , और आर्थिक व राजनितिक स्थिति का बहुत बड़ा योगदान रहा हैSee Translation
- Tribhuwan Singh विलियम जोहन्स ने जब १७८५ में जब संस्कृत कि तुलना लैटिन और ग्रीक से की और बताया की संस्कृत सारे भाषाओँ की जननी है ,,से लेकर मैक्समूलर इत्यादि जितने इंडोलॉजिस्ट (संस्कृत के विद्वान ) ,,जिन्होंने संस्कृत टेक्स्ट को अपने आवश्यकता के अनुसार पेश किया , एक ले...See More
- Tribhuwan Singh प्रदोष एच नामक एक इतिहासकार ने ये बात गंभीर रिसर्च के बाद लिखी है /
- Tribhuwan Singh the link is given above ..
- Tribhuwan Singh Welcome ....
- Tribhuwan Singh जब तक कोई विरोध प्रकट न करे मजा नहीं आता ....इस पेज पर लगता है सभी ब्रम्हानिस्म के समर्थक हैं..कोई विरोध का स्वर ही नहीं उभरा / अभी और भी है तथ्य /
- Praphull Jha मैं उतना ज्ञानी नहीं, मेरे शब्दों में फुहरता की झलक दिखेगी , इसलिए चुप हूँ ,सुमंत जी के एक मित्र हैं पंकज परवेज, वो बड़ी कुशलता से जवाब देतेपर पर आजकल इधर आते नहीं।See Translation
- Tribhuwan Singh it is my bad luck ..
- Praphull Jha not yours...
- Praphull Jha और भी ज्ञानी हैं , उज्जवल भट्टाचार्य , ईश मिश्रा , कँवल भारती , पर इस वाल से खफा हैं ( शायद)See Translation
- Tribhuwan Singh Ish Mishra ji se do do hath ho chuki hai ..wo baat sunte nahin bataate hain ..Vimarsh nahin vivaad aur jhagada karte hain /
- Tribhuwan Singh THE BRAHMANS, THEISTS
AND MUSLIMS OF INDIA
Studies of Goddess-worship in Bengal^ Caste^ Brahmaism...See More
प्रसन्न प्रभाकर इसका
कारण आर्थिक शोषण हो सकता है जिससे निचला तबका ज्यादा प्रभावित हुआ।
कामगर, कारीगर , बुनकर आदि के धंधे ही बंद हो गए जिससे प्राथमिकता से
शिक्षा हट गई और ध्यान सिर्फ जीवित रहने के लिए काम की तलाश की ओर मुड़ गया
प्रसन्न प्रभाकर वर्ण में उतार चढ़ाव अब भी चल रहा है/
Praphull Jha चरित्र चित्रण आप और सुमंत जी अच्छे से कर सकते हैं , आप लोगों का शब्द संकलन ज्यादा अच्छा होता हैSee Translation
- Tribhuwan Singh JOHN CAMPBELL OMANने ऊपर दिए गए पुस्तक में , १९०१ में दो बातें लिखी थी /
(१) ब्रम्हविद्या और पावर्टी का सम्मान जिस तरह घट रहा है , उससे प्रतीत होता है की भारतीय पशिम की तरह बहुत जल्दी ही धन के पुजारी हो जायेंगे /
(२) जिस तरह ब्रिटिशर्स और क्रिस्टिअन्स भारतीय समाज को जाती व्यस्था के नाम पर अपमानित करने पर उतारू हैं , उससे लगता है की ये अपने यहाँ की घृणित जाती व्यवस्था को भूल गये हैं / - Tribhuwan Singh "respect for Bramhvidya and poverty is loosing fast in India , the day will come that they will be worshipping manmoth like west "-JOHN CAMPBELL OMAN in 1901
- Tribhuwan Singh इस कथन का तात्पर्य था की ब्राम्हण समाज में अपने ज्ञान और दरिद्रता (अपरिग्रह ) के लिए पूज्य था न कि दुस्टता, धूर्तता , खड़यन्त्र कारी होने के कारण जिसको कि M अ शेररिंग जैसे पादरी ने प्रस्तुत किया , जिसको आंबेडकर जी ने अपनी पुस्तकों में उद्धृत किया है /
- Tribhuwan Singh Buchanan, Francis (1807).ने अपनी पुस्तक " A Journey from Madras through the Countries of Mysore, Canara and Malabar" करीब १८० जातियों का वर्णन किया है और उनको प्रोफेशन / caste से विभाजित किया है / वो एक सर्जन थे कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में , और उनको ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस बात का सर्वे करने का काम दिया था , कि कंपनी द्वारा शासित क्षेत्र में कितनी तरह कि फसल जीव जंतु मौसम उपजाऊ जमीन और वहां के निवासियों के बारे में विस्तृत रूप से एक डेटा तैयार करें /
उन्होंने क्षत्रियो को एक जगह संदेशवाहक और एक जगह डकैत कि श्रेणी में रखा था / ज्ञातव्य हो कि जिस इलाके का वो दौरा कर रहे थे १७९९ तक टीपू सुल्तान के अधिकार में था , जो कि उतना ही fanatic मुस्लिम शासक था जितना कि आज ISIS दिखाई देती है ,,ऐसे में शायद क्षत्रियों के पास डकैती के सिवा कोई चारा न बचा हो /उसी टीपू सुल्तान को हमारे सेक्युलर कम्युनिस्ट लेखक महान देशभक्त और न जाने क्या क्या कहते आये हैं / - Tribhuwan Singh डॉ बुचनन ने तो ऐसी किसी बात का संकेत नहीं दिया है कि ब्राम्हण दुस्ट, घमंडी ,खड़यन्त्रकारी और न जाने कितनी दुर्व्यसनों से ग्रसित लोग थे / जैसा कि पादरी शेरिंग ने ब्राम्हणों के बारे में विचार व्यक्त किया है /
- Tribhuwan Singh बुचनन ने तो यहाँ तक लिखा है कि जब गोवा में पुर्तगाल के शासकों का आदेश आया कि सारे हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन( ISIS मार्का ) कर दिया जाय , तो गोवा का गवर्नर बड़ा उदार था, जिसने वहां के निवासियों को १० दिन का समय दिया कि जो देश छोड़कर जा सकते हैं , वो धर्म परिवर्तन से बच जाएंगे - तो गोवा के धनी ब्राम्हण और शूद्र गोवा छोड़कर कोकण में आकर बस गये , बाकियों का जबरन धर्म परिवर्तन कर दिया गया /
- Tribhuwan Singh आप म अ शेररिंग कि ही पुस्तक "ट्राइब्स एंड कास्टस ऑफ़ इंडिया" को पढ़िए / उस पुस्तक में जीतनी जातियों का उल्लेख है , वे सब व्यवसाय से जुडी हुई जातियों का नाम कारन है ,,जो कि तीन मूलभूत चरित्र के साथ हैं -पेशा , किस क्षेत्र से हैं (जैसे पुरबिया पश्चिमीया उज्जैनी ) और वंशवृक्ष /
इस पुस्तक में भी MA शेरिंग the रेवरेंड preist ने ब्राम्हणों के बारे में ऐसी राय नहीं व्यक्त कि है / - Tribhuwan Singh भारत में एक व्यक्ति एक ही व्यवसाय कर सकता है ,,इसका उल्लेख कौटिल्य के अर्थशास्त्र में है ,ये शायद उससे भी पुरानी परंपरा है /उसी परंपरा का पालन होता रहा हैं , ऐसा शेरिंग कि पुस्तक से ज्ञात होता है /
अब जैसे आपको मालूम होगा कि मुसहर,और बेड़िया आज कि तारिख में सबसे गरीब तबके में आती हैं ,,क्या आपको पता है ये कौन लोग थे ?? इनका पेशा क्या था / - Tribhuwan Singh क्या इनकी गरीबी और दरिद्रता का कारन ब्रम्हानिस्म है ?
- Tribhuwan Singh ये नमक के ट्रांसपोर्ट का काम करते थे थलमार्ग से ,,गांव गावं जाकर / बंगाल में बना नमक मिर्ज़ापुर तक आता था / अंग्रेजों ने सबसे पहले नमक के व्यापार पर कब्ज़ा किया / क्षत्रियो में भी एक वर्ग होता है लोनिआ ठाकुर (सुमंत डा राजपूत को ठाकुर बोलते हैं ) , उनकी hiearchy में पोजीशन नीचे होती थी/ नमक को लोन बोलते हैं , ये भी शायद उसी व्यापार से जुड़े लोग थे /
जब नमक के पूरे बाजार और व्यवसाय पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने कब्ज़ा कर लिया तो जो लोग पूर्णतः उसी पेशे से सदियों से जुड़ें रहें होगे सोचिये उनका क्या हुवा होगा ??
गांधी को मजबूर होकर नमक आंदोलन करना पड़ा , आप सब जानते हैं / - Tribhuwan Singh No comments till this time is not good sign ..
- Tribhuwan Singh दादी अम्मा कहानी सुनाती थीं तो हुंकारी भरवाती थी यहाँ तो वो भी नहीं है कितना ज्ञान बाँटू बिना हुंकारी के हा हा ह
- Tribhuwan Singh लेकिन इतना सन्नाटा ,,,ये तो आत्मविश्वास हिला देता है ..उस पर सूत्रधार गायब ,,मुझे फंसाकर दूसरे लोगों को डील कर रहे हैं . Sumant Bhattacharya
- Arun Kumar आप और आप का आत्म विश्वास हिल सकता है? कमी नहीं। चक डोले चक डमडम डोले खैरा पिपर कबहुँ ना डोलेSee Translation
- Tribhuwan Singh भारतीय इतिहास के सामजिक संरचना की विकृति वर्णन की शुरुवात 1857 हुई। इस संग्राम में इतने अंग्रेज मारे गए कि इंग्लॅण्ड की संसद और आम जनता भी हिल गयी।
- Tribhuwan Singh इसीलिये स्वतंत्रता संग्राम के बाद का लेखन में साफ़ फर्क है।
- Tribhuwan Singh विलियम जोन्स ने asciatic रिसर्च सोसाइटी की स्थापना 1785 में हुई। आप उनके पेपर्स जो सालाना जलसे में प्रस्तुत करते थे। उसको पढ़िए । आप समझ न पायेंगे। उसकी कोशिश थी कि सारे भारतीय ग्रंथो को बाइबिल के timeline के बाद सिद्ध किया जाय।संस्कृत को Endouropian भाषा घोषित करने का श्रेय उसी को जाता है। उसने तो बुद्ध को भी यूथोपिया में पैदा हुवा सिद्ध किया क्योकि बुद्ध के बाल घुघुराले हैं।
- Praphull Jha Some Other Facts, My Christian Friends says that "Geeta" and every Religious things from Hindu came in existence after Jesus.
- Tribhuwan Singh एक और बात समझना पड़ेगा। किसी भी समाज की स्थिति को सिर्फ मनुस्मृति में लिखे श्लोक से समझ पाना मुश्किल है। देश की आर्थिक स्थिति समाज का दर्पण प्रस्तुत करता है । स्किल्ड इंडिया का नारा समझिये । शिक्षित इंडिया का नहीं। भारत में क्शिक्षा हमेशा - अर्थकरी च वि...See More
- Tribhuwan Singh Angus Maddison नाम के अर्थशाष्त्री ने 10 वर्षो की रिसर्च किया और 2000 में एक पुस्तक लिखी - Economic history of world; a melineum perspective. जिसमे 0 AD se 2000 AD तक का विश्व की आर्थिक इतिहास का वर्णन है। इनको OECD ग्रुप के देशों ने नियुक्त किया था ये जांचने के लिए की क्या पश्चिमी देश हमेशा से अमीर रहे हैं और पूर्वी देश हमेशा से ही गरीब रहे हैं । क्योंकि अभी भी हमें बताया जाता रहा है की महान रोमन सभ्यता।
- Tribhuwan Singh A Maddison ने ये प्रमाणित किया की भारत और चीन 0 AD से 1750 तक दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत थे। 1750 में भारत की GDP पूरी दुनिया की GDP का 25% हिस्से का हिस्सेदार थे। जबकि UK + USA का कुल हिससेदारी मिलकर मात्र 2% थी। per capita इनकम लगभग भारत और UK का लगभग बराबर था। भारत एक निर्यातक देश था ।खाली मसलों का नहीं रत्न लाख गोंड घी सूती वस्त्र और छींट के कपडे। भारत से आयातित वस्तुएं इंग्लॅण्ड के घरों में स्टेटस सिंबल मानी जाती थी।
- Tribhuwan Singh लेकिन मात्र 150 सालों में स्थिति उल्टी हो गयी । भारत का हिस्सा विश्व GDP का मात्र 2% रह गया और UK+USA का हिस्सा 40% के ऊपर हो गया। और ये औद्योगिक क्रांति के कारण नहीं । बल्कि सिलसिलेवार लूट और भारतीय घरेलू उद्योगों को नष्ट करके। अगर क्या क्या समान भारत से जाता था इंग्लॅण्ड उसकी जानकारी चाहिए तो दादा भाई नौरोजी की Unbritish Rule in India नामक पुस्तक जो 1906 के आसपास छपी थी। उससे ले सकते है।
- Tribhuwan Singh अब इसका एक दूसरा हिस्सा देखिये। अगर भारत देश निर्यातक था । तो मैन्युफैक्चरिंग भी होती रही होगी। इसका मतलब स्किल्ड और अपने ज़माने के interpreuner भी रहे होंगे। रोजगार युक्त होंगे ।उनके द्वारा निर्मित सामान एक्सपोर्ट होता था तो मानना चाहिए कि लोग संपन्न न...See More
- Tribhuwan Singh जो लोग हजारों वर्षों से अपनी हस्तकला और उससे जुड़े व्यवसाय जैसे खरीदकर ट्रांसपोर्ट करना , या सोचिये किसी भी मुख्य व्यवसाय से सम्बंधित जितनी भी auxillary व्यवसायी रहे होंगे, और जो हजारों साल से वही काम करके जीविकोपार्जन करते थे। बेरोजगार हुए होंगे तो बेघर भी हुए होंगे।
- Praphull Jha सुमंत जी आपका चर्चा रखने के लिए आभार और त्रिभुवन जी के लिए मेरे पास शब्द नहीं है , आज से वो सदैव आदरणीय रहेंगेSee Translation
- Tribhuwan Singh धन्यवाद।
- Tribhuwan Singh "The rise and fall of the great powers" - पॉल कैनेडी द्वारा लिखे पुस्तक के P. 149 पर एक बेल्जियन इकोनॉमिस्ट पॉल बैरोच द्वारा तैयार एक डाटा प्रकाशित किया गया है। वो बेहद रुचिकर और ज्ञानियों के चक्छु खोलने वाला है ।
Table.6 Relative shares of World Manufacturing Output 1750-1900
में पब्लिश की गयी रिपोर्ट के अनुसार 1750 में पूरे यूरोप का उत्पादन विश्व उत्पादन का 23.2% था और भारत अकेले का उत्पादन 24.5 % था।
ब्रिटेन का योगदान मात्र 1.9% था। - Tribhuwan Singh अब 1900 को देखिये
यूरोप अकेले 62.0%
ब्रिटेन 18.5%...See More - Tribhuwan Singh विश्व सकल उत्पाद में भारत का योगदान datawise
1750-----24.%
1800------19.7%...See More - Tribhuwan Singh अब एक दूसरा डाटा उसी पुस्तक से पॉल बैरोच का।Table 7.
Per capita level of Industrialisation :
1750 में ...See More - Tribhuwan Singh Per capita de industrialisation in India
1750--7
1800--6...See More - Tribhuwan Singh यानी हिंदी में समझाया जाय तो यदि 1900 में मात्र 1 व्यक्ति भारत में उत्पादन व्यवसाय में कार्य करता था तो 1750 में 700 लोग उत्पादक रोजगारों में employed थे।
यानी अगर कोई statistic वाला व्यक्ति इस पेज पर हो तो वो जनसँख्या के अनुपात में कितने लोग बेरोज...See More - Sumant Bhattacharya Tribhuwan Singh भाई बहुत समृद्ध जानकारी से लैस हो रहा हूं, आपको पढ़ के। धन्यवादSee Translation
- Tribhuwan Singh जारी रखें की बंद कर दें ।
- Sumant Bhattacharya Tribhuwan Singh शर्मिंदा ना करे,.वह भी सार्वजनिक तौर पर। आपके एक कमेंट को मैं पोस्ट बनाने की इजाजत चाहूंगा..दिन में किसी वक्त पोस्ट लगाने की बदनीयत है मेरी। सादरSee Translation
- Tribhuwan Singh सुमंत भाई यहाँ कार्ल मार्क्स के एक लेख को उद्धृत करना उचित होगा ।1853 में नेव्योर्क ट्रिब्यून में प्रकाशित किया था ।वो भी मेरी बात का समर्थन करते हैं ।
Sumant Bhattacharya मैं
आप सभी मित्रों को पढ़ते हुए खुद को समृद्ध कर रहा हूं. मेरे सामने कई
खिड़कियां खुल रही हैं। यह कोई सामान्य चर्चा नहीं, अतिविशिष्ट चर्चा हो
रही है।
Arun Kumar Following, pl. continue
Tribhuwan Singh आप सही कह रहें है।
Tribhuwan Singh क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि कितने प्रतिशत लोग बेरोजगार हुए होंगे ??
Tribhuwan Singh Paul
bairoch says -- a horrifying state of affair , whereas in 1750 per
capita industrialisation in Europe and third world was not too far apart
from each other , but by 1900 , later was only one eighteenth (1/18) of
Europe and one fiftieth (1/50) of UK.







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