जॉन
मुइर जो एक ईसाई विद्वान था , जो 19 साल की उम्र में भारत आता है इंडियन
सिविल सर्विसेज में , और जो अल्लाहाबाद और फ़तेह पर में अंग्रेजी हुकूमत का
एक अंग था ,वखि जॉन मुइर २९ साल की उम्र में मत्परीक्षा नामक एक पुस्तक
लिखता है, और ईसाइयत को हिंदूइस्म से श्रेष्ठ साबित करता है / सरकारी नौकरी
में रहते हुए वो संस्कृत का इतना बड़ा विद्वान बन जाता है कि " ओरिजिनल
संस्कृत टेक्स्ट्स " नामक एक किताब लिखता है , जिसका डॉ आंबेडकर ने अपनी
पुस्तक "शूद्र कौन थे " , में बहुतायत रूप से उद्धृत किया
है / उसी पुस्तक के पार्ट -२ सी कुछ ओरिजिनल टेक्स्ट्स पेश करा रहा हूँ ,
अंग्रेजी में जिसको कहते है - " Right From Horses mouth "---
"ये नॉन आर्यन नश्ल के लोग अमेरिका के रेड इंडियन कि तरह कमजोर नश्ल के थे / दूसरी तरफ Arians ज्यादा organisesed enterprising और creative लोग थे, धरती पर अर्वाचीन जन्म लेने वाले ज्यादा सुदृढ़ पौधे और जानवरों कि तरह वे ज्यादा सुदृढ़ लोग / अंततः दो विपरीत राजनैतिक लोगों की तरह ही अलग दिखने वाले / तीन ऊपरी वर्गों को जिनको द्विज या आर्य के नाम से भी जाना जाता है , एक अलग विशेष क्लास के लोग / Arian इस तरह से एक सुपीरियर और विजेता नश्ल साबित हुई / इसको सिद्ध करने के लिए complexion को एक और सबूत के तौर पर जोड़ा जा सकता है / संस्कृत में Caste को मूलतः रंग (कलर ) के नाम से जाना जाता है / इसलिए caste उनके रंग (चमड़ी के रंग ) से निर्धारित हुई / लेकिन ये सर्विदित हैं कि ब्राम्हणों का रंग शूद्र और चाण्डालों से ज्यादा फेयर था / इसी तरह क्षत्रियों और वैश्यों के भी इसी तरह फेयर complexion रहा होगा / इस तरह हम इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि कि एरियन -इंडियन मूलतः काले मूल निवासियों से भिन्न थे; और इस अनुमान को बल मिलता है कि वे किसी उत्तरी देश से आये थे /
अतः एरियन भारत के मूल निवासी नहीं थे बल्कि किसी दूसरे देश से उत्तर (भारत) में आये , और यही मत प्रोफेसर मैक्समूलर का भी है "/ From- Original Sanskrit Texts Part Second P. 308-309 ; by John Muir
जो संस्कृत विद्वान वर्ण और caste के भेद को भी नहीं समझ सकते /वो चमड़ी के रंग के आधार पर सवर्ण आवरण और असवर्ण जैसे शब्दों से समाज को विभाजित करते है , उन्होंने किस संस्कृत ग्रन्थ को पढ़कर ये वाग्जाल फैलाया है ?? आप स्वयं देख सकते हैं कि रंगभेद के चश्मे से दुनिया को बांटने वाले और गुलाम बनाने वाले , 1500 से 1800 के बीच अमेरिका के 200 million मूल निवासी रेड इंडियन का क़त्ल करने वाले ईसाई विद्वान कितने शाश्त्रों का अध्यन कर इस निर्णय पर पहुंचे है / आजकल ईसाइयत फैलाने के लिए एक नयी शाजिश ये ईसाई फिर रच रहे है - AFRO _DALIT प्रोजेक्ट के नाम से , जिसके कांचा इलैया जैसे विवान प्रमोटर हैं / इन्ही संस्कृतज्ञ ईसाई विद्वानो के गधे हुए कुतर्कों के अनुवादों के अनुवादों के अनुवाद कक आधार बना कर जब डॉ आंबेडकर "शूद्र कौन थे " कि खोज में वेदों कि सैर पर निकल जाते हैं , तो उनकी मंशा पर उंगली उठे न उठे लेकिन उनके सूचना के श्रोतों की विश्वसनीयता पर प्रश्चिन्ह अवस्य लग जाएगा /
"ये नॉन आर्यन नश्ल के लोग अमेरिका के रेड इंडियन कि तरह कमजोर नश्ल के थे / दूसरी तरफ Arians ज्यादा organisesed enterprising और creative लोग थे, धरती पर अर्वाचीन जन्म लेने वाले ज्यादा सुदृढ़ पौधे और जानवरों कि तरह वे ज्यादा सुदृढ़ लोग / अंततः दो विपरीत राजनैतिक लोगों की तरह ही अलग दिखने वाले / तीन ऊपरी वर्गों को जिनको द्विज या आर्य के नाम से भी जाना जाता है , एक अलग विशेष क्लास के लोग / Arian इस तरह से एक सुपीरियर और विजेता नश्ल साबित हुई / इसको सिद्ध करने के लिए complexion को एक और सबूत के तौर पर जोड़ा जा सकता है / संस्कृत में Caste को मूलतः रंग (कलर ) के नाम से जाना जाता है / इसलिए caste उनके रंग (चमड़ी के रंग ) से निर्धारित हुई / लेकिन ये सर्विदित हैं कि ब्राम्हणों का रंग शूद्र और चाण्डालों से ज्यादा फेयर था / इसी तरह क्षत्रियों और वैश्यों के भी इसी तरह फेयर complexion रहा होगा / इस तरह हम इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि कि एरियन -इंडियन मूलतः काले मूल निवासियों से भिन्न थे; और इस अनुमान को बल मिलता है कि वे किसी उत्तरी देश से आये थे /
अतः एरियन भारत के मूल निवासी नहीं थे बल्कि किसी दूसरे देश से उत्तर (भारत) में आये , और यही मत प्रोफेसर मैक्समूलर का भी है "/ From- Original Sanskrit Texts Part Second P. 308-309 ; by John Muir
जो संस्कृत विद्वान वर्ण और caste के भेद को भी नहीं समझ सकते /वो चमड़ी के रंग के आधार पर सवर्ण आवरण और असवर्ण जैसे शब्दों से समाज को विभाजित करते है , उन्होंने किस संस्कृत ग्रन्थ को पढ़कर ये वाग्जाल फैलाया है ?? आप स्वयं देख सकते हैं कि रंगभेद के चश्मे से दुनिया को बांटने वाले और गुलाम बनाने वाले , 1500 से 1800 के बीच अमेरिका के 200 million मूल निवासी रेड इंडियन का क़त्ल करने वाले ईसाई विद्वान कितने शाश्त्रों का अध्यन कर इस निर्णय पर पहुंचे है / आजकल ईसाइयत फैलाने के लिए एक नयी शाजिश ये ईसाई फिर रच रहे है - AFRO _DALIT प्रोजेक्ट के नाम से , जिसके कांचा इलैया जैसे विवान प्रमोटर हैं / इन्ही संस्कृतज्ञ ईसाई विद्वानो के गधे हुए कुतर्कों के अनुवादों के अनुवादों के अनुवाद कक आधार बना कर जब डॉ आंबेडकर "शूद्र कौन थे " कि खोज में वेदों कि सैर पर निकल जाते हैं , तो उनकी मंशा पर उंगली उठे न उठे लेकिन उनके सूचना के श्रोतों की विश्वसनीयता पर प्रश्चिन्ह अवस्य लग जाएगा /
- Shalini Khattar Mehta संस्कृत में Caste को मूलतः रंग (कलर ) के नाम से जाना जाता है jiSee Translation
- Shalini Khattar Mehta वो संस्कृत का इतना बड़ा विद्वान बन जाता है कि " ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट्स " नामक एक किताब लिखता है , जिसका डॉ आंबेडकर ने अपनी पुस्तक "शूद्र कौन
थे " , में बहुतायत रूप से उद्धृत किया है ..baba main points quote kar rahi hoonSee Translation - Tribhuwan Singh Shalini Khattar Mehta जी जिस देश के भगवान राम कृष्ण और शंकर श्याम वर्ण के हों वहां डार्क complexion के आधार पर सिर्फ ईसाई संस्कृत विद ही बाँट सकते है।
संस्कृत ग्रंथों में तो शायद जिक्र नहीं है कही ?? - Tribhuwan Singh अनुमानों पर आधारित बायस्ड उनपढ़ ईसाई दंस्कृतज्ञों के आधार पर लिखा गया भारत का इतिहास हम ढो रहें हैं न जाने कितने वर्षों से।
- Indra Deo Singh सावला और गोरा कोई विभाजन का आधार कम से कम भारत में तो हो नहीं सकता।यहाँ तो सावले या काले को जयादा महत्व दिया गया।आज इसका इतना उल्टा असर है की जिस ब्यक्ति को पुत्री होतई है उसको depression हो जाता है।कुछ दिन में वह कोमा में चला जावेगा।See Translation
- Indra Deo Singh जिसकी पुत्री सावली या काली होगी वह drpression में चला जायेगा
इस प्रकार पढ़े
सादरSee Translation - Bharti Subedi Rawat Actually classification of English scholars were on the basis of colours depicted there mentality of superiority of complexion , in India climatic conditions are so different from north to south and east to west this point was not considered and they devide according to their own bias thoughts. .
- Tribhuwan Singh @Indra Deo Singh sir and @Bharti Subedi Rawat ji both of you are justified /
- Tribhuwan Singh @Indra Deo Singh sir and @Bharti Subedi Rawat ji both of you are justified /
- DrRangnath Shukla डॉ त्रिभुवन हमें आपके आग्रही अध्ययन पर गर्व है.....आग्रही इसलिए की जब आज अधिकांश बुद्धिजीवी हाय पैसा हाय पैसा करके कितना इकठ्ठा कर ले इसमें लगा है....आप वृहत्तर भारत के सामाजिक इतिहास को संजोने में लगे है....कोटिशः साधुवाद !See Translation
- Tribhuwan Singh @Rangnath Ji thanks for kind words
- Indu Shekhar Singh ये मानवाधिकार की बात करने वाले ईसाइयो ने भारत मे रंगभेद का इतना बड़ा बखेडा खड़ा कर के रखे हुए हैं ताकि सब अपने मे उलझे रहें इसको सुधारा जाना नितांत आवश्यक हैSee Translation
- Bharti Subedi Rawat Agree with Dr shukla
- Tribhuwan Singh ji sahi kaha bandhu @Indu ji aapne
- Tribhuwan Singh @Bharti Rawat ji : you cant be serious .
- Indu Shekhar Singh " ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट्स " आँख के अंधे का नाम नैनसुख ।ISI मार्का और ISO भी मिला है क्या ?See Translation
- Bharti Subedi Rawat I am serious doc Tribhuwan Singh ji
- Tribhuwan Singh thanks
- Tribhuwan Singh Indu Shekhar Singh जी गलती उसकी नहीं थी जिसने इस कपोल कल्पना से भरी पुस्तक को ओरिजिनल टेक्स्ट लिख के पेश किया।
गलती उनकी है जो इसको ओरिजिनल मान बैठे और उस Bigot ईसाई के फैलाये जाल में भहरा के गिर पड़े। - Indu Shekhar Singh अच्छा हाँ उन लोगों ने तो संपेरो का देश भी कहा था और उतपाद के मार्केटिंग का क्या कहना जहाँ साँप और नेवले के लड़ाई के नाम पर दाँत का मंजन बिकता है कुछ वैसा ही है ओरिजनल संस्कृत अंग्रेजी मे।हा हा हा हाSee Translation
- Tribhuwan Singh जब गीता कहती है कि शूद्र का धर्म परिचर्या और देश का आज तक का सब्से विद्वान ब्रम्हाण और अर्थशास्त्री कौटिल्य उसको कहता है - शुश्रूषा वार्ता कारकुशीलम शूद्रस्य क्रमः ।
तो आंबेडकर और दलित साहित्य में शूद्रों को menial जॉब अलॉट करने का काम मुइर जैसे Bigot ईसाई की ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट से पढ़कर लिखा होगा। - Tribhuwan Singh आंबेडकर साहित्य में वर्णित सवर्ण अवर्ण और असवर्ण की खोज इन्ही ईसाई bigot विद्वानों की रंगभेद और रंग से जुड़े उनके पूर्वाग्रह से उपजे शब्द है / क्योंकि कुछ शब्द तो संस्कृत में हैं भी नहीं जैसे अवर्ण / सवर्ण और असवर्ण शब्द जरूर हैं लेकिन वो उन अर्थों में प्रयुक्त नहीं होते जिन अर्थों में इन संस्कृत विदों ने प्रयोग किया हैं , और जहाँ से डॉ आंबेडकर ने कॉपी पेस्ट किया है /







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