- Tribhuwan Singh संस्कृत की डिक्शनरी अमरकोश "आर्य" शब्द प्रयोग किसी व्यक्तिविशेष के सम्बोधन या उद्बोधन में प्रयोग होने वाला एक विशेषण (adjective ) है , जिसको विद्वान संस्कृतज्ञ जोन्स और मैक्समूलर और उनके अनुयायियों की एक लम्बी लिस्ट ,जिनमे वामपंथी और दलित चिंतक हैं , एक विशिष्ट रेस / नश्ल बनाकर पिछले १५० सालोँ से, भारतीय समाज , संस्कृति और उसकी श्रेष्ठतम विरासत की ऐसी की तैसी कर रहे है /
लेकिन फिर हमें ये देखना चाहिए की मात्र एक डिक्शनरी के आर्य शब्द के मायने समझकर कहीं हम भी तो उसी रास्ते पर नहीं चल पड़े हैं ,,जिन पर वे जा रहे हैं / तो फिर कुछ और संस्कृत ग्रंथों से आर्यों (जिनकी भाषा संस्कृत थी/है) के बारे क्या वर्णन आया है ,इसको भी देखें / १५० साल से चलाये जा रहे कुचक्र को खारिज करने के लिए मात्र एक श्लोक पर्याप्त नहीं है / - Tribhuwan Singh What evidence is there of the invasion of India by the Aryan race and the subjugation by it of the native tribes? So far as the Rig Veda is concerned, there is not a particle of evidence suggesting the invasion of India by the Aryans from outside India. As Mr. P. T.
Srinivasa lyengar[f12] points out:
"A careful examination of the Manatras where the words Arya, Dasa and Dasyu occur, indicates that they refer not to race but to cult. These words occur mostly in Rig Veda Samhita where Arya occurs about 33 times in mantras which contain 153,972 words on the whole. The rare occurrence is itself a proof that the tribes that
called themselves Aryas were not invaders that conquered the country and exterminated the people. For an invading tribe would naturally boast of its achievements constantly."
So far the testimony of the Vedic literature is concerned, it is against the theory that the original home of the Aryans was outside India. The language in which reference to
the seven rivers is made in the Rig. Veda (X.75.5) is very significant. As Prof. D. S.
Triveda says[f13]—the rivers are addressed as 'my Ganges, my Yamuna, my Saraswati' and so on. No foreigner would ever address a river in such familiar and endearing terms unless by long association he had developed an emotion about it.- Page 59 "Who were shudras " - Tribhuwan Singh संस्कृत में आर्य शब्द का प्रयोग किसी वक्तिविशेष की साधुता , सज्जनता या बड़े बुजुर्गों का सम्मानजनक सम्बोधन भर है , न की किसी विशेष रेस/नश्ल का ( चूंकि संस्कृत और भारतीय संस्कृति और परंपरा के लिए रेस की कोई ौधरना ही नहीं थी, इसलिए उसके लिए कोई शब्द भी नहीं है - इसलिए मुझे अंग्रेजी और पर्सियन/उर्दू शब्द का प्रयोग करना पद रहा है ,इसके लिए सादर क्षमा प्रार्थी हूँ ) वर्णन करने के लिए /
श्रीमद वाल्मीकिरामायण से कुछ उद्धरण प्रस्तुत हैं --
जब रामचन्द्र जी वनगमन के लिए तैयार हुए तो सीता जी भी उनके साथ जाने को उद्धत हो गयी , तब माता कौशिल्या ने सीता जी को कुक्ष आशीर्वचन देने के उपरांत उनको कुछ नारी के कर्तव्यों और सम्मान के बारे में बताया / उसके उत्तर में सीता जी ने माता कौशिल्या को सम्बोधित करते हुए जो कहा ,उसी से उद्धृत कुछ श्लोक प्रस्तुत करता हूँ /-
करिष्ये सर्वमेवाहामार्या (सर्वं+एव +अहम +आर्या) यदनुशास्ति माम् |
अभिज्ञाश्मि यथा भर्तुर्वृतितव्यम् श्रुतम् च में ||
आर्ये ! मेरे लिए जो कुछ उपदेश दे रहीं हैं ,मैं उसका परिपूर्णरूप से पालन करूंगी / पति के साथ कैसा व्यव्हार करना चाहिए, मुझे यह भलीभांति विदित है ; क्योंकि इस को मैंने पहले ही सुन रखा है/ - Tribhuwan Singh वैसे तो इस विषय में कि "आर्य ' शब्द का प्रयोग संस्कृत में सम्मानजनक सम्बोधन हेतु प्रयोग किया गया है , इसको प्रमाणित करते हुए सैकड़ों श्लोक पेश कर सकता हूँ लेकिन उसी वाल्मीकि रामायण से ,सीता जी को माता कौशिल्या को सम्बोधित करते हुए एक और श्लोक प्रस्तुत करूंगा बस -
साहमेवंगता श्रेष्ठा श्रुतधर्मपरावरा /
आर्ये किमवमन्येन्यम् स्त्रियां भर्ता ही दैवतम //
आर्ये ! मैंने श्रेष्ठ स्त्रियों माता आदि के मुख से नारी के सामान्य और विशेष धर्मों का श्रवण कर रखा है / इस प्रकार पातिव्रत्य का महत्व जानकार भी मैं पति का अनदर क्यों करूंगी ? मैं जानती हूँ कि पति ही स्त्री का देवता होता है / - Tribhuwan Singh पुरुषो को आदरसहित "आर्य" का सम्बोधन और स्त्रियों को " आर्या " का सम्बोधन मात्र है ,आर्य शब्द का मतलब /
लेकिन जब आपने अपनी धरोहर संस्कृत ग्रंथों का ही अध्यन नहीं किया , और यूरोपीय च्रिस्तिअनों संस्कृतविज्ञों को ही आधार मान लिया जिन्होंने देश को ढाई सौ साल गुलामी कि जंजीरों में जकड़कर , अपने अपने अलग अलग राजनैतिक ,राष्ट्रीय , और धर्म परिवर्तन के उद्देश्यों कि पूर्ती हेतु सम्बोधन सूचि शब्द को एक अलग रेस बना दिया तो गलती किसकी है ? उनकी जिन्होंने भारत के १७५० में विश्व के सकल घरेलु उत्पाद का २५% शेयरहोल्डर को १९०० आते आते मात्र २% तक समेत दिया / जिन्हों उन्ही डेढ़ सौ सालों में स्किल्ड टेचनोक्रट्स की विशाल फ़ौज को नष्ट कर ७००% लोगों को मजदूर और बेरोजगार बना दिया , जिन्होंने इन्ही बेरोजगार और आर्थिक रूप से दरिद्र बने लोगों को १९३५ में opressed (दलित ) caste ऑफ़ इंडिया के तहत एक schedule में डालकर scheduled caste और tribe में लिस्ट कर दिया /
किस्से opressed थे ये स्वयं रानी विक्टोरिया के लुटेरे गिरोह से की ब्रम्हानिस्म से ??
वामपंथ में लामबंद विद्वानों और दलित चिंतकों मेरी चुनौती स्वीकार करो , और सार्थक बहस करो / या फिर अपने राजनैतिक स्वार्थ हेतु छेड़े गए बेबुनियाद बहस को बंद करो / समाज और देश का बंटवारा करने का काम करने वाले अंग्रेज , आज फिर आपके दरवाजे पर कटोरा लेकर खड़े होने को उत्सुक है ,,,जब आप दुबारा विश्व की आर्थिक शक्ति बनने तैयारी कर रहे हैं तो , इसलिए मेरा आग्रह है की ---"समाज को तोड़ो नहीं जोड़ो"/ - Tribhuwan Singh Arun kumar ji main iska kya uttar doon
- Tribhuwan Singh अब एक छोटा सा लेख इस बारे में कि तथाकथित फिलोलॉजिस्ट ,इंडोलॉजिस्ट या जिस भी विश्लेषण से नवाजे गए लोग चाहे वो विलियम जोंस ,जो कलकत्ता हाई कोर्ट के जज थे ,और जिन्होंने एशियाटिक सोसाइटी कि स्थापना कि थी , (वो संस्था आज भी कलकत्ता में जीवित है ) हों , या फिर मैक्समूलर या अन्य जर्मन विद्वान , जिन्होंने अपने आप को दुनिया में संस्कृत भाषाविद के रूप में पेश किया ,और ये कहानी गाढ़ी कि आर्य (यानि जिनकी मूल भाषा संस्कृत थी ) बाहर से भारत में आये, और यहाँ के मूल निवासियों को हराकर उन पर शाशन किया , उनके बारे में /
क्या इन तथाकथित संस्कृत विदों ने क्या वाकई संस्कृत का अध्यन किया था ,,किया था तो कहाँ से किया था , इस पर एक भारतीय मूल के विद्वान इंडोलॉजिस्ट प्रदोष एच ने अपनी पुस्तक में रिसर्च किया और प्रकाशित किया उनकी राय क्या इनके बारे में उसकी एक लिंक और उनकी पुस्तक की लिंक भेज रहा हूँ / उसको जरूर पढ़ें /\ - Tribhuwan Singh अब एक छोटा सा लेख इस बारे में कि तथाकथित फिलोलॉजिस्ट ,इंडोलॉजिस्ट या जिस भी विश्लेषण से नवाजे गए लोग चाहे वो विलियम जोंस ,जो कलकत्ता हाई कोर्ट के जज थे ,और जिन्होंने एशियाटिक सोसाइटी कि स्थापना कि थी , (वो संस्था आज भी कलकत्ता में जीवित है ) हों , या फ...See More
- Tribhuwan Singh अब एक छोटा सा लेख इस बारे में कि तथाकथित फिलोलॉजिस्ट ,इंडोलॉजिस्ट या जिस भी विश्लेषण से नवाजे गए लोग चाहे वो विलियम जोंस ,जो कलकत्ता हाई कोर्ट के जज थे ,और जिन्होंने एशियाटिक सोसाइटी कि स्थापना कि थी , (वो संस्था आज भी कलकत्ता में जीवित है ) हों , या फिर मैक्समूलर या अन्य जर्मन विद्वान , जिन्होंने अपने आप को दुनिया में संस्कृत भाषाविद के रूप में पेश किया ,और ये कहानी गाढ़ी कि आर्य (यानि जिनकी मूल भाषा संस्कृत थी ) बाहर से भारत में आये, और यहाँ के मूल निवासियों को हराकर उन पर शाशन किया , उनके बारे में /
क्या इन तथाकथित संस्कृत विदों ने क्या वाकई संस्कृत का अध्यन किया था ,,किया था तो कहाँ से किया था , इस पर एक भारतीय मूल के विद्वान इंडोलॉजिस्ट प्रदोष एच ने अपनी पुस्तक में रिसर्च किया और प्रकाशित किया उनकी राय क्या इनके बारे में उसकी एक लिंक और उनकी पुस्तक की लिंक भेज रहा हूँ / उसको जरूर पढ़ें /\ - Tribhuwan Singh Lies with Long Legs — Now read it online | Indian Realist
://indianrealist.com/.../lies-with-long-legs-now-read-it.../Nice to be back after a three-month break! Did you know that Dr Prodosh Aich's remarkable book "Lies with Long...indianrealist.com - Tribhuwan Singh अब कुछ वैज्ञानिक रेसेअर्चेस जो पिछले १० वर्षों में आयी हैं की साउथ एशिया यानि सम्पूर्ण भारत के जीन एक हैं , वो चाहे सवर्ण हों असवर्ण हों ब्राम्हण हों या शूद्र हों सबके जीन एक ही हैं / तब क्या बाकी बचा / क्या वैज्ञानिक आधारों को भी प्रमाण न मानेगे , तथाकथित दलित चिंतक और वामपंथी ??
लगता तो ऐसे ही है, क्योंकि ये मानने का कोई कारण नहीः है की जिन तथ्यों तक मेरी पहुँच है , वहां तक वो भी पहुँच सकते हैं इंटरनेट के युग में ?
फिर क्यों नहीं स्वीकार है उनको की आर्य कोई बाहरी नहीं थे और न ही ही उन्होंने किसी को विस्थापित किया ?
क्योंकि इस अहसास को अगर वे स्वीकार कर लेंगे , और उनके मुहं से उनके समर्थक सुन लेंगे ,तो शायद समाज में भाईचारा बढ़ेगा, और भेदभाव और नफरत काम होगी /
लेकिन यही तो डर है की फिर शायद वर्गभेद को आधार बनाकर जो अपने स्वार्थ की रोटी सेंक रहें हैं , फिर उनके लिए अस्तित्व का खतरा उत्पन्न हो जाएगा /उनकी राजनीती खतरे में पद जाएगी /
अगर कोई कहेगा की क्या वैज्ञानिक प्रमाण हैं ,इस बात के तो उनको दूंगा उनको लिखूंगा भी और लिंक भी पेश करूंगा / - Tribhuwan Singh कुछ लिंक्स दे रहा हूँ जो नयी रेसेअर्चेस हुयी है ,,जिनमे ऐतिहासिक रिकार्ड्स archeology , और जेनेटिक स्टडीज के आधार पर आर्य (संस्कृत बोलने वाले लोग ) भारत के बाहर से आये , इस खड़यन्त्र का पर्दाफाश करने के लिए /
- Tribhuwan Singh BBC Accepts that the Aryan Invasion theory is flawed | Arise ...
://arisebharat.com/.../bbc-accepts-that-the-aryan.../arisebharat.com - Tribhuwan Singh The Aryan Invasion Theory: The Final Nail in its Coffin
://www.stephen-knapp.com/aryan_invasion_theory_the_final....stephen-knapp.com - Tribhuwan Singh New research debunks Aryan invasion theory | Latest News ...
www.dnaindia.com › News › India - Tribhuwan Singh Harvard University's international scandal unravels a global ...
www.ivarta.com/columns/ol_051219.htmWhat started as a threatened international scandal from Harvard University, has turned into a global Hindu conspiracy attempting to show that Hindu civilization was nurtured and developed by the Hindu. This conspiracy was hatched to reject aryan supremacy postulated through Aryan Invasion/Migration/…ivarta.com - Tribhuwan Singh अब एक नए शाजिश के पर्दाफाश का समय भी आ गया / जिस तरह आपने देखा कि संस्कृत ग्रंथों के अनुसार "आर्य' शब्द को शाश्त्रों में एक आदरसूचक सम्बोधन को कहते हैं , लेकिन क्रिस्चियन /यूरोपियन संस्कृतविदों ने उसको आर्यन रेस / नश्ल घोषित करके,भारतीय समाज का सत्यानाश किया,और विश्व के सुप्रीम आर्य हिटलर और जर्मन च्रिस्तिअनों ने ६० लाख यहूदियों और ४० लाख जिप्सियों कि बर्बरतापूर्वक हत्या करवाई / उसी तरह एक शब्द है -"द्रविड़" जिसको कि पादरियों ने एक नयी रेस/ नश्ल का नाम दे दिया . इस "द्रविड़ रेस" को आर्यों के हांथो पराजित और विश्थापित नश्ल सिद्ध किया , जो अभी भी राजनैतिक हथियार है दक्षिण भारत में / और अभी भी वह कि क्रिस्चियन मिशनरियां उए तथाकथित पराजित और विश्थापित कौम के कपोलकल्पित इतिहास कि दुहाई देकर आज भी धर्म परिवर्तन का खुला खेल खेल रहीं है /
पहले ये चर्चा करेंगे कि द्रविड़ शब्द को द्रविड़ रेस में कैसे परिवर्तित किया गया , और फिर ऐतिहासिक संस्कृत ग्रन्थ के अनुसार द्रविड़ शब्द का अर्थ क्या होता है / इसी शब्द को कालांतर में दलित चिंतकों ने शूद्रों से कैसे जोड़ा अछूतों से कैसे जोड़ा / १५० वर्षों में ७००% टेचनोक्रट्स जो बेरोजगार और बेघर हो गए उनसे कैसे इनका रिश्ता जोड़ा / कैसे ब्रम्हानिस्म और ब्राम्हण शब्द को खलनायक कि तरह पेश किया / - Tribhuwan Singh २०१२ में प्रयाग में आयोजित महाकुम्भ में एक मित्र के मित्रमंडली साउथ से गंगास्नान करने आयी थी / पेशे से इंजीनियर / बात चीत में मैंने पूंछा कि आप लोग आर्य हैं कि द्रविड़, उन्होंने गर्व से कहा कि द्रविड़ / फिर मैंने पूंछ कि ऐसा क्यों समझते हैं आप लोग ,,तो उत्तर था - सारे भगवान उत्तर भारत में ही क्यों पैदा होते हैं ??
मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं था / अब सोचिये भारतीय संस्कृति का अनन्य काल से प्रतीक महाकुम्भ स्नान करने आये , भारतीय परम्परों को तो निभा रहें हैं,लेकिन मात्र १५० वर्षों पूर्व रचे गए एक " ईसाइयत खड़यन्त्र" के इतने गहरे शिकार हैं ?? वो भी इतने शिक्षित लोग /
सोचिये श्रवण परंपरा को ख़ारिज कर जब लेखन परंपरा ने अपने आपको स्थापित किया तो ,उसने कितना गहरा प्रभाव जमाया है भारतीय मनोमस्तिष्क पर ? - Tribhuwan Singh ब्रिटिश अधिकारीयों और धर्म परिवर्तन का एजेंडा वाले क्रिश्चियन पादरिओं के राजनैतिक और ईसाइयत की ,मिलीजुली शाजिश है - द्रविड़ और द्रविड़ियन रेस के उपज की थ्योरी/ "कल्पना की उड़ान" जैसा कि अभी भी वामपंथ और दलित चिंतकों का मुख्य "Modus oparandi " है, जिसके जरिये इतिहास को बिना तथ्य के , अपने अजेंडे को लागू करने का, वही हुवा दक्षिण भारत में /
दो अधिकारी फ्रांसिस व्हीट एलिस और अलेक्सैंडर डी कैम्पवेल ने तेलगु और तमिल भाषाओँ के व्याकरण का अध्ययन किया, और एक नए सिद्धांत कि परिकल्पना रची , कि ये भाषाएँ,अन्य भारतीय भाषाओँ से भिन्न हैं /फिर एक नए अधिकारी B H Houghton ने एक नए शब्द कि रचना की -"तमिलियन ", और एक नयी तथ्यहीन और कपोल कल्पित कहानी को जन्म दिया कि- " ये तमिलियन ही भारत के मूल निवासी थे" / इस तरह एक नयी आधारहीन परिकल्पना ने जन्म लिया/ फ्रांसिस व्हीट एलिस और अलेक्सैंडर डी कैम्पवेल ने तमिल और तेलगू भाषियों को भाषायी, और B H Hondsgon ने नश्लीय / रेसियल भिन्नता के आधार एक अलग नश्ल की परिकल्पना की /
परन्तु इन तेलगु और तमिलभाषी भारतीयों को एक अलग नश्ल / रेस सिद्ध करने के असली खड़यन्त्र, बिशप रोबर्ट कलडवेल (१८१४- ९१) नामक एक पादरी ने की/ जिसने ऊपर वर्णित भाषायी और नश्लीय भिन्नता को आधार बनाकर एक पुस्तक लिखी (लेखन परंपरा / श्रवण परंपरा ) जिसका नाम था -"Comperative Grammer of the Dravidian Race " जो आज भी बहुत पॉपुलर है /बिशप रोबर्ट कलडवेल ने नए विचार का जन्म दिया कि dravidians भारत के मूल निवासी थे , आर्यों के आने के पूर्व / परन्तु -"आर्यों के एजेंट ब्राम्हणों " ने इन भोले भाले द्रविडिअन्स को धूर्ततापूर्व (Cunning ) धर्म के बंधनों में जकड रखा है ,, और जब तक संस्कृत शब्दों को तमिल भाषा से बाहर नहीं निकला जाएगा,,,,ये भोले भाले द्रविड़ लोग अन्धविश्वास से मुक्ति नहीं पायेगे /
(ज्ञातब्व हो की जो नेटिव परम्पराएँ और शाश्त्र ,बाइबिल के फ्रेमवर्क में फिट न हो , उसे क्रिस्चनों ने ने मिथ और अन्धविश्वास की श्रेणी में रखा )
इसलिए कड्वेल जैसे यूरोपीय लोंगो काकर्तव्य है की भोले भाले द्रविडिअन्स को अंध विश्वास से मुक्ति दिला कर उनकी आत्माओ को अवलोकित करें ,,यानि क्रिस्चियन धर्म में शामिल करे /
इस तरह राखी गयी ब्राम्हणवाद और ब्रम्हानिस्म के विरोध और गाली देने की आधार शिला / cunning Bramhans जैसे शब्दों का प्रयोग ,पहली बार क्रिश्चियनिटी को स्थापित करने के लिए हुवा /
दलित चिंतकों सुन रहे हो न / - Tribhuwan Singh Every 42 plough shares are thus distributed ------------------------------------------------------------------------------------
To the proporieters -----11
tot he 9 charcoal makers ------------९
To the iron smith ------------------3.5
to the 4 hammer -men --------7
to the 6 bellows -men --------8
to the miner -------------------1
to the buffalo driver ---------------2.५
total ----------------------45 page--362 ये प्रमाण है इस बात का कि भारतीय समाज में आज से मात्र २०० साल पहले तक मालिक और श्रमिक के हिस्से बराबर तो नहीं लेकिन एकदम वाजिब होते थे, शोसण पर आधारित श्रम नहीं था , जैसा कि हमें पढ़ाया गया है , उससे एकदम इतर / - Tribhuwan Singh डॉ फ्रांसिस बुचनन आगे उद्धृत करते हैं कि Comarapeca कोंकणी कि एक ऐसी ट्राइब है , जो कि विशुद्ध शूद्र है, ये उस इलाके में ऐसे ही बस्ते हैं , जैसे मलयालम के .....विशुद्ध शूद्र............. nairs हैं /ये पैदाइशी खेतिहर और योद्धा हैं ,,और इनका झुकाव डकैती कि तरफ रहता है ( ज्ञात हो कि बुचनन ने जब caste / ट्रेड कि लिस्ट बनाई तो क्षत्रियों को संदेशवाहक ,योद्धा या डकैत क़ी श्रेणीं में डाला ) / इनके मुखिया वंशानुगत रूप से नायक कहलाते हैं जो किसी को भी आपस में सलाह कर के जात बाहर कर सकते थे / ये पुराने शाश्त्रों का अध्यन कर सकते हैं और मांस तथा शराब का भी सेवन कर सकते हैं / श्रृंगेरी के स्वामलु उनके गुरु हैं जो उनको पवित्र जल . भभूत और उपदेश देते हैं शादी विवाह नामकरण और शगुन तिथियों को बताने के लिए इनके निश्चित ब्राम्हण पुरोहित हैं /ये मंदिरों में विष्णु और शिव जी क़ी पूजा करते हैं जिनकी देखभाल कोंकणी ब्राम्हण करते हैं / ये देवियों के मंदिरों में शक्ति क़ी पूजा भी करते हैं और पशुबलि भी चढ़ाते हैं /
कोंकण में रहने वाले ब्राम्हण जो मूलरूप में गोवा में रहते थे , पुर्तगालियों ने जब उनको गोवा से भगा दिया (नहीं तो धर्म परिवर्तन कर देते ) अब मुख्यतः व्यापारी हो गए हैं ,लेकिन कुछ लोग अभी भी पुरोहिताई करते हैं / - Tribhuwan Singh अरे ये क्या हुवा क्या लिख दिया डॉ बुचनन ने ??,,बुचनन का नाम इतिहास के हर व्यक्ति को मालूम हैं ,/
शूद्र / दलित मृत्युदंड दे सकता था १८०७ तक ???
शूद्र / दलित खेतों का मालिक भी हो सकता है , और खेतिहर किसान भी हो सकता है /
और ब्राम्हण उसका पुरोहित भी था ???
ध्यान रखियेगा भारत के आर्थिक इतिहास को ,,१७५० तक भारत विश्व के सकल घरेलु उत्पाद का २५% हिस्सा तैयार करता था ,,गुड और खांड भी एक्सपोर्ट होती थी इंग्लैंड , दादाभाई नौरोजी की पुस्तक - "पावर्टी एंड उनब्रिटिश रूल इन इंडिया " / अभी लूट खसोट शुरू ही हुयी थी और ये GDP का शेयर अभी शायद घटकार २०% ही हुवा होगा , ५० साल की अंग्रेजी लूट में / और अभी क्रिस्चियन पादरियों को धर्म परिवर्तन में सबसे बड़े रोड़ा आज से नहीं अनंत काल से , ब्राम्हण को दुस्ट घमंडी स्वार्थी जैसे उपाधियों से नवाजने की जरूरत नहीं पड़ी है। मंगल पाण्डेय अभी पैदा भी नहीं हुए हैं । - Arun Kumar Thanks for your efforts to enlightened us.
- Tribhuwan Singh डॉ बुचनन तुलवा के बाद कुमली टाउन के एक कन्या -पूरा नामक जगह का वर्णन करते हैं , जहाँ के निवासियिों में मोपल्या, मुकुआ मोगाएर और कर्नाटिक हैं /इस इलाके के निचले हिस्से में तुलवा ब्राम्हण और या बुन्ट्स या बुन्तर रहते हैं /
बुन्तर तुलवा में बसने वाले ........ शूद्रों .......के उचीं रैंक के लोग हैं / लोगों ने बताया की बुन्तर तीन तरह के हैं - मससदी, प्रॉपर बंटर्स जो जैनियों के नाम से भी जाने जाते हैं , तथा परिवरदा बंटर्स / मैंने मससदी बुन्त लोगों के बारे में पटकिया ,जो इस प्रकार से है : ये अपने आपको योद्धा तो नहीं कहते , ----लेकिन इनका व्यवसाय ----खेती है / इनको एकाउंटिंग तो आती है ,लेकिन ऊँची शिक्षा से ये वंचित हैं / इनके मुखिया को मॉकस्टा के पदनाम से जाना जाता है , जो की हर जिले में एक व्यक्ति होता है , और वो भी वंशानुगत क्रम में /इनका काम अपनी caste के लोगों के विववादों को और आर्थिक विवादों को निपटना होता है / हालांकि अब ये पद मात्र दिखावे के लिए बचा है , क्योंकि सरकार ने इनसे ये जूरिस्डिक्शन अपने हाथ में ले लिया है /
ये लोग शक्तियों की पूजा मुख्य रूप से करते हैं और भूत पिशाच भागने के लिए पशुबलि भी देते हैं / लेकिन इनके मुख्या देवता शिवजी हैं / कुछ लोग विष्णु की भी पूजा करते हैं / ये तलुवा ब्राम्हणों को अपना पुरोहित बताते है, परन्तु पुरोहित लोग इनके लिए मन्त्र तो नहीं लेते लेकिन ,दान दक्षिणा लेते हैं और भभूत और पवित्र जल भी देते हैं /
डॉ बुचनन - अ जर्नी फ्रॉम मद्रास -पेज १६-१७
नोट : अपने caste / ट्रेड क्लासिफिकेशन में बुचनन ने मोपल्या को कसान और व्यापारी , कांकणी को बैंकर ,दूकानदार और व्यसायी , मोगलेयर को मछुवारा और नाविक , तथा बुन्त्स को किसानों की श्रेणीं में रखा है / - Tribhuwan Singh ",जो इस प्रकार से है : ये अपने आपको योद्धा तो नहीं कहते , लेकिन इनका व्यवसाय खेती है / इनको एकाउंटिंग तो आती है ,लेकिन ऊँची शिक्षा से ये वंचित हैं / "
- Tribhuwan Singh इसके बाद डॉ बुचनन होसो-बेट्टा नामक जगह के बारे में बताते हैं ,जिको विटली मंजेस्वर के नाम से भी जाना जाता है ,जिसके राजा हेगड़े नामक एक जैन हुवा करते थे /
इसके मुख्य निवासी कर्नाटिक कहते हैं जोकि कंकण (कोंकण ) से आये हुए लोग हैं /वे कहते हैं की वे अपने मूल निवास गोवा से धर्म परिवर्तन के डर से भागे हुए लोग हैं / पुतगाल से एक आदेश आया कि सारे गोवनियों का जबरन धर्म परिवर्तन कर दिया जाय / लेकिन जब ये आदेश आया तो ,गोवा का वाइसराय बहुत नरम दिल और अच्छा आदमी था, उसने १५ दिन का समय दिया कि जो लोग भाग सकते हैं वे अपनी संपत्ति सहित भाग सकते हैं गोवा छोड़कर / तो इस तरह -------जितने धनी लोग थे , ब्राम्हण और शूद्र ,------- वे लोग अपनी चल सम्पत्ति लेकर वहां से तुलवा आ गए , और अब उनकी आजीविका ट्रेड यानि व्यवसाय से चलती है /ये ब्राम्हण और शूद्र अपने मूल जगह से सम्बंधित होने के कारण कर्नाटिक कहलाते हैं , लेकिन इन विस्थापित लोगों से ब्राम्हणों का सम्बन्ध विच्छेद हो गया है / हालांकि ये लोग व्यवसाय के कारण काफी समृद्ध हो गये हैं , मैंने स्वयं अपनी आँखों से इनकी शादी ब्याह में देखा है , कि ये अच्छे कपडे पहनते हैं , और इनके कुलों कि लड़कियां बड़ी सुन्दर हैं /
और जो गरीब कर्नाटिक लोग गोवा में बच गए , उन सब का धर्म परिवर्तन क्रिश्चियनिटी में कर दिया गया / डॉ बुचनन - अ जर्नी फ्रॉम मद्रास -पेज 20 -21 - Tribhuwan Singh अब आप वापस इकनोमिक हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया , के timeline पर जाइए , और गोवा के इतिहास पे ध्यान दें ये आदेश १६०० के आसपास का होगा , और इन ब्राम्हण और शूद्रों को वहां से विस्थापित हुए , १५० से २०० साल हुवा होगा / दोनों अब ट्रेड यानि व्यापार करते हैं ,, और १८०७ में जब बुचनन ---धनि (Rich Bramhans and Shoodras ) ब्राहण और शूद्र ----- शब्द का प्रयोग करते हैं , तो ये समझना चाहिए कि १७५० में भारत , विश्व का २५ % GDP का हिस्सेदार था , और इंग्लॅण्ड और अमेरिका मिलकर मात्र २% के / अभी ५० साल में भारतीय घरेलू उद्योगों को बहुत छति नहीं पहुंची है , लेकिन १९०० आते आते भारत मात्र २% क शेयर होल्डर , बचेगा , और ७००% लोग बेरोजगार हो चुके होंगे / अभी तक धर्म परिवर्तन कि मुहीम भी नहीं चली है , अभी आंबेडकर और पेरियार को १२५ साल से ऊपर लगने वाला है , भारतीय राजनीती में चरण रखने में / और इसीलिये अभी ब्रामण --धूर्त ,दुस्ट ,घमंडी और खड़यन्त्रकारी नहीं हुवा है ,, और शूद्र / दलित अभी दरिद्र , बेरोजगार और बेघर भी नहीं हुवा है / इसीलिये ---धनी ब्राम्हण और शूद्र
- Sumant Bhattacharya Tribhuwan Singh भाई,कई सारे तथ्य आपस में जुड़ से गए हैं। गोवा से निकलने वाले कहां गए और क्या कहलाए..मौजूदा समाज में उनकी शिनाख्त कैसे करें..क्या बदलाव आया.. तथ्यों के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ें आप तो हम सब मित्र कहीं ज्यादा समझ सकेंगे। सादरSee Translation
Tribhuwan Singh चलिए
अब जब इतनी भूमिका बन चुकी है ,,तो संस्कृत ग्रंथों को खंगालने के पहले डॉ
भीमराओ आंबेडकर जी के एक कथन को पेश करता हूँ / अम्बेडकरजी ने १९४६ में
प्रकाशित अपनी पुस्तक "who were shudras " में उन्होंने" आर्यन Invasion
थ्योरी " को मिथ करार कर दिया था / लेकिन तथाकथिक दलित चिंतन इतना आगे आ
चूका है की वो उनको भी नहीं पढ़ पाया जिसने दलितोद्धार का बीड़ा उठाया था /
Tribhuwan Singh dhanyavaad ke aalawa
Tribhuwan Singh Review - Lies with Long Legs | by Dr. Prodosh Aich
www.lieswithlonglegs.com/Review.aspx
www.lieswithlonglegs.com/Review.aspx
Have you read Prof. Aich's book 'Lies with Long Legs'? Buy it if you can. He has really tore into the Western...
lieswithlonglegs.com
Tribhuwan Singh Genetic Tests - History of India - Myth of Aryan Invasion ...
www.aryavert.com/genes.html
www.aryavert.com/genes.html
aryavert.com
Tribhuwan Singh ब्रम्हानिस्म
को, अंग्रेजी शाशन के दौरान ७०० % से ज्यादा बेरोजगार और बेघर हुए
भारतीयों, और किसानों की किसानी नष्ट होने से प्रभावित ८०% से ज्यादा असहाय
जनता का , जिम्मेदार ठहराए जाने के पूर्व, और पादरियों द्वारा ब्राम्हणों
को ईसाईयत में सबसे बड़ी बाधा बनते
देख कर ..."धूर्त दुस्ट घमंडी ब्राम्हणों की" उपाधि से नवाजे जाने के
पूर्व (१८५७ की लड़ाई के पूर्व , जो इनकी कहानी कथाओं की जननी ) ,डॉ
फ्रांसिस बुचनन ने १८०७ में एक पुस्तक लिखी (,जिसका जिम्मा अंग्रेजी शासकों
ने सौपा था ,दक्षिण भारर्त की जनता के बारे में , उनकी संस्कृति , और उस
समय के व्यापार के बारे में ) ." JOURNEY FROM MADRAS through the
countries of MYSORE CANARA AND MALABAR" PUBLISHED BY EAST INDIA COMPANY ,
के कुछ वाक्यांश , जो उस समय के भारत की झलक देते हैं /
Tribhuwan Singh इस
बात को ध्यान में रखा जाय कि १७५० में भारत का सकल घरेलू उत्पाद विश्व का
२५% था , जबकि birtain और अमेरिका कुल मिलाकर मात्र २% ,,और पर कैपिटा
industralisation और प्रति व्यक्ति आमदनी लगभग बराबर थी / आने वाले ५०
वर्षों में यानि १८०० में भारत का शेयर गिरा
जरूर था , लेकिन १९०० वाला हाल नहीं हुवा था जब भारत का शेयर मात्र २% बचा
था / इस समय तक ईसाईयों को अभी ब्राम्हणों को धूर्त घमंडी और खड़यन्त्र
कारी सिद्ध करने का अवसर नहीं आ पाया था /
विजय नगर के तुलवा क्षेत्र ,जो पहले जैन राजाओं के कब्जे में था जिसको बाद में हैदर और टीपू सुलतान ने अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया था , के बारे में डॉ बुचनन के उद्धरण :(१) इस इलाके में ६ मंदिर और ७०० ब्राम्हणों के घर थे , लेकिन जब टीपू सुलतान ने इस क्षेत्र पर कब्ज़ा किया इन ब्राम्हणों के घरों को तबाह / नष्ट कर दिया , और अब मात्र १५० ब्राम्हणों के घर बचे हैं (पेज - ७५ )
(२) तुलवा में घाट के ऊपर बसने वाले ब्राम्हण ,वैश्य और अन्य जातियां अपने पुत्रों को वारिस मानते हैं , परन्तु राजा (क्षत्रिय ) और शूद्र , ..जो कि भूमि के मालिक हैं..... , वे अपने बहनों के बच्चों को अपना वारिस मानते हैं /शूद्रों को भी जानवर खाने और देशी शराब पीने कि इजाजत नहीं है , सिर्फ क्षत्रियों को भी मात्र युद्ध के समय जानवरों कि हत्या करने और खाने की इजाजत है / ये सभी लोग अपने मृतकों को आग में जलाते हैं ,( लाश को फूकते हैं )/ (पेज - ७५ )
(३) मध्वाचार्य के अनुयायियों ने बताया कि तलुए के ब्राम्हण पंच द्रविड़ कहलाते हैं जो कि पूर्व में भारत के पांच अलग अलग राज्यों और भाषाओँ को बोलने वाले है , जिनमे तेलिंगा (आंद्रेय से ) , कन्नड़ (कर्णाटक से ) ,गुर्जर (गुजरात से) ,मराठी (महाराष्ट्र से ) ,तमिल बोलने वाले पांच भाषाओ को मिला कर पंच द्रविड़ का इलाका बनता है / लेकिन तमिल बोलने वाला इलाका द्रविड़ या देशम कहलाता है / लेकिन इनकी शादी विवाह सिर्फ अपने ही मूल भाषा बोलने वालों के बीच होता है / (पेज -९० )
(४)इस क्षेत्र का एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट गजट के अनुसार क्रमशः ९,६३,८३३ रूपये (यानि एक्सपोर्ट ) और १,०८,०४५ रुपये (इम्पोर्ट ) है , और एक रुपये कि कीमत २ पौंड के बराबर है / ( यानि एक्सपोर्ट लगभग इम्पोर्ट का ९ गुना ,,यानि कितने लोग रोजगार युक्त ,कितने टेचनोक्रट्स ,कितने interpreunerer , जो अगले १०० सालों में बेघर और बेरोजगार होने वाले हैं) पेज- २४६
(५) एक चिका- बैली -करय नामक एक स्थान पर लोहे कि भट्ठी का वर्णन वे करते हैं कि व्हाना पर जो लोहा बनाया जाता था कच्चे आयरन ore से , उसकी तकनीकी का वर्णन करते हुए वे ,बताते हैं कि गाँव के लोग किस तरह लोहा पैदा करते थे, उसका बंटवारा किस रूप से करते थे ? Every 42 plough shares are thus distributed ------------------------------------------------------------------------------------ To the proporieters -----11 tot he 9 charcoal makers ------------9 To the iron smith ------------------3.5 to the 4 hammer -men --------7 to the 6 bellows -men --------8 to the miner -------------------1 to the buffalo driver ---------------2.5 total ----------------------42
विजय नगर के तुलवा क्षेत्र ,जो पहले जैन राजाओं के कब्जे में था जिसको बाद में हैदर और टीपू सुलतान ने अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया था , के बारे में डॉ बुचनन के उद्धरण :(१) इस इलाके में ६ मंदिर और ७०० ब्राम्हणों के घर थे , लेकिन जब टीपू सुलतान ने इस क्षेत्र पर कब्ज़ा किया इन ब्राम्हणों के घरों को तबाह / नष्ट कर दिया , और अब मात्र १५० ब्राम्हणों के घर बचे हैं (पेज - ७५ )
(२) तुलवा में घाट के ऊपर बसने वाले ब्राम्हण ,वैश्य और अन्य जातियां अपने पुत्रों को वारिस मानते हैं , परन्तु राजा (क्षत्रिय ) और शूद्र , ..जो कि भूमि के मालिक हैं..... , वे अपने बहनों के बच्चों को अपना वारिस मानते हैं /शूद्रों को भी जानवर खाने और देशी शराब पीने कि इजाजत नहीं है , सिर्फ क्षत्रियों को भी मात्र युद्ध के समय जानवरों कि हत्या करने और खाने की इजाजत है / ये सभी लोग अपने मृतकों को आग में जलाते हैं ,( लाश को फूकते हैं )/ (पेज - ७५ )
(३) मध्वाचार्य के अनुयायियों ने बताया कि तलुए के ब्राम्हण पंच द्रविड़ कहलाते हैं जो कि पूर्व में भारत के पांच अलग अलग राज्यों और भाषाओँ को बोलने वाले है , जिनमे तेलिंगा (आंद्रेय से ) , कन्नड़ (कर्णाटक से ) ,गुर्जर (गुजरात से) ,मराठी (महाराष्ट्र से ) ,तमिल बोलने वाले पांच भाषाओ को मिला कर पंच द्रविड़ का इलाका बनता है / लेकिन तमिल बोलने वाला इलाका द्रविड़ या देशम कहलाता है / लेकिन इनकी शादी विवाह सिर्फ अपने ही मूल भाषा बोलने वालों के बीच होता है / (पेज -९० )
(४)इस क्षेत्र का एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट गजट के अनुसार क्रमशः ९,६३,८३३ रूपये (यानि एक्सपोर्ट ) और १,०८,०४५ रुपये (इम्पोर्ट ) है , और एक रुपये कि कीमत २ पौंड के बराबर है / ( यानि एक्सपोर्ट लगभग इम्पोर्ट का ९ गुना ,,यानि कितने लोग रोजगार युक्त ,कितने टेचनोक्रट्स ,कितने interpreunerer , जो अगले १०० सालों में बेघर और बेरोजगार होने वाले हैं) पेज- २४६
(५) एक चिका- बैली -करय नामक एक स्थान पर लोहे कि भट्ठी का वर्णन वे करते हैं कि व्हाना पर जो लोहा बनाया जाता था कच्चे आयरन ore से , उसकी तकनीकी का वर्णन करते हुए वे ,बताते हैं कि गाँव के लोग किस तरह लोहा पैदा करते थे, उसका बंटवारा किस रूप से करते थे ? Every 42 plough shares are thus distributed ------------------------------------------------------------------------------------ To the proporieters -----11 tot he 9 charcoal makers ------------9 To the iron smith ------------------3.5 to the 4 hammer -men --------7 to the 6 bellows -men --------8 to the miner -------------------1 to the buffalo driver ---------------2.5 total ----------------------42
Tribhuwan Singh तुलवा
भाषी मूलनिवासी , जो लोग खजूर/ ताड के पेड़ों से गुड और शराब बनाने के लिए
उनका रस/जूस निकलते हैं उनको बिलुआरा (Biluaras ) नामक जात से जाना जाता
है ,वे अपने को शूद्र कहते हैं लेकिन कहते हैं ki वे बुन्त्स (bunts ) से
सामजिक स्तर पर नीचे मानते हैं / लेकिन इनमे से कुछ लोग खेती भी करते हैं , लेकिन ज्यादातर लोग मजदूर हैं इन खेतों में , लेकिन काफी लोग मालिक भी हैं खेतों के /
इनके आपसी मामलों को निपटने के लिए सरकार द्वारा एक व्यक्ति नियुक्त होता है जिसको गुरिकारा के नाम से जाना जाता है , उसे किसी व्यक्ति को अपने समाज के वरिष्ठ लोगों से सलाह करके ,जात बाहर करने या मृत्युदंड (कार्पोरल पनिशमेंट ) देने का अधिकार है / इनमे से कोई भी पढ़ा लिखा नहीं है / इनको मांस भाषण का अधिकार तो है परन्तु मदिरा पीने का हक़ नहीं है / इनका मानना है कि मृत्यपर्यंत अच्छे लोग स्वर्ग में जाते हैं , और बुरे लोग नरक में / जो लोग सक्षम है . वे लाशों को जलाते हैं परन्तु , गरीब लोग उनको जमीन में गाड़ देते हैं /
इनमे से कुछ लोग ही विष्णु जैसे बड़े देवताओं कि पूजा करते हैं , लेकिन ज्यादातर लोग "मरिमा" नामक शक्ति को बलि चढ़ाते हैं , बुरी आत्माओं को भगाने के लिए /
ज्यादातर बुलिआरों या उन लोगों के यहाँ जो शक्ति कि पूजा करते हैं, के शादी व्याह में या मृत्यु पर कोई पुरोहित मन्त्र या शास्त्र पढने नहीं जाता /
लेकिन जो बुलिअर विष्णु कि पूजा करते हैं उनके पुरोहिताई का जिम्मा श्री वैष्णवी ब्राम्हणों का है / वे उनको उपदेश भी देते हैं ,Chaki'dntikam, भी देते हैं और पवित्र जल का छिड़काव भी करते हैं /
रेफ: डॉ फ्रांसिस बुचनन .अ जर्नी फ्रॉम मद्रास ,mysore कनारा एंड मालाबार पेज - ५२-५३
buchanan classified all castes of south India 122 categories only , and as sole criteria being caste / trade Buliars were categorized as extractors of juice from palm tree and Buntus as Cultivators but both categorized under Shudras under Varna scale of Hindu DharmVarnashram .
इनके आपसी मामलों को निपटने के लिए सरकार द्वारा एक व्यक्ति नियुक्त होता है जिसको गुरिकारा के नाम से जाना जाता है , उसे किसी व्यक्ति को अपने समाज के वरिष्ठ लोगों से सलाह करके ,जात बाहर करने या मृत्युदंड (कार्पोरल पनिशमेंट ) देने का अधिकार है / इनमे से कोई भी पढ़ा लिखा नहीं है / इनको मांस भाषण का अधिकार तो है परन्तु मदिरा पीने का हक़ नहीं है / इनका मानना है कि मृत्यपर्यंत अच्छे लोग स्वर्ग में जाते हैं , और बुरे लोग नरक में / जो लोग सक्षम है . वे लाशों को जलाते हैं परन्तु , गरीब लोग उनको जमीन में गाड़ देते हैं /
इनमे से कुछ लोग ही विष्णु जैसे बड़े देवताओं कि पूजा करते हैं , लेकिन ज्यादातर लोग "मरिमा" नामक शक्ति को बलि चढ़ाते हैं , बुरी आत्माओं को भगाने के लिए /
ज्यादातर बुलिआरों या उन लोगों के यहाँ जो शक्ति कि पूजा करते हैं, के शादी व्याह में या मृत्यु पर कोई पुरोहित मन्त्र या शास्त्र पढने नहीं जाता /
लेकिन जो बुलिअर विष्णु कि पूजा करते हैं उनके पुरोहिताई का जिम्मा श्री वैष्णवी ब्राम्हणों का है / वे उनको उपदेश भी देते हैं ,Chaki'dntikam, भी देते हैं और पवित्र जल का छिड़काव भी करते हैं /
रेफ: डॉ फ्रांसिस बुचनन .अ जर्नी फ्रॉम मद्रास ,mysore कनारा एंड मालाबार पेज - ५२-५३
buchanan classified all castes of south India 122 categories only , and as sole criteria being caste / trade Buliars were categorized as extractors of juice from palm tree and Buntus as Cultivators but both categorized under Shudras under Varna scale of Hindu DharmVarnashram .
Tribhuwan Singh तो
इस तरह -------जितने धनी लोग थे , ब्राम्हण और शूद्र ,------- वे लोग अपनी
चल सम्पत्ति लेकर वहां से तुलवा आ गए , और अब उनकी आजीविका ट्रेड यानि
व्यवसाय से चलती है
Tribhuwan Singh अब
इस कथा वार्ता को आगे बढ़ाने के पहले मैं सुमंत दा कि भूमिका , एक सूत्रधार
को उनसे क्षणिक तौर पे उधार लेकर कुछ लिखना चाहता हूँ -
-- कौन सा वो युग था ,जब पूरा समाज एक जैसा था , अत्याचार से निर्लिप्त ???
---१५०० AD से १८०० AD , के बीच यूरोपीय क्रिस्तिानों ने अमेरिका पर कब्जा करने के बाद २०० मिलियन , यानि २० करोड़ अमेरिकी मूल निवासियों कि धर्म और अंधविस्वास के नाम पर हत्या की / और आज कितने मूलनिवासी वहां बचे हैं ?? जिनको रेड इंडियन कहा जाता है / इंडियन लेकिन रेड ?? ये क्या है भाई ?? कोई बताएगा इन सुबुद्ध जनों में से कोई एक ?? क्यों ये अमेरिकन्स अपने देश में इस अत्याचार कि बात नहीं करते हैं ??? क्यों वाइट एंड ब्लैक १९६० तक एक ही बस में स्कूल या ऑफिस जाने के लिए , वाइट आगे और काले पीछे बैठने की व्यवस्था का पालन करते थे ?? लेकिन सारे ह्यूमन राइट के मालिक वही हैं / भदोही में घरेलू उद्योग , को जिसने फैक्ट्री में बदलने को मजबूर किया ,,, और फिर उस फैक्ट्री को भी रुग्मार्क के नाम पे नष्ट किया / उसको नोबेल पुरस्कार मिला ,,,,९००० रूपया प्रतिवर्ष का व्यापार ,, और न जाने कितने स्किल्ड लोग , मजदूर बन गए / भाई किसने आवाज उठाई ?? लेकिन विदेश से पुरस्कारित यहीं , तो सम्मान तो देना ही पड़ेगा / और इसीलिए अगर शेरिंग जैसा पादरी , भारत के समाज की व्याख्या कर रहा है , और कोई मैक्समूलर नाम का जर्मन , जो संस्कृत का स भी नहीं जान सकता , अपने करियर में , वो बताता है , की कुछ संस्कृत भाषी आर्य बाहर से आये थे , और सब मूलनिवासियों को मार के खदेड़ दिया , दक्षिण की ओर/ और हम लोग इसे न समझ पा रहें हैं न सुलझा प् रहे हैं /
यहाँ तो बताया कि वर्ण यानी चमड़े का रंग / इसलिए कोई सवर्ण और कोई अवर्ण (discolored )
तो फिर वर्णमाला में वर्ण का क्या मतलब होगा ?? और वर्णधर्माश्रम में क्या इसका मतलब होगा ??
-- कौन सा वो युग था ,जब पूरा समाज एक जैसा था , अत्याचार से निर्लिप्त ???
---१५०० AD से १८०० AD , के बीच यूरोपीय क्रिस्तिानों ने अमेरिका पर कब्जा करने के बाद २०० मिलियन , यानि २० करोड़ अमेरिकी मूल निवासियों कि धर्म और अंधविस्वास के नाम पर हत्या की / और आज कितने मूलनिवासी वहां बचे हैं ?? जिनको रेड इंडियन कहा जाता है / इंडियन लेकिन रेड ?? ये क्या है भाई ?? कोई बताएगा इन सुबुद्ध जनों में से कोई एक ?? क्यों ये अमेरिकन्स अपने देश में इस अत्याचार कि बात नहीं करते हैं ??? क्यों वाइट एंड ब्लैक १९६० तक एक ही बस में स्कूल या ऑफिस जाने के लिए , वाइट आगे और काले पीछे बैठने की व्यवस्था का पालन करते थे ?? लेकिन सारे ह्यूमन राइट के मालिक वही हैं / भदोही में घरेलू उद्योग , को जिसने फैक्ट्री में बदलने को मजबूर किया ,,, और फिर उस फैक्ट्री को भी रुग्मार्क के नाम पे नष्ट किया / उसको नोबेल पुरस्कार मिला ,,,,९००० रूपया प्रतिवर्ष का व्यापार ,, और न जाने कितने स्किल्ड लोग , मजदूर बन गए / भाई किसने आवाज उठाई ?? लेकिन विदेश से पुरस्कारित यहीं , तो सम्मान तो देना ही पड़ेगा / और इसीलिए अगर शेरिंग जैसा पादरी , भारत के समाज की व्याख्या कर रहा है , और कोई मैक्समूलर नाम का जर्मन , जो संस्कृत का स भी नहीं जान सकता , अपने करियर में , वो बताता है , की कुछ संस्कृत भाषी आर्य बाहर से आये थे , और सब मूलनिवासियों को मार के खदेड़ दिया , दक्षिण की ओर/ और हम लोग इसे न समझ पा रहें हैं न सुलझा प् रहे हैं /
यहाँ तो बताया कि वर्ण यानी चमड़े का रंग / इसलिए कोई सवर्ण और कोई अवर्ण (discolored )
तो फिर वर्णमाला में वर्ण का क्या मतलब होगा ?? और वर्णधर्माश्रम में क्या इसका मतलब होगा ??






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